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Thursday, June 26, 2014

बदनसीब--

आज फिर शाम को चला गया था वो सुरेश के यहाँ| पता नहीं क्यों बड़ा अपनापन सा महसूस होता था उसे वहां पर| जब भी मन उदास होता, उसके पैर खुद ब खुद सुरेश के घर की तरफ चल पड़ते थे| 
क्या नहीं था उसके अपने घर में, ऐशो आराम के सब साधन मौजूद थे| पिता बहुत बड़े बिजनेसमैन थे लेकिन उनके पास कमी थी तो सिर्फ समय की| माँ बचपन में ही चल बसी थी, ऐसे में जब भी मन बहुत उदास हो जाता था तो वो सुरेश के यहाँ निकल जाता था|
जैसे ही वो सुरेश के घर के अंदर घुसा, उसे सुरेश के चिल्लाने की आवाज आई| वो अपनी माँ को बुरी तरह डाँट रहा था, लेकिन उसकी माँ खामोश थी और उसे देखते ही वो चुप हो गया|
" क्या बात है बेटा, आज बहुत दिन बाद आये, सब ठीक तो है न"|
" हाँ आँटी, सब ठीक है, बस बहुत दिनों से आप के हाथ का खाना नहीं खाया था तो सोचा की आज चल के खा लिया जाए"|
" क्यों नहीं बेटा, जरूर, बैठो तुम"| इतना कह कर वो किचेन में चली गयीं, कुछ देर पहले कुछ हुआ भी था ये उनके चेहरे पर नजर भी नहीं आ रहा था|
खाना खा कर वो वापस अपने घर पहुंचा और सोचने लगा कि वो कितना बड़ा बदनसीब है| लेकिन फिर उसे लगा कि उससे बड़ा बदनसीब तो सुरेश है जिसे माँ की कोई क़द्र ही नहीं है, क्योंकि उसे एहसास ही नहीं है कि माँ के नहीं होने का दर्द क्या होता है| 

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