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Thursday, June 26, 2014

भागीरथी

भागीरथ ने सोचा की क्यों न धरती पर चलकर गंगा को देखा जाये , वो गंगा जिसे वो कई वर्षों की तपस्या के बाद धरती पर लाये थे | वो सोच रहे थे की गंगा ने तो अब तक समस्त मानवों एवम अन्य प्राणियों का उद्धार कर दिया होगा | धरती पर पहुँच कर वो जिस नदी के किनारे पहुंचे , वो नदी तो बिलकुल नहीं थी | एक सूखी हुई नदी , या नाला कह लें तो बेहतर , गन्दगी से भरी हुई और बुरी तरह से प्रदूषित | उन्होंने कई बार अलग अलग लोगों से पूछ कर तस्दीक करने की कोशिश की , लेकिन हर बार उन्हें एक ही जवाब मिला कि यही गंगा है | वो बहुत दुखी और उदास हो गए |
चिंतित भागीरथ फिर से तपस्या करने चल दिए | अनेक वर्षों की अथक तपस्या के बाद एक बार फिर प्रभु प्रकट हुए और पूछा कि क्या चाहते हो | भागीरथ बोले कि हमारी गंगा नदी , जो कभी सबको जीवनदान देती थी , अब उसे ही जीवनदान की जरुरत है | किसी तरह उसे नया जीवन दीजिये प्रभु |
इतना सुनते ही प्रभु अदृश्य हो गए और थोड़ी देर में ही आकाशवाणी हुई कि हे भागीरथ , इस गंगा को जीवनदान देना तो असंभव जान पड़ता है | जब ये मानव खुद का ही विनाश करने पर तुल गया है तो इसे बचाना अत्यंत दुरूह प्रतीत होता है | अब तो तुम्हे एक बार फिर से गंगा को धरती पर ले जाना पड़ेगा , शायद इस बार वो जीवन दान दे सके इस सृष्टि के सभी प्राणियों को |

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