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Tuesday, February 10, 2015

हवा--

कितना कुछ बदल गया था उनके मोहल्ले में | नुक्कड़ पर खड़े आवारा लड़के कब किसके साथ छेड़खानी कर दें , मारपीट कर दें , कोई भरोसा नहीं रह गया था | पिछले हफ्ते ही उन्होंने टोका था उन लड़कों को तो उन्होंने धमकाते हुए कहा था " इसी तरह फ़टे में टाँग अड़ाओगे तो सोच लेना , आप की भी लड़की है "| कितने सालों तक पूरी ईमानदारी से पढ़ाया था उन्होंने छात्रों को कालेज में | और उनके साथ ही ऐसा सलूक , सोच भी नहीं सकते थे |
पर आज वो बहुत पेशोपेश में पड़ गए थे | इन लड़कों को तो सजा मिलनी ही चाहिए , पर उनका अपना स्वभाव | आख़िरकार लड़कों की जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने मामला रफा दफा करा दिया | नुक्कड़ तो अब भी वहीं था बस वहां से चलने वाली हवा अब बदल गयी थी |

फ़िक्र--

" हेलो , पापा , आप समय से अपनी दवा खा लेना "| बेटी के शब्द सुनकर उन्होंने सुकून की सांस ली | अभी कल ही उसने फोन नहीं किया तो एकदम परेशान हो गए और वापस आते ही पूरा लेक्चर दे डाला |
आज भी हड़बड़ी में वो भूल ही गयी थी पर एक बुज़ुर्ग को सामने देखते ही याद आ गया | पता तो उसको भी है और पापा को भी है , फोन तो सिर्फ बहाना है ये बताने के लिए कि आज भी वो सकुशल पहुँच गयी है | 

Monday, February 9, 2015

मरहम--

आज पत्नी ने देख लिया था बेटी को उस दलित लड़के के साथ बाजार में | घर आने पर उसने आसमान सर पर उठा लिया | एक बारगी तो वो भी विचलित हो गए लेकिन फिर उनको अपना समय याद आ गया , सिर्फ लड़की की जाति ही तो नीची थी |
अब वक़्त ने शायद उनके अपने घाव को भरने का एक मौका दे दिया था |

Saturday, February 7, 2015

उम्मीदें--

हैं उम्मीदें बाक़ी , तमन्नाओं को यूँ तमाम न कर,
आती है खुशियों की सहर , अब ग़म की शाम न कर,
छाये हों मायूसी के बादल , कितने भी घने फिर भी,
मासूमियत को अपनी , इन अंधेरों के नाम न कर,
बिछड़ते हैं हमसफ़र , गर जिंदगी की राहों पर,
किसी और के सफर में , काँटों का इंतज़ाम न कर,
सुना था कि हक़ीक़त में, रुलाती है दुनियाँ सबको
बाँटता चल सुकूँ , जहाँ को ग़मों का ग़ुलाम न कर,

हैं उम्मीदें बाक़ी , तमन्नाओं को यूँ तमाम न कर,
आती है खुशियों की सहर , अब ग़म की शाम न कर !!

Thursday, February 5, 2015

भाग्य--

बड़ी मुश्किल से उसका चेहरा नज़र आया , खासकर हँसने पर उसके उजले दांत उसके चेहरे का आभास दिला रहे थे | शायद १२-१३ साल की उम्र होगी उसकी , पूरा शरीर कालिख से पुता हुआ लेकिन फुर्ती में बेमिसाल | मिस्त्री काम करते हुए उससे तमाम औज़ार मांग रहा था और वो उसे दौड़ दौड़ के पकड़ा रहा था | न तो चेहरे पर कोई शिकन थी और न ही अपने भाग्य से कोई शिकायत |
गैराज से घर पहुँच कर उसे इच्छा हुई एक कप चाय पीने की | रविवार का दिन और जाड़े की दोपहर , धूप में पड़ी कुर्सी पर सर टिका लिया था उसने | फिर आवाज लगायी " रवि , जरा मम्मी को बोलो एक कप चाय बना दें "| दो तीन बार बोलने पर भी कोई जवाब नहीं आया तो उसे कस कर चिल्लाना पड़ा | कमरे में चल रहा टी वी अब बंद हो गया था लेकिन बेटे का बड़बड़ाना सुनाई देने लगा था | शायद वह अपने भाग्य को कोस रहा था | 

Sunday, February 1, 2015

नजरिया--

चाय का घूंट लेते हुए उनकी नज़र अखबार की एक खबर पर चली गयी " इलाके में एक लड़की की इज़्ज़त लुटी , आरोपी फरार "|
मन ही मन में राहत की सांस लेते हुए उन्होंने बगल में बैठी पत्नी से कहा " अच्छा हुआ , हमारी लड़की नहीं हुई वर्ना हमें भी डर के रहना पड़ता "|
पत्नी ने एक गहरी सांस ली और पिछले दिन का अखबार निकाला , पहले पन्ने पर छपी हुई तस्वीर जिसमें लड़कियां गणतंत्र दिवस के परेड की अगुआई कर रहीं थीं , उनके सामने रख दिया |
चाय उनके हाँथ में ठंडी हो रही थी , वो पत्नी से नज़र नहीं मिला पा रहे थे |

न्याय--

दोपहर में घंटी बजने पर उसने दरवाजा खोला तो वो दरिंदा जबरदस्ती अंदर घुस आया और उसकी अस्मिता को तार तार कर गया | अब शरीर तो जिन्दा बच गया लेकिन आत्मा बुरी तरह लहूलुहान थी | एक ऐसा हादसा जिसके लिए जिम्मेदार वो नहीं थी लेकिन भुगतना उसी को था |
पति ने आने पर जब सँभालने की कोशिश की तो उसे झटक कर वह जोर से रो पड़ी , शायद अब वो किसी पुरुष पर भरोसा नहीं कर पाएगी | एक वहशी की गलती की सज़ा अब पूरे पुरुष समाज को भुगतनी होगी |