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Saturday, February 7, 2015

उम्मीदें--

हैं उम्मीदें बाक़ी , तमन्नाओं को यूँ तमाम न कर,
आती है खुशियों की सहर , अब ग़म की शाम न कर,
छाये हों मायूसी के बादल , कितने भी घने फिर भी,
मासूमियत को अपनी , इन अंधेरों के नाम न कर,
बिछड़ते हैं हमसफ़र , गर जिंदगी की राहों पर,
किसी और के सफर में , काँटों का इंतज़ाम न कर,
सुना था कि हक़ीक़त में, रुलाती है दुनियाँ सबको
बाँटता चल सुकूँ , जहाँ को ग़मों का ग़ुलाम न कर,

हैं उम्मीदें बाक़ी , तमन्नाओं को यूँ तमाम न कर,
आती है खुशियों की सहर , अब ग़म की शाम न कर !!

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