बड़ी मुश्किल से उसका चेहरा नज़र आया , खासकर हँसने पर उसके उजले दांत उसके चेहरे का आभास दिला रहे थे | शायद १२-१३ साल की उम्र होगी उसकी , पूरा शरीर कालिख से पुता हुआ लेकिन फुर्ती में बेमिसाल | मिस्त्री काम करते हुए उससे तमाम औज़ार मांग रहा था और वो उसे दौड़ दौड़ के पकड़ा रहा था | न तो चेहरे पर कोई शिकन थी और न ही अपने भाग्य से कोई शिकायत |
गैराज से घर पहुँच कर उसे इच्छा हुई एक कप चाय पीने की | रविवार का दिन और जाड़े की दोपहर , धूप में पड़ी कुर्सी पर सर टिका लिया था उसने | फिर आवाज लगायी " रवि , जरा मम्मी को बोलो एक कप चाय बना दें "| दो तीन बार बोलने पर भी कोई जवाब नहीं आया तो उसे कस कर चिल्लाना पड़ा | कमरे में चल रहा टी वी अब बंद हो गया था लेकिन बेटे का बड़बड़ाना सुनाई देने लगा था | शायद वह अपने भाग्य को कोस रहा था |
गैराज से घर पहुँच कर उसे इच्छा हुई एक कप चाय पीने की | रविवार का दिन और जाड़े की दोपहर , धूप में पड़ी कुर्सी पर सर टिका लिया था उसने | फिर आवाज लगायी " रवि , जरा मम्मी को बोलो एक कप चाय बना दें "| दो तीन बार बोलने पर भी कोई जवाब नहीं आया तो उसे कस कर चिल्लाना पड़ा | कमरे में चल रहा टी वी अब बंद हो गया था लेकिन बेटे का बड़बड़ाना सुनाई देने लगा था | शायद वह अपने भाग्य को कोस रहा था |
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