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Sunday, May 17, 2015

ज़रूरत--

आज नयी बहू ने नौकर को बड़ी बहू के कमरे से रात में निकलते देख लिया । जैसे ही अगली सुबह उसने सास से इसका जिक्र किया तो सास को पहले तो कुछ नहीं सुझा , फिर वो बड़ी बहू के चरित्र पर कीचड़ उछालने लगी ।
बात बड़ी बहू के कान में पड़ी और वो दनदनाते हुए आ गयी ।
" मेरे चरित्र पर ऊँगली उछालने से पहले अपने बेटे को भी देख लो , कई कई महीने घर नहीं आता है और वहाँ क्या क्या करता है , ये भी बता दो इसको "।
छोटी बहू स्तब्ध , कुछ कहे उससे पहले ही फिर उसके कानों में आवाज़ पड़ी " सुन छोटी , जब शरीर को ज़रूरत होती है तो सही गलत कुछ नहीं होता "।
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आज नयी बहू ने नौकर को बड़ी बहू के कमरे से रात में निकलते देख लिया । रात आँखों आँखों में बीत गयी , किससे क्या पूछे | अगली सुबह बड़ी बहू ने उसके चेहरे को पढ़ लिया और उसे अपने कमरे में बुलाया ।
" मेरे चरित्र के बारे में कुछ धारणा बनाने से पहले मेरे पति को भी जान लो , कई कई महीने घर नहीं आता है और वहाँ क्या क्या करता है , ये सबको पता है "।
छोटी बहू स्तब्ध , कुछ कहे उससे पहले ही वो फिर बोली " और हाँ , जब शरीर को ज़रूरत होती है तो सही गलत कुछ नहीं होता "।

ग्राहक सेवा--

" साहब , पइसा जमा करना है , पर्ची नाहीं दिखत है | मिल ज़ात त बड़ा मेहरबानी होत ", डरते डरते उसने कहा |
" अब केतना पर्ची छपवायें हम लोग , पता नाहीं कहा चुरा ले जाते हैं सब ", बड़बड़ाते और घूरते हुए हरिराम स्टेशनरी रूम में घुसे | थोड़ी देर बाद जमा पर्ची लाकर उसके सामने पटक दिया और बोले " बस एक ही लेना , कुछ भी नहीं छोड़ते लोग यहाँ "|
पूरे गाँव को पता था , हरिराम के व्यवहार के बारे में लेकिन सब झेल जाते थे | एक ही तो शाखा थी बैंक की वहां और सबको वहीँ जाना होता था | एकाध ने मैनेजर से शिकायत की लेकिन उलटे वो उन्ही पर भड़क गया | उसे पता था की वो तो कम ही समय रहता है बैंक में , ज्यादातर काम तो हरिराम ही निपटा देता है | शायद उसमे हिम्मत भी नहीं थी हरिराम को बोलने की |
खैर उसने पर्ची भरी और जमा करने काउंटर पर पहुंचा | रोकड़िया महोदय नदारद थे और उसकी हिम्मत नहीं थी कि किसी से पूछे | पहले से खड़े कुछ लोगों ने बताया कि आधे घंटे से गायब हैं महोदय | खैर थोड़ी देर बाद वो पधारे और सबसे आगे खड़े व्यक्ति की पर्ची लेकर उसे डांटने लगे " पर्ची भी ठीक से नहीं भरते तुम लोग और चले आते हो हमारा सरदर्द बढ़ाने "| जैसे तैसे उसका नंबर आया , पर्ची पकड़ाते समय उसका दिल बुरी तरह घबराया हुआ था | रोकड़िया ने एक बार जमा पर्ची देखी और वापस फेंकते हुए बोला " अरे न तो शाखा का नाम लिखा और न हस्ताक्षर किया , अब क्या ये भी हम ही करेंगे "| उसने पर्ची पर शाखा का नाम लिखा और नीचे हस्ताक्षर किया और डरते हुए फिर पर्ची रोकड़िया की तरफ बढ़ाई |
एक बार फिर रोकड़िया महोदय गायब थे , शायद पान खाने का समय हो गया था उनका | उसके सामने इंतज़ार करने के सिवा कोई चारा नहीं था | वापस आने पर एक बार नोट हाँथ में लेकर देखते और एक बार उसको | उसका दिल तो ऐसे धड़क रहा था जैसे उसने खुद नक़ली नोट छाप के दिया हो , लेकिन शुक्र था कि रोकड़िया महोदय ने बिना नुक़्ता चीनी किये पैसे को ले लिया और आधी पर्ची फाड़ के उनको पकड़ा दिया | अब वो वापस मुड़ा और पासबुक में इंट्री कराने के लिए दूसरे काउंटर पर पहुंचा |
काउंटर बंद था , कोई नहीं था वहां और हरिराम ने दूर से ही चिल्ला कर बताया " कल आना , आज नहीं होगी इंट्री ", और वो थके क़दमों से बैंक के बाहर निकल गया | बैंक के गेट पर लिखा स्लोगन " हम ग्राहकों से हैं , ग्राहक हमसे नहीं है " उसका मज़ाक उड़ा रहा था |

मर्म--

" ये नदी का किनारा , ये शीतल हवा , किसी और दुनियाँ में आ गए हों जैसे " , राहुल बोलते बोलते खो सा गया |
कृति को भी लग रहा था कि कितना सुकून है यहाँ , महानगर के भागमभाग , प्रदूषण और शोर से दूर , एक अलग ही दुनियाँ |
" उस वीतरागी को देखो , अपने स्वान के साथ इन सब से परे कितने मज़े में चला जा रहा है | काश हम भी ऐसी ज़िन्दगी जी पाते "|
" जिम्मेदारियों से भाग कर सुकून की तलाश पलायन कहलाता है कृति | हम तो इस समाज में रह कर परिवार , समाज और इंसानियत के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को निभा कर ही सुकून पा सकते हैं "|
कृति के मन में जैसे असंख्य कपोत उड़ने लगे , उसे जीवन का मर्म समझ में आ गया |

मंज़िल--

" अब तो ठहर जाओ बाबा , यहाँ विश्राम कर लो | आखिर कब तक तुम्हारी यात्रा अनवरत जारी रहेगी ", घाट ने आवाज़ लगायी सन्यासी को |
" लेकिन मुझे तो मंज़िल की तलाश है , वो दूर उस पार शायद मेरी मंज़िल है | बस ये नदी ही तो पार करनी है ", बाबा के क़दमों ने रुकने से इंकार कर दिया | 
उनके सफर का साथी श्वान भी बिना रुके उनके साथ चल रहा था और घाट पर बैठे कबूतरों ने भी आसमान में उड़ान भर कर उनका मार्ग प्रशस्त कर दिया | मंज़िल पाने का हौसला अब कामयाबी में बदल रहा था |

Wednesday, May 13, 2015

भविष्य--

कितना कुछ सहा था उसने अपने जीवन में , अब बस एक ही जिद थी कि अपने बच्चे को शिक्षा की रोशनी से वंचित नहीं रखेगी |
आज लालटेन की मद्धम रोशनी उसे एहसास दिला रही थी कि अँधेरा कितना भी घना क्यूँ न हो , रोशनी की एक किरण ही काफी होती है उसे दूर करने के लिए | अब वो उस रोशनी में अपने बच्चे का उज्जवल भविष्य देख रही थी |

परिमार्जन--

" मम्मी " सुनते ही रत्ना झट से जग गयी और बीमार बेटी का सर सहलाने लगी | शाम से उसे बुखार था और रह रह कर उसे खांसी भी आ रही थी | दवा ला दी थी उसने और वो भी उसका पूरा ध्यान रख रहा था | धीरे धीरे बेटी नींद की आगोश में समा गयी और रत्ना भी उसका हाँथ पकड़े सो गयी |
उसकी आँखों से नींद गायब थी , अचानक उसके कदम घर के किनारे वाले कमरे की ओर बढ़ गए | माँ के खांसने की आवाज़ सुनाई दे रही थी और वो उसे दबाने की भरपूर कोशिश कर रही थी | उसे रत्ना का चिल्लाना याद आ गया कि इनकी खांसी के चलते उसे नींद नहीं आती है | धीरे से उसने खांसी का सिरप उठाया और माँ को उठाकर पिलाने लगा | पता नहीं कब वो माँ का हाथ पकड़े पकड़े सो गया , शायद अपनी गलती सुधारने की संतुष्टि मिल गयी थी |

विसंगति--

" अरे रामू , तुम वापस कब आये , फिर से घर का काम करोगे "? 
" क्या करता साहब , बेटा तो अपनी नौकरी पर चला जाता था और रात देर से लौटता था "।
" तो क्या , आराम से घर पर रहते , बहू और बच्चों के साथ समय बिताते "। 
" अब क्या कहूँ साहब , आप कम से कम हमें नौकरों जैसा तो समझते हो , पर बहू तो .. "?