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Sunday, May 17, 2015

मंज़िल--

" अब तो ठहर जाओ बाबा , यहाँ विश्राम कर लो | आखिर कब तक तुम्हारी यात्रा अनवरत जारी रहेगी ", घाट ने आवाज़ लगायी सन्यासी को |
" लेकिन मुझे तो मंज़िल की तलाश है , वो दूर उस पार शायद मेरी मंज़िल है | बस ये नदी ही तो पार करनी है ", बाबा के क़दमों ने रुकने से इंकार कर दिया | 
उनके सफर का साथी श्वान भी बिना रुके उनके साथ चल रहा था और घाट पर बैठे कबूतरों ने भी आसमान में उड़ान भर कर उनका मार्ग प्रशस्त कर दिया | मंज़िल पाने का हौसला अब कामयाबी में बदल रहा था |

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