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Thursday, September 21, 2017

सुख और दुःख-- लघुकथा

"लकवा मार गया है, अब बिस्तर पर ही रहना पड़ेगा इसको| शायद मालिश और दवा से कुछ फायदा हो और चलने फिरने लायक हो जाए कुछ दिन में", डॉक्टर ने एक कागज पर कुछ दवा लिखा और बाहर निकलने लगा|
"हस्पताल में भर्ती कराने से कुछ फायदा होगा क्या डॉक्टर साहब", बिटिया ने पूछा|
"कह नहीं सकता, हो भी सकता है", कहकर डॉक्टर निकल गया|
"माँ, बापू को हस्पताल ले चलते हैं, शायद ठीक हो जाए", बिटिया ने माँ की तरफ देखते हुए कहा|
उसने एक बार खाट पर पड़े लल्लू को देखा और फिर अपनी कमर में बंधे गांठ से कुछ रुपये निकाले|
"जा जरा पंसारी के यहाँ से टमाटर और प्याज तो ले आ", उसने बिटिया को रुपये पकड़ाते हुए कहा| बिटिया अचरज से उसका मुंह देखने लगी "अरे तू पगला गयी है, बापू खटिया पर पड़ा है और तुमको सब्जी की पड़ी है| बापू को कल हस्पताल ले चलते हैं किसी तरह"|
"रहने दे उसको ऐसे ही, कम से कम अब मुझे लात घूंसे तो नहीं लगाएगा| खाने के लिए तो वैसे भी मैं ही कमाती थी, यह तो सिर्फ दारू और मारपीट के लिए कमाता था| जा जल्दी से सामान लेकर आ, आज ठीक से खाना खाएंगे", कहकर उसने एक बार अपने पल्लू से आंसू पोंछा और जाकर लल्लू के सिरहाने बैठ गयी| बिटिया ने थोड़ी देर उसको और बापू को देखा और धीरे से किवाड़ भिड़काकर बाहर निकल गयी|

Tuesday, September 19, 2017

समझ-- लघुकथा

जैसे ही वह ऑफिस से लौटी एक बार फिर वही नज़ारा उसके आँखों के सामने था| कितना भी समझा ले, न तो बेटा समझता था और न ही बाप, दोनों अपने आप को ही समझदार मानते थे| उसके घर में घुसते ही कुछ पल के लिए दोनों खामोश हो गए और उसकी तरफ फीकी मुस्कान फेंकते हुए देखने लगे|
"कब समझोगे तुम विक्की, मान क्यों नहीं लेते कि वह तुमसे ज्यादा समझते हैं| आखिर पिता हैं तुम्हारे, तुमसे ज्यादा दुनिया देखी है उन्होंने", कहते हुए बैग उसने टेबल पर रखा और सोफे पर अधलेटी हो गयी|
राजन ने उसकी तरफ आश्चर्य से देखा, अक्सर तो इसके विपरीत ही होता था, आज ऐसा क्या हो गया| तब तक विक्की बोल पड़ा "उम्र या अनुभव ज्यादा होने से अगर व्यक्ति समझदार होता तो अपना माली काका हम सबसे समझदार होता माँ"|
बात बहुत तीखी थी और उसके दिल पर लग गयी| लेकिन उसने इसको नज़रअंदाज करते हुए कहा "तुलना करते समय लोगों की परिस्थिति और उनके बौद्धिक स्तर को भी ध्यान में रखना चाहिए विक्की"|
"यही तो मैं भी कहता हूँ, पापा जब तब अपने दोस्तों के बेटों से मेरी तुलना करते रहते हैं| मैं उनकी तरह एम बी ए करके इनके बिज़नेस में लग गया होता तो इनकी नज़र में मैं बेहतर होता", विक्की ने अपने पिता की तरफ देखते हुए कहा|
"तो क्या तुम ही समाज सुधार का काम करने के लिए पैदा हुए हो| जब पेट भरा हो तो मुँह से ऐसी बातें खूब निकलती हैं, दो निवाले के लिए तरसते तब समझ में आता", राजन का लहज़ा भी बहुत तल्ख़ हो गया था|
विक्की ने एक बार उसकी तरफ देखा, वह सोच नहीं पा रही थी कि अब किसे समझाए|
विक्की अपने पिता की तरफ मुड़ा और बेहद संयत स्वर में बोला "आप जो सोच रहे हैं, वह ठीक नहीं है पिताजी| मैं भी अगर निवाले को तरस रहा होता तो यह सब सोच भी नहीं पाता, भरे हुए पेट से जब मैं उन भूखे लोगों के बीच में जाता हूँ तो उनको बेहतर समझ पाता हूँ, आप नहीं समझेंगे"|
उसके राजन की तरफ देखा, राजन भी शायद समझ रहे थे लेकिन उनका पिता भाव उनको यह मान लेने से रोकता था| वह सोफे से उठी, राजन की तरफ मुस्कुरा कर देखा और विक्की के सर पर हाथ फेरते हुए किचन की तरफ बढ़ गयी|

एक छोटी सी बात-- लघुकथा

बहुत परेशान थे मिसिरजी, अब इस उम्र में पिताजी को समझाना चीन को समझाने जैसा था| पिछले कुछ महीनों की घटनाएं भी उनकी परेशानियों में इज़ाफ़ा ही कर रही थीं| जितना ही वह सोचते कि माहौल थोड़ा सुधरे तो पिताजी को समझायें उतना ही सब उल्टा हो रहा था| एक ही मोहल्ले में रहते हुए उन्होंने कभी फ़र्क़ महसूस नहीं किया लेकिन पिताजी तो जैसे अलग ही सोचने लगे थे|
हर त्यौहार और हर सुख दुःख उन्होंने साथ ही मनाया और बांटा था| पहले तो पिताजी ही उनको भेजते थे कि जाओ और उनके साथ मिल कर खेलो, लेकिन अब तो जैसे उस घर की तरफ देखना भी नहीं चाहते थे| उस दिन तो रफ़ीक चाचा ने भी कहा "अमां नाहक ही परेशान हो रहे हो, अब इस उम्र में तो ऐसा होता ही है| तुम्हारे पिताजी तो फिर भी ठीक हैं, हमारे अब्बाजान तो इस उम्र में आते आते इतने बड़े नमाजी हो गए थे कि उनका बस चलता तो हम सब को सिर्फ इबादत में ही बैठा के रखते| अल्लाह उनको सुकून अता फरमाए"|
लेकिन उनको तो महसूस होता ही था कि अब रफ़ीक़ चाचा या उनके परिवार के लोग पहले की तरह बेधड़क उनके घर नहीं आते थे, हाँ उनका परिवार पिताजी से नजर बचाकर गाहे बगाहे उनके घर जरूर हो आता था|
मिसिरजी को लग रहा था कि अब कुछ नहीं हो सकता और इसी उधेड़बुन में खोये ऑफिस चले गए| शाम को अचानक घर से फोन आया कि जल्दी घर आओ, पिताजी बहुत बीमार हैं तो वह भागते हुए घर पहुंचे| घर में घुसते ही पत्नी मिल गयी और उनके कुछ पूछने से पहले ही उनका हाथ पकड़कर पिताजी के कमरे की तरफ ले चली| कमरे में पिताजी बिस्तर पर लेटे हुए थे और आरिफ चाचा का पोता उनको रामायण पढ़कर सुना रहा था|
आहट सुनकर पिताजी ने उनकी तरफ देखा और उनकी निगाहें बिना कुछ कहे बहुत कुछ कह गयीं| 

जड़ें-- लघुकथा

घर में घुसते ही उसे लग गया कि आज भी पिताजी कुछ अनमने से हैं, अब यह बात उसे परेशान करने लगी थी| कमरे में पहुँच के उसने शर्ट उतारी तब तक मिन्नी भी आ गयी| जब मिन्नी के बढ़े हुए हाथ से उसने पानी का ग्लास नहीं लिया तो मिन्नी को भी खटका|
"क्या बात है, आज परेशान हो, कुछ खास वजह?, मिन्नी ने ग्लास मेज पर रखते हुए कहा|
"पता नहीं मैं सच सोच रहा हूँ या गलत, लेकिन मुझे लगता है जैसे पिताजी आजकल कुछ उदास रहने लगे हैं", उसने पानी का ग्लास उठाते हुए कहा|
"मैं तो हमेशा उनसे बात करती रहती हूँ, अक्सर उनसे पूछ कर ही खाना बनाती और खिलाती हूँ, कहीं तुम कुछ और तो नहीं सोच रहे?, मिन्नी के माथे पर चिंता की लकीरें फ़ैल गयीं|
"अरे तुम तो उनका जितना ख्याल रखती हो, उतना तो मैं भी नहीं रखता| लेकिन उनकी उदासी की वजह जानना जरुरी है, आज ही पूछता हूँ", कहकर वह ड्राइंग रूम में चल दिया| मिन्नी भी पीछे पीछे आयी और खड़ी हो गयी|
"क्या बात है पिताजी, आप आजकल थोड़े उदास लग रहे हैं? माँ की याद आ रही है क्या आजकल", उसने पिताजी के मन को हल्का करने की कोशिश करते हुए कहा|
पिताजी इस अचानक हुए सवाल से चौंक गए और संभलते हुए बोले "अभी तू थका मांदा ऑफिस से आ रहा है और ये सब क्या बात करने लगा| अरे बेटी तूने इसे पानी वानी दिया कि नहीं", बात टालने की गरज से पिताजी ने कहा|
"नहीं पिताजी, सच सच बताईये, पहले तो आप बहुत मजे में मुझसे बात करते थे लेकिन आजकल कुछ कम बात करते हैं| बेटी को भी नहीं बताएँगे आप?, मिन्नी ने भी पिताजी के पास बैठते हुए कहा| 
"कोई बात नहीं है, अब इस बंगले में किसी चीज की कमी भी तो नहीं है, हर सुख सुविधा तो है यहाँ| बस ऐसे ही कभी कभी हो जाता है, अब उम्र भी तो हो चली मेरी", पिताजी ने स्नेह से मिन्नी के सर पर हाथ फेरा|
"तो फिर आप पहले जैसे खुश रहा कीजिये ना, हमारे लिए ही सही", मिन्नी ने एक बार फिर उनसे मनुहार किया|
"अरे तू चिंता मत कर, मैं बहुत खुश रहता हूँ| बस तू एक काम कर सकता है क्या, बंगले के पिछवाड़े का फर्श हटाकर वहां मिट्टी की एक क्यारी बनवा दे, मिट्टी से बहुत दूर हो गया हूँ आजकल", पिताजी ने जैसे कुछ याद करते हुए कहा|
अब उसे समझ में आ गया था, किसान पिता को मिट्टी से दूर करके वह कैसे खुश रख सकता है| उसने मिन्नी की तरफ देखा और दोनों मुस्कुरा पड़े|
पिताजी इन सबसे बेखबर दूर कहीं अपने गांव और खेतों में खो गए थे|

Monday, September 11, 2017

सिंदूर-- लघुकथा

बगल वाली खोली से हंसने की आवाज़ आ रही थी और रानू के बड़े बेटे की आवाज़ भी "आज नौकरी की चिट्ठी मिल गयी माई, बहुत जल्दी यहाँ से निकल जायेंगे"| उसके हाथ झाड़ू लगाते हुए रुक गए और वह सोचने लगी कि जाकर रानू को बधाई दे या नहीं| उसकी नज़र एक कोने में पड़े अपने पति पर पड़ी जो दारू पीकर बेसुध सोया पड़ा था और उसके मुंह से लार बहकर चेहरे पर फ़ैल गया था|
कुछ ही दिन पहले वह कितना खुश थी कि उसका पति उस गटर में नहीं गया था| उस दिन भी वह इसी तरह दारू पीकर पड़ा हुआ था और रानू का पति चला गया था गटर साफ़ करने| फिर कुछ ही घंटों में उसका शव बाहर निकला और उसने अपने सिंदूर की सलामती के लिए भगवान को ढेर सारा धन्यवाद दिया|
बाद में जैसे जैसे खबर आती गयी कि रानू को बड़ा मुवावज़ा मिलेगा और उसके बेटे को नौकरी भी मिलेगी, उसका दिल बैठने लगा| पुरे दिन हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी उसे दो जून की रोटी मुश्किल से मिलती थी और उसपर निकम्मा पति दारू पीकर मारपीट करता और घर में पड़ा रहता| बेटा भी अब अपने बाप के नक़्शे पर चलने लगा था और कभी कभी वह भी दारू पीकर आता था|
यही सब सोचते विचारते वह भारी मन से रानू के खोली में पहुंची| रानू के बेटे ने उसे ख़ुशी ख़ुशी एक मिठाई खिलाई और उसने भी फीकी हंसी हँसते हुए उसको आशीर्वाद दिया| रानू की सूनी मांग को देखकर एक बार फिर उसे अपना सिंदूर अच्छा लगने लगा लेकिन उसके घर में आये बदलाव को वह देखती रह गयी|
हाथ में मिठाई लिए वह वापस अपनी खोली में पहुंची और पति को जगाने लगी| पति के उठते ही एक बदबू का झोंका उसके आस पास तैर गया और वह उबकाई लिए हुए नल की तरफ चली गयी| मुंह धुलने के बाद नल के ऊपर लगे आईने में उसको अपना चेहरा दिखा, माथे का सिंदूर काफी धुल चुका था| एक बार फिर उसने अपने शराबी पति को हताशा से देखा और फिर थोड़ा सा पानी लेकर अपने माथे का पूरा सिंदूर पोंछ दिया|

फंदा-- लघुकथा

"मैं उसे मारना नहीं चाहता था सर, बस उसका मुंह दबा कर उसे किडनैप करना चाहता था| मुझसे अनर्थ हो गया, अब जो चाहे सजा दिलवा दीजिये", बोलते बोलते सोनू फूट फूट कर रोने लगा|
"बस किडनैप करने के चक्कर में तूने उस मासूम का खून कर दिया, पैसों के चक्कर में तुम लोग कुछ भी कर सकते हो| तुझ जैसे दरिंदों को तो समाज में जिन्दा रहने का कोई हक़ नहीं है", इन्स्पेक्टर ने शब्दों को चबाते हुए कहा| पुलिस स्टेशन में काफी भीड़ इकठ्ठा हो गयी थी और तब तक बच्चे के पिता डॉ सरकार भी पहुँच गए|
"इसे जिन्दा मत छोड़ना सर, हत्यारा है यह, अरे क्या बिगाड़ा था मेरे बच्चे ने तेरा", कहते हुए डॉ वहीं रखी कुर्सी पर लुढ़क गए| पास खड़े एक व्यक्ति ने उनके चेहरे पर पानी छिड़का और कुछ और लोग उनको सँभालने लगे|
सोनू हाथ जोड़े खड़ा था और पुलिस उसके खिलाफ रिपोर्ट लिख रही थी| तब तक डॉ फिर से बिफर पड़े "अरे तेरे जैसे हत्यारों को तो चौराहे पर फांसी दे देनी चाहिए"|
सोनू ने एक बार डॉ की तरफ देखा और फिर हाथ जोड़े हुए ही उसने कहा "डॉ साहब मेरे बच्चे का क्या कसूर था, क्यों आपने सिर्फ पैसे के लिए उसे अपने यहाँ भर्ती करने से मना कर दिया था?
डॉ सरकार ने उसे गौर से देखा और उनको कुछ दिन पहले का वाकया याद आ गया| इसी का बच्चा था जिसे उन्होंने भर्ती करने से मना कर दिया था और वहीँ बच्चे की मौत हो गयी थी| वह धीरे से कुर्सी से उठे और वापस मुड़ गए, रास्ते में हर चौराहे पर उनको फांसी का फंदा लटकता नज़र आ रहा था|

Sunday, June 4, 2017

आज का समय-- लघुकथा

"क्या क्या सहूलियत नहीं दी थी पढ़ने के लिए और नतीजा सिफर", एकदम आपा खो बैठी थी वह बेटे का रिजल्ट देखकर|
"पर माँ नंबर तो ठीक ही आये हैं और पास भी हो गया हूँ", बेटे ने प्रतिकार करना चाहा|
"क्या खाक नंबर आये हैं, जिसको देखो व्ही अपने बच्चे का १० सीजीपिए बता रहा है| आजकल किसी अच्छे कालेज में मिलता है दाखिला इन नंबर से", वह अभी भी उतने ही गुस्से में थी|
"मैंने तो पहले ही कहा था कि मेरा मन पढ़ने में बहुत नहीं लगता, फिर भी मैंने अपनी तरफ से पूरी मेहनत कि थी", बेटे ने एक बार और अपनी बात रखनी चाही|
"अब लोग पूछेंगे तो क्या बताउंगी इसके बारे में" कहते हुए वह सोफे पर धंस गयी|
"लोगों ने कभी मेरे बारे में पूछा है तुमसे, मैं तो हमेशा द्वितीय श्रेणी में ही पास हुआ| और ऐसे वक़्त में तो हमारे सहारे कि जरुरत है उसको, न कि इस तरह से हतोत्साहित करने की", उसने पत्नी के कंधे पर हाथ रखा|
"वो समय और था, आज कितना कम्पटीसन है आपको तो पता ही है", पत्नी का स्वर अब थोड़ा मद्धिम था|
"यह जीवन का अंत नहीं है, बस एक पड़ाव है, उसे अपने हिसाब से आगे बढ़ने दो| और तुम सच कह रही हो, अब समय बदल गया है, आज के बच्चे अपना भविष्य खुद सोच सकते हैं", कहते हुए उसने बेटे को अपने आगोश में भर लिया|
उसने भी बेटे को अपनी बाँहों में भींच लिया और उसके ललाट पर चुम्बन जड़ दिया|