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Thursday, July 31, 2014

हरियाली

"कितनी अच्छी लगती है न ये हरी भरी घाँस , ये हरियाली"। बच्चे ने कहा तो पिता बीते समय में खो गया । 
कभी उसने भी अपने पिता से यही बात कही थी तो पिता ने जवाब दिया था " ये पर्यावरण ही हमारी सबसे बड़ी पूँजी है , इसे सँभाल कर रखना । आने वाली पीढ़ियों को अगर हम एक हरा भरा वातावरण दे सकें तो उससे बड़ी कोई भेंट नहीं दे सकते उन्हें " । 
आज वो अपने बच्चे को भी यही शिक्षा दे रहा था ।

Tuesday, July 29, 2014

श्राद्ध--

" अरे पनीर की सब्ज़ी कहा है, जल्दी लाओ, यहाँ ख़त्म हो गयी", बड़े भैया ने आवाज़ लगायी और आगे बढ़ गए| कई पंगतों में लोग बैठ कर श्राद्ध का भोजन कर रहे थे, काफी गहमागहमी थी दरवाजे पर| सारे रिश्तेदार और अगल बगल के गांव से भी लोग खाने आये हुए थे| थोड़ी दूर ज़मीन पर कुछ और लोग भी बैठे थे जो हर पंगत के उठने के बाद पत्तल वगैरह बटोरते, उसे ले जाकर किनारे रख देते और जो कुछ भी खाने लायक बचा होता था, वो सब अपने बर्तनों में रख लेते थे|
खटिया पर लेटे हुए बाबूजी सब देख रहे थे, उनके दिमाग में पिछले कुछ सालों की घटनाएँ घूमने लगीं| माँ एकदम से बीमार पड़ी और उसने बिस्तर पकड़ लिया| बड़ा बेटा विदेश में था, छोटे के साथ ही रहते थे दोनों| खाने के नाम पर पतली खिचड़ी मिल जाती थी माँ को , लेकिन शायद बुढ़ापे में इच्छाएं और जोर मारने लगती हैं, तो माँ की भी इच्छा होती थी कि वो कुछ चटपटा खाए, और पनीर तो बहुत ही प्रिय था उसे| एक आध बार कहा भी उसने कि पनीर खाने का मन है लेकिन वो कह नहीं पाये बहू से|
अचानक वो उठे, धीरे से एक पनीर का डोंगा उठाया और ले जाकर उन ज़मीन पे बैठे लोगों को दे दिया| उधर उन लोगों की ख़ुशी का पारावार नहीं था, इधर बाबूजी ने एक नज़र आसमान की ओर देखा और उनकी आँखों से दो बूँद आँसू टपक पड़े| 

Saturday, July 26, 2014

ख़्याल--

आज अचानक बेटा अपने बीबी बच्चों सहित गांव पंहुचा तो उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। कहाँ तो बुलाने पे भी कोई न कोई बहाना बना देता था और अगर आया भी तो अकेला और उसी दिन वापस।
" दादा दादी के पैर छुओ बच्चों" , और बहू ने भी झुक के पैर छुए दोनों के। फिर बहू ने लाड़ दिखाते हुए कहा " क्या बाबूजी, आप कितने दुबले हो गए हैं, लगता है माँ आपका ध्यान नहीं रख पाती, अब आप लोग हमारे साथ ही चल कर रहिये"।
"हाँ, हाँ, क्यों नहीं, बिलकुल अब आप लोग चलिए हमारे साथ, क्या रखा है अब यहाँ", बेटा भी कहने लगा और माँ के पास बैठ गया।
ये क्या हो गया है इनको, इतना परिवर्तन कैसे हो गया, समझ नहीं पा रहे थे बाबूजी कि अचानक अख़बार की खबर का ध्यान आ गया। उसके गाँव के बगल से बाईपास ( सड़क) निकल रहा था और अब वहाँ की जमीनों के दाम कई गुना बढ़ गए थे।  

सावन

"क्या मौसम है , चारो तरफ कीचड़ ही कीचड़ , घर से निकलना मुश्किल । सारे कपडे ख़राब हो गए", दीप्ती का बड़बड़ाना चालू था ।
सच में माँ , बड़ा ख़राब मौसम है ये बारिश का , बाहर निकलो तो एक तो कपड़े ख़राब हो जाते हैं और दूसरे जल्दी सूखते भी नहीं । बेटी ने भी हाँ में हाँ मिलायी ।
उधर गांव में किसान बारिश को देखकर हर्षित हो रहा था कि फ़सल नहीं सूखेगी और प्रार्थना कर रहा था कि बरखा रानी , जरा जम के बरसो । पेड़ों पर झूले पड़े हुए थे ,बारिश में भींगते हुए भी लड़कियाँ झूल रही थीं और कही रेडियो पर गाना बज रहा था "सावन के झूले पड़े" । 

दुर्भाग्य-

समय से बड़ा कोई नहीं होता शायद | इतने प्रतिभाशाली छात्र की ये दशा होगी , किसने सोचा था | दसवी की परीक्षा में पूरे जिले में उसका स्थान था | लेकिन उसके बाद उसे पढ़ने के लिए आपने क़स्बे से बाहर जाना पड़ा | 
घर की माली हालत के मद्देनजर दूर के एक रिस्तेदार के यहाँ रुक के पढ़ाई करने का प्रयास करने लगा | नयी जगह में मुश्किलें तो आ रही थी लेकिन उसका ध्यान आपने लक्ष्य और माँ पिताजी के सपनो पर था | बाक़ी सब तो ठीक था लेकिन उस घर का लड़का पढ़ने में बिलकुल गया गुजरा था | उसके पिताजी अक्सर उसके सामने इसकी खूब तारीफ करते और अपने पुत्र को कोसा करते | ये भला उसकी माँ को कैसे गवारा होता और वो अंदर ही अंदर उससे जलने लगी |
परीक्षा बिलकुल सर पे आ गयी थी और वो पूरी मेहनत से पढ़ाई में लगा था । एक दिन जब वो कॉलेज से आया तो उसके कमरे में सब कुछ बिखरा पड़ा था , किताबें और नोट्स सब फ़टे पड़े थे | सारा कसूर एक कुत्ते पर डाल दिया गया , कि उसी ने ये किया । वो संज्ञाशून्य हो गया , क्या करे कुछ समझ नहीं आ रहा था । आखिरकार किसी तरह से उसने परीक्षा तो दी लेकिन एक विषय में फेल हो गया । और जिस दिन रिजल्ट आया , उसी दिन वो अपना मानसिक संतुलन खो बैठा ।

प्रमोशन--

" क्या बात है, बड़ी खुश नज़र आ रही हो", राजीव ने आते ही पूछा।
" सच में मैं बहुत खुश हूँ आज, मेरा प्रमोशन हो गया"।
" अरे, मैंने मना किया था ना, अब अगर ट्रांसफर भी हो गया तो माँ की देखभाल कौन करेगा और बच्चों की पढ़ाई का ध्यान"?
" तुमने भी तो कोशिश की थी प्रमोशन के लिए, अगर तुम्हारा हो जाता तो तुम्हारा ट्रांसफर भी तो हो सकता था न"।
" तो, रिफ्यूजल दे देना कल"।  

Friday, July 25, 2014

तस्वीर--

"इतनी कम उम्र और उसपर कंधे पर ये बोझ , कैसे संभालती होगी ये बच्ची । क्या जमाना आ गया है , ये गरीबी और बेचारगी जो न करा दे"। उस फोटोग्राफ को देखकर लोगों के मुँह से यही निकल रहा था ।
बगल में खड़ा फोटोग्राफर खुश था कि इन बच्चों ने कभी मॉडलिंग तो नहीं की थी लेकिन इनकी फोटो बड़ी अच्छी आई ।