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Tuesday, July 29, 2014

श्राद्ध--

" अरे पनीर की सब्ज़ी कहा है, जल्दी लाओ, यहाँ ख़त्म हो गयी", बड़े भैया ने आवाज़ लगायी और आगे बढ़ गए| कई पंगतों में लोग बैठ कर श्राद्ध का भोजन कर रहे थे, काफी गहमागहमी थी दरवाजे पर| सारे रिश्तेदार और अगल बगल के गांव से भी लोग खाने आये हुए थे| थोड़ी दूर ज़मीन पर कुछ और लोग भी बैठे थे जो हर पंगत के उठने के बाद पत्तल वगैरह बटोरते, उसे ले जाकर किनारे रख देते और जो कुछ भी खाने लायक बचा होता था, वो सब अपने बर्तनों में रख लेते थे|
खटिया पर लेटे हुए बाबूजी सब देख रहे थे, उनके दिमाग में पिछले कुछ सालों की घटनाएँ घूमने लगीं| माँ एकदम से बीमार पड़ी और उसने बिस्तर पकड़ लिया| बड़ा बेटा विदेश में था, छोटे के साथ ही रहते थे दोनों| खाने के नाम पर पतली खिचड़ी मिल जाती थी माँ को , लेकिन शायद बुढ़ापे में इच्छाएं और जोर मारने लगती हैं, तो माँ की भी इच्छा होती थी कि वो कुछ चटपटा खाए, और पनीर तो बहुत ही प्रिय था उसे| एक आध बार कहा भी उसने कि पनीर खाने का मन है लेकिन वो कह नहीं पाये बहू से|
अचानक वो उठे, धीरे से एक पनीर का डोंगा उठाया और ले जाकर उन ज़मीन पे बैठे लोगों को दे दिया| उधर उन लोगों की ख़ुशी का पारावार नहीं था, इधर बाबूजी ने एक नज़र आसमान की ओर देखा और उनकी आँखों से दो बूँद आँसू टपक पड़े| 

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