Translate

Monday, June 29, 2015

वज़ह-

" अरे यार , तलाक़ क्यूँ नहीं दे देते उसको । इतनी परेशानियाँ झेल कर भी निभाए जा रहे हो "।
वो सोच में डूब गया , सच ही तो कह रहा है ये ।
" कहीं तुम समाज के चलते तो नहीं हिचक़ रहे , ये समाज भी कहीं किसी का भला करता है "।
अचानक उसके आँखों सामने बेटी का चेहरा आ गया ।
" खैर , समाज का तो ठीक कहा तुमने , लेकिन जब तुम भी बेटी के पिता बनोगे तो समझ जाओगे "।  

Sunday, June 28, 2015

ग़ज़ल--

जिंदगी कैसे कहें , तेरे सवाल कितने हैं
आओ फिर से देखें , बाक़ी मलाल कितने हैं
गुज़र तो रही थी , अपनी ये पुरसुकूँ शामें
लगता है यूँ अब , सचमें बवाल कितने हैं
जब भी कहा , बस ग़लत ही कहा हमसे
सच के इन दिनों , आते ख़याल कितने हैं
आईना भी अब तो , मुँह झट से मोड़ लेता है
दिखता अब उसको , सच्चे ज़लाल कितने हैं !!


अमर प्रेम --

" अरे कहाँ हो स्वीट हार्ट , फ़ोन भी नहीं उठा रही आजकल "।
" कौन ? सॉरी , मेरे फोन के कॉन्टेक्ट्स डिलीट हो गए हैं "।
अभी वो कुछ और कहता कि उसको सुनाई पड़ा " दुनियाँ कहीं भी पहुँच जाये , ये लड़के नहीं सुधरने वाले । दूसरे की कार लेकर डेट पर ले जाते हैं और सोचते हैं कि हमें पता नहीं चलेगा , इनका तो !
आगे के शब्द वो नहीं सुन पाया , मोबाइल हाँथ से छूट गया ।

हौसले--

पूरी क्लास में सन्नाटा छा गया , किसी ने ये उम्मीद नहीं की थी कि वनिता ऐसा चित्र बनाएगी । कला की कक्षा में सभी छात्रों को उनके सपने को चित्र में उतार कर लाने के लिए कहा गया था और सबने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की थी उसे साकार करने की । 
पर बैसाखी के सहारे चलने वाली लड़की आसमान छूने की ख़्वाहिश रखती है , किसी ने ख्वाबों में भी नहीं सोचा था ।

Thursday, June 25, 2015

ग़ज़ल--

चुने लाख हों पत्थर , नहीं देखे जाते
राह में अँधेरे हों गर , नहीं देखे जाते
जलाया रातों में हमने ,बस एक दिया
चरागाँ बुझे हों अगर , नहीं देखे जाते
खाक हो जायेंगे हम , आ के सम्भालो हमको
इश्क़ में रहज़न-ओ-रहबर नहीं देखे जाते
बड़ी मुद्दत से जिनको देखा किया था हमने
उनके बदले हुए तेवर , नहीं देखे जाते
कभी होता था सभी ओर जहाँ चैनों सुकूँ
वहीँ जलते हुए मंजर , नहीं देखे जाते
इश्क़ में जिनके रहे थे , सभी ताउम्र फ़ना
उन्हीं पहलू में अब खंजर , नहीं देखे जाते !!

अखंडित ( लघुकथा )

" आज कैसे याद किया , कोई काम था क्या ?
" नहीं यार , बस यूँ ही तुम्हारी याद आई और चला आया "|
कुछ देर बात चीत चलती रही और फिर वो उठ कर चल दिया | घर पहुँचते ही पत्नी ने पूछा " बात की उनसे , क्या कहा उन्होंने !
" हाँ , कहा तो हैं , देखो क्या होता हैं "|
" जब झूठ बोल नहीं सकते तो क्यों कोशिश करते हो | उनका फोन आया था , कह रहे थे जरूर कोई बात थी लेकिन मुझे बताया नहीं | अभी भी अपने उसूलों का पक्का हैं "|
" देखो तुम्हारे इतना कहने पर मैं चला तो गया था लेकिन कहते नहीं बना | खैर कहीं न कहीं मिल ही जाएगी उसको नौकरी "|
" हाँ , कुछ न कुछ तो कर ही लेगा बेटा , लेकिन तुम्हारे उसूलों की कीमत पर नहीं " और उसने उनका हाँथ अपने हांथों में कस कर थाम लिया | उनके चेहरे पर गहरे सुकून का भाव छा गया ये सोचकर कि उनके उसूल अभी भी अक्षुण्ण थे | 

अंतिम संस्कार--

पिता की अचानक हुई मौत से वो टूट गया । एकदम ठीक ठाक थे , बस हल्का सा बुखार हुआ और दो दिन में चल बसे । आर्थिक स्थिति तो बदतर थी ही ,पहले माँ और अब पिताजी भी , एकदम से बड़ा हो गया वो । पुरे गाँव में ख़बर हो गयी थी और सब रिश्तेदारों को भी फोन कर दिया गया । चाचा , जो अलग रहते थे घर पर आ गए थे और अंतिम क्रिया की तैयारियों में लग गए थे ।
अंतिम संस्कार करके वापस चलते समय मौजूद सभी लोगों को रिवाज़ के अनुसार भरपेट नाश्ता कराकर वो भी चाचा के साथ ट्रैक्टर पर गाँव चल पड़ा । घर पहुँच कर चाचा ने उसको सारे खर्च का हिसाब दिया तो वो सर पकड़ कर बैठ गया । अभी तो अगले तेरह दिन तमाम कर्मकांड होने थे और उसके बाद ब्राह्मणभोज जिसमें पूरा गाँव और रिश्तेदारों को खिलाना था ।
शायद इन कर्मकाण्डों में उसके सर से माँ , बाप के बाद खेतों का साया भी उठ जाये, अब वो पूरी तरह से अनाथ हो गया था ।