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Friday, July 31, 2015

नींव--

कैमरों के फ़्लैश लगातार चमक रहे थे , पता नहीं कितने लोग ऑटोग्राफ लेने के लिए धक्का मुक्की कर रहे थे | उस जिले से वो पहला व्यक्ति था जिसका चयन टेस्ट टीम में हुआ था | भीड़ में से जगह बनाकर वो स्टेज पर पहुँचा और अपनी निर्धारित कुर्सी पर बैठ गया | मंचासीन अतिथिगण बारी बारी से उसके बारे में और उसको वहां तक पहुंचाने में अपने योगदान के बारे में बोल रहे थे और रह रह कर तालियाँ बज रही थीं |
आखिर में वह बोलने के लिए माइक के पास खड़ा हुआ | मंच पर बैठे और सभा में उपस्थित सबकी निगाह उसकी ओर गड़ी हुई थी | उसने अपने माता पिता से लेकर अपने कोच और सेलेक्टर्स सबका आभार प्रकट किया और फिर उसने एकदम पीछे बैठे बुज़ुर्ग की ओर इशारा किया और उनको मंच पर लाने का आग्रह किया |
" यही हैं मेरे चयन की नींव डालने वाले शख्स जो उस मैदान के ग्राउंड्समैन हैं | पता नहीं कितनी बार मैंने खेल छोड़ने का सोच लिया था लेकिन मेरे साथ हर समय मौजूद और मेरी हर निराशा को आशा में बदलने वाले यही हैं ", ये कहते हुए उसने अपने गले में पड़ा हार उनके गले में पहना दिया और उनके पाँव छू लिए | सभागार में तालियों की आवाज़ देर तक गूंजती रही और उस बुज़ुर्ग के आँखों से बहने वाले आंसू उसका कन्धा भिगोते रहे |  


   

Thursday, July 30, 2015

उचित सजा --

" इस गुनाह की सजा सिर्फ और सिर्फ सजाये मौत हो सकती है , मुल्ज़िम को अगले महीने की २७ तारीख़ को फाँसी दे दी जाये ", और ज़ज़ साहब ने क़लम तोड़ दी | कोर्ट रूम में सन्नाटा था लेकिन वहां उपस्थित लोगों के चेहरे पर संतुष्टि का भाव साफ़ दिखाई पड़ रहा था |
अचानक सरकारी वकील ने कुछ कहने की इज़ाज़त मांगी और कहने लगा " ज़ज़ साहब , आपका फैसला बिलकुल सही है और मैंने भी यही मांग की थी | लेकिन इस मुज़रिम को , जिसने ऐसा जघन्य अपराध किया है , इतनी आसान मौत देना शायद उचित नहीं होगा | मैं इस अदालत से मांग करता हूँ कि मुल्ज़िम को फाँसी दी जाए लेकिन उसकी तारीख़ अनिश्चित रखी जाए और इसे हर दिन मौत का इंतज़ार करने दिया जाए | शायद इससे उन मृतक आत्माओं को कुछ शांति मिलेगी जो इसकी वज़ह से काल कलवित हो गए "|
कोर्ट रूम में आवाज़ें आने लगीं , वहां मौजूद लोग इसका समर्थन कर रहे थे |

Friday, July 24, 2015

दिल ने आराम किया--

मज़हब को समझें इस कोशिश में न कभी आराम किया
जिन हाथों में क़लम थी कभी , उनसे क़त्ले आम किया
फिक्र उन्हें है बनें हमारे , मंदिर मस्जिद गुरूद्वारे
खिल जाये इक इन्सां भी , ना ऐसा कोई काम किया
आओ खोजें इस दुनियाँ में , मिलती है हर ओर नज़ीर
सजदे में ही मिले रहीम ,जो सुबह से लेकर शाम किया
कितना मुश्किल था पाना इस गम से दिल को छुटकारा
सदियोँ से तरसे थे लेकिन , अब दिल ने आराम किया
उनका भी शुकराना करलें , लाये जो इस दुनियाँ में
घूम घूम कर दुनियाँ में जब , यीशु , अल्ला , राम किया
तुझको पाने की चाहत में , गँवा दिया सब चैनों सुकूँ
रात को रो-रो सुबह किया, या दिन को ज्यों-त्यों शाम किया
दिल को इतने जख्म मिले पर गिला कभी ना किया विनय
खुशियां दे डाली सबको , बस गम को अपने नाम किया !!
 

Wednesday, July 22, 2015

कभी कभी शाम
ऐसे हो जाती है
जैसे दिन कभी
हुआ ही नहीं था
सूरज की रौशनी
और उजाले जैसे थे ही नहीं
एक अंतहीन धुंधलका छाया हो जैसे !!

Monday, July 20, 2015

किसान--

हौसला है किसान में
सदियाँ बीत गयीं
पर अब भी लड़ रहा है
प्रकृति से
अक्सर पड़ जाता है
कमज़ोर अपनी लड़ाई में
पर फिर उसी जोश
और उम्मीद से
जुट जाता है अपने उद्यम में
चीर कर धरती का सीना
बोता है बीज , उम्मीदों के , सपनो के
उगाने के लिए फ़सल संतुष्टि की
प्रकृति भी लेती है
उसी का इम्तहान
जो नहीं करता है
कभी भी प्रतिकार
बार बार हारता है वो
पर नहीं छोड़ता हौसला !!  

तहज़ीब--

गुस्से से उबल रहे थे चौहान जी , प्रदेश के कई भागों से दंगे की खबरे आ रहीं थी | उनको लग रहा था कि काश उनको मौका मिले तो वो उन सब को सबक सिखा दें | अचानक उनको याद आया और पूछा " रामलीला की सारी तैयारी हो गयी , रावण का पुतला बन गया कि नहीं ?
" हाँ , पुतला बन के आ गया है | वो पैसे लेने आया है , दे दीजिये "|
" ठीक है , भेज दो उसको अंदर "|
" कितना हुआ रहीम ?
" अरे जितना देना हो , दे दीजिये | इस काम के पैसे का मोल भाव थोड़े ही करना है "|
पैसे देते समय अचानक उनको लगा , कई पुरखों से रहीम का परिवार रावण के पुतले बना रहा है , इसने तो कभी सोचा भी नहीं होगा कि ये काम किसी और मज़हब से जुड़ा है | और यकबयक उनके हाथों ने रहीम की हथेली को कस कर पकड़ लिया |
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गुस्से से उबल रहे थे चौहान जी , प्रदेश के कई भागों से दंगे की खबरे आ रहीं थी | उनको लग रहा था कि काश उनको मौका मिले तो वो उन सब को सबक सिखा दें | अचानक उनको याद आया और पूछा " रामलीला की सारी तैयारी हो गयी , रावण का पुतला बन गया कि नहीं ?
" हाँ , पुतला बन के आ गया है | वो पैसे लेने आया है , दे दीजिये "|
" ठीक है , भेज दो उसको अंदर "|
" कितना हुआ रहीम ?
" अरे जितना देना हो , दे दीजिये | इस काम के पैसे का भी मोल भाव करूँगा "|
रहीम की बात सुनकर उनको कुछ तो हुआ और यकबयक उनके हाथों ने रहीम की हथेली को कस कर पकड़ लिया |

तहज़ीब--

" कितना भी समझाओ , सुनता ही नहीं है ये छोकरा ", चचा भन्नाए हुए थे | छोकरा भी बिलकुल हठी था , बार बार गंगू के घर चला जाता था और वहीँ खेलता और खाता |
चचा पाँचो बख़त के नमाज़ी थे और किसी गैर मज़हबी के यहाँ का पानी पीना भी क़ुबूल नहीं था उनको | लेकिन इस बच्चे का क्या करें , उसकी वालिदा उसे २ साल का छोड़ कर ही अल्लाह को प्यारी हो गयीं और लोगों के बहुत कहने पर भी वो दुबारा निकाह करने को राज़ी नहीं हुए |
यही सब सोचते वो गंगू के घर के सामने पहुंचे और आवाज़ लगाने वाले ही थे कि नज़र सोते हुए बच्चों पर पड़ी | उनका बच्चा उस घर के बच्चों के साथ बड़े सुकून की नींद सो रहा था | गौर से भी देखने पर भी उनको उन बच्चों में कोई फ़र्क़ नज़र नहीं आया |
उन्होंने दरवाज़े पर रखा लोटा उठाया और अपने हलक़ से " गंगा जमुनी " की धारणा को नीचे उतारने लगे |