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Thursday, July 30, 2015

उचित सजा --

" इस गुनाह की सजा सिर्फ और सिर्फ सजाये मौत हो सकती है , मुल्ज़िम को अगले महीने की २७ तारीख़ को फाँसी दे दी जाये ", और ज़ज़ साहब ने क़लम तोड़ दी | कोर्ट रूम में सन्नाटा था लेकिन वहां उपस्थित लोगों के चेहरे पर संतुष्टि का भाव साफ़ दिखाई पड़ रहा था |
अचानक सरकारी वकील ने कुछ कहने की इज़ाज़त मांगी और कहने लगा " ज़ज़ साहब , आपका फैसला बिलकुल सही है और मैंने भी यही मांग की थी | लेकिन इस मुज़रिम को , जिसने ऐसा जघन्य अपराध किया है , इतनी आसान मौत देना शायद उचित नहीं होगा | मैं इस अदालत से मांग करता हूँ कि मुल्ज़िम को फाँसी दी जाए लेकिन उसकी तारीख़ अनिश्चित रखी जाए और इसे हर दिन मौत का इंतज़ार करने दिया जाए | शायद इससे उन मृतक आत्माओं को कुछ शांति मिलेगी जो इसकी वज़ह से काल कलवित हो गए "|
कोर्ट रूम में आवाज़ें आने लगीं , वहां मौजूद लोग इसका समर्थन कर रहे थे |

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