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Tuesday, August 11, 2015

आज़ादी का अर्थ--

" जब तक सभी पिछड़े लोगों , महिलाओं और मज़लूमों को बराबरी का अधिकार नहीं मिल जाता , तब तक आज़ादी का कोई मतलब नहीं है ", प्रिंसिपल झण्डा फहराने के बाद भाषण दे रहे थे |
मिताली के दिमाग में सब कुछ गड्ड मड्ड हो रहा था , स्कूल में तनख्वाह के ५००० पर हस्ताक्षर करना और १००० लेना , घर पर अपने पुरुष दोस्तों को बुलाने पर पति का संकुचित और शंकालु व्यवहार और घर जाते हुए सड़क के किनारे बढ़ती झुग्गियां और ट्रैफिक सिग्नल पर भीख मांगते हुए बच्चों की बढ़ती संख्या | आज़ादी का आना अभी बाक़ी है शायद , सोचते हुए उसने लड्डू का एक टुकड़ा मुँह में डाला | लड्डू कुछ कड़वा प्रतीत हो रहा था उसे |  

Thursday, August 6, 2015

आईना--

विदाई समारोह में सारा कार्यालय इकठ्ठा था, शर्माजी ३२ साल की सेवा पूर्ण करके सेवानिवृत्त हो रहे थे| अपने पुरे कार्यकाल में उन्होंने अपनी ईमानदारी और सदाशयता बरक़रार रखी थी|
समारोह में उन्होंने सबसे पहले खुद बोलने की अनुमति मांगी और बोलना प्रारम्भ किया " मुझे पता है कि आज के दिन आप लोग मेरे बारे में बहुत अच्छा बोलेंगे क्योंकि यही रिवाज़ है| लेकिन ये मेरी दिली इच्छा है कि आप अगर मेरे बारे में कहें तो वही कहें जो मेरे लिए आपके दिल में हमेशा से रहा है| इस कार्यालय में, एक चायवाले को छोड़कर, जिसके पूरे पैसे मैंने हमेशा चुकता किया, शायद ही किसी ने मुझे समझदार समझा| मुझे कत्तई बुरा नहीं लगेगा अगर आप मेरे बारे में सच कहेंगे, लेकिन कृपया आज के दिन झूठ मत कहियेगा "|
एक सन्नाटा पसर गया था, ऐसे आईने की उम्मीद किसी को नहीं थी| 

Tuesday, August 4, 2015

छतिपूर्ति--

" हमें ऐसे कर्तव्यनिष्ठ कर्मचारी कहाँ मिलेंगे , इनका जाना हमारी कम्पनी के लिए अपूरणीय छति है | काश ऐसे कुछ लोग हों तो हमारी कम्पनी हमेशा अग्रणी रहे ", सेवानिवृत्ति के दिन मालिक के ये उद्बोधन उनकी हिम्मत बढ़ा रहे थे |
लेकिन उनके सेवानिवृत्ति फंड्स में से कटौती करके छति पूर्ति का प्रयास किया जा रहा था |    

Monday, August 3, 2015

सम्मान ( लघुकथा )

घर के अंदर भी हालत ख़राब थी दुर्गन्ध से, बाहर निकलते समय तो सब नाक पर रुमाल रख कर ही निकल रहे थे| बारिश हुई थी और बाहर की नाली ओवरफ्लो हो गयी थी, उसमे बहता हुआ पुरे कॉलोनी का कचड़ा, पॉलिथीन और मल मूत्र सब बाहर आ रहा था|
" पापा, साफ़ कराईये न, जीना दूभर हो गया है और कल दोस्तों को घर भी बुलाया है ", बेटे ने थोड़ा तेज आवाज़ में कहा और नाक ढँकते हुए निकल गया| शर्माजी ने एक बार सोचा कि खुद ही साफ़ करलें, लेकिन जैसे ही बाहर निकले, हिम्मत जवाब दे गयी|
फिर याद आई मलिन बस्ती के लड़कों की जो सफाई करते थे| उनको बुलाया और हिम्मत जुटाकर खड़े रहे जब तक नाली साफ़ नहीं हो गयी| सब साफ़ करके दोनों लड़के आये और कुछ कहते उसके पहले ही शर्माजी ने ५०० का नोट निकालकर पकड़ा दिया और अपने हाँथ जोड़ दिए|
लड़को के मुह में " २०० दे दीजिये साहब " अँटका ही रह गया और वो अचंभित शर्माजी को देखने लगे| घर के अंदर से देख रही उनकी पत्नी के हाँथ भी, पता नहीं किसके सम्मान में जुड़ गए|

Friday, July 31, 2015

नींव--

कैमरों के फ़्लैश लगातार चमक रहे थे , पता नहीं कितने लोग ऑटोग्राफ लेने के लिए धक्का मुक्की कर रहे थे | उस जिले से वो पहला व्यक्ति था जिसका चयन टेस्ट टीम में हुआ था | भीड़ में से जगह बनाकर वो स्टेज पर पहुँचा और अपनी निर्धारित कुर्सी पर बैठ गया | मंचासीन अतिथिगण बारी बारी से उसके बारे में और उसको वहां तक पहुंचाने में अपने योगदान के बारे में बोल रहे थे और रह रह कर तालियाँ बज रही थीं |
आखिर में वह बोलने के लिए माइक के पास खड़ा हुआ | मंच पर बैठे और सभा में उपस्थित सबकी निगाह उसकी ओर गड़ी हुई थी | उसने अपने माता पिता से लेकर अपने कोच और सेलेक्टर्स सबका आभार प्रकट किया और फिर उसने एकदम पीछे बैठे बुज़ुर्ग की ओर इशारा किया और उनको मंच पर लाने का आग्रह किया |
" यही हैं मेरे चयन की नींव डालने वाले शख्स जो उस मैदान के ग्राउंड्समैन हैं | पता नहीं कितनी बार मैंने खेल छोड़ने का सोच लिया था लेकिन मेरे साथ हर समय मौजूद और मेरी हर निराशा को आशा में बदलने वाले यही हैं ", ये कहते हुए उसने अपने गले में पड़ा हार उनके गले में पहना दिया और उनके पाँव छू लिए | सभागार में तालियों की आवाज़ देर तक गूंजती रही और उस बुज़ुर्ग के आँखों से बहने वाले आंसू उसका कन्धा भिगोते रहे |  


   

Thursday, July 30, 2015

उचित सजा --

" इस गुनाह की सजा सिर्फ और सिर्फ सजाये मौत हो सकती है , मुल्ज़िम को अगले महीने की २७ तारीख़ को फाँसी दे दी जाये ", और ज़ज़ साहब ने क़लम तोड़ दी | कोर्ट रूम में सन्नाटा था लेकिन वहां उपस्थित लोगों के चेहरे पर संतुष्टि का भाव साफ़ दिखाई पड़ रहा था |
अचानक सरकारी वकील ने कुछ कहने की इज़ाज़त मांगी और कहने लगा " ज़ज़ साहब , आपका फैसला बिलकुल सही है और मैंने भी यही मांग की थी | लेकिन इस मुज़रिम को , जिसने ऐसा जघन्य अपराध किया है , इतनी आसान मौत देना शायद उचित नहीं होगा | मैं इस अदालत से मांग करता हूँ कि मुल्ज़िम को फाँसी दी जाए लेकिन उसकी तारीख़ अनिश्चित रखी जाए और इसे हर दिन मौत का इंतज़ार करने दिया जाए | शायद इससे उन मृतक आत्माओं को कुछ शांति मिलेगी जो इसकी वज़ह से काल कलवित हो गए "|
कोर्ट रूम में आवाज़ें आने लगीं , वहां मौजूद लोग इसका समर्थन कर रहे थे |

Friday, July 24, 2015

दिल ने आराम किया--

मज़हब को समझें इस कोशिश में न कभी आराम किया
जिन हाथों में क़लम थी कभी , उनसे क़त्ले आम किया
फिक्र उन्हें है बनें हमारे , मंदिर मस्जिद गुरूद्वारे
खिल जाये इक इन्सां भी , ना ऐसा कोई काम किया
आओ खोजें इस दुनियाँ में , मिलती है हर ओर नज़ीर
सजदे में ही मिले रहीम ,जो सुबह से लेकर शाम किया
कितना मुश्किल था पाना इस गम से दिल को छुटकारा
सदियोँ से तरसे थे लेकिन , अब दिल ने आराम किया
उनका भी शुकराना करलें , लाये जो इस दुनियाँ में
घूम घूम कर दुनियाँ में जब , यीशु , अल्ला , राम किया
तुझको पाने की चाहत में , गँवा दिया सब चैनों सुकूँ
रात को रो-रो सुबह किया, या दिन को ज्यों-त्यों शाम किया
दिल को इतने जख्म मिले पर गिला कभी ना किया विनय
खुशियां दे डाली सबको , बस गम को अपने नाम किया !!