Translate

Tuesday, February 8, 2022

हमें क्या हो गया है--छोटी सी कहानी

 उसके सब्र की इन्तेहाँ हो रही थी, लगभग दो घंटे बीत चुके थे उसे पार्क में आये हुए. घर में सुबह ही उसे पता चल गया था कि परी अपनी माँ के साथ आ रही है. छह महीने तो बीत ही चुके थे उसे परी को देखे लेकिन कोई रास्ता भी नहीं था उसके पास जिससे वह परी को एक नजर देख भी सके. पत्र लिखने की हिम्मत कहाँ से आती जबकि उसे खुद पता नहीं था कि परी उसके लिए क्या सोचती है. 

साथ पढ़ते थे दोनों और एक ही मोहल्ले में रहते थे, उस समय आने जाने के लिए बहुत हुआ तो एक साइकिल मिल जाती थी, वर्ना पैदल ही स्कूल जाना और आना. न तो कोई कोचिंग थी और न ही ट्यूशन जिसके चलते कहीं और मुलाकात हो सके. लेकिन जो भी हो, उसे परी से बात करना, उसे देखना बहुत अच्छा लगता था. शाम को खेलते समय भी अक्सर दोनों एक ही खेल खेलते थे और उस समय तक परी एक लड़की है और वह एक लड़का, ऐसा फ़र्क़ उसके जेहन में नहीं आता था. उनके घरवालों का भी एक दूसरे के घर आना जाना था और एक सामान्य जिंदगी मजे में बीत रही थी.

उसके पिताजी का तबादला नयी जगह हो गया और उससे वह मोहल्ला, वह शहर छूट गया. कुछ महीने तो नयी जगह में व्यस्तता में बीत गए लेकिन जब सब चीजें सामान्य हुई और पढ़ाई लिखाई के लिए कॉलेज जाना शुरू हुआ तो रह रह कर परी याद आने लगी. धीरे धीरे उसे यह एहसास तो हो गया कि परी उसे एक दोस्त से कुछ ज्यादा ही लगती है लेकिन उससे ऊपर वह कुछ सोच नहीं पाता था. उसके पास परी की एकाध किताबें, कुछ कॉमिक्स और एक दो नोटबुक थीं जिसमें ऐसा कुछ भी नहीं लिखा था जिससे किसी नतीजे पर पहुंचा जाए. लेकिन समय के साथ साथ उसे लगने लगा था मानो परी ने वह किताबें इत्यादि उसके पास जानबूझकर छोड़ी थी. बस एक चीज उसे किसी भी किताब में नहीं मिली और वह चीज थी कोई सूखा हुआ गुलाब. 

उसके घर के बिलकुल पास एक छोटा सा पार्क था जहाँ वह अन्य लड़कों के साथ क्रिकेट और फुटबाल खेलता था. अब उम्र बढ़ने के साथ साथ संकोच भी आने लगा था वर्ना पुराने मोहल्ले में तो लड़के लड़कियां साथ साथ ही खेलते थे. आज भी रविवार था और लड़कों की टोली खेलने के बाद जा चुकी थी लेकिन वह अभी भी वहीं खड़ा था. दरअसल सड़क होने के चलते परी का रिक्शा पार्क के सामने से ही गुजरने वाला था और वह उसकी एक झलक देख पाता.    

अचानक एक रिक्शे के घंटी की आवाज आयी, उसने पलटकर आवाज की तरफ देखा. रिक्शे पर परी अपनी माँ के साथ उसके घर ही जा रही थी. कितनी प्यारी लग रही थी परी, उसने मुस्कुराकर परी को देखा, परी की निगाह भी उससे टकराई और वह भी मुस्कुरा दी. लेकिन संकोच दोनों तरफ था और वह कुछ सेकेंड रिक्शे को जाते देखता रहा, मन तो कर रहा था कि वह भी दौड़कर रिक्शे के पीछे पीछे जाए और परी के साथ खूब सारी बातें करे. लेकिन वह देखता रहा कि रिक्शा उसके घर के सामने रुका, परी अपनी माँ के साथ अंदर चली गयी. उसके कदम मानों जड़ हो गए, वह चाह कर भी घर की तरफ नहीं जा पाया. बगल के मोहल्ले में उसके दोस्त का घर था, उसके कदम दोस्त के घर की तरफ बढ़ गए. आगे पान की दूकान पर रखे रेडियो से बेहद खूबसूरत गाने की आवाज आ रही थी "मिलो न तुम तो हम घबराएं, मिलो तो आंख चुराएं, हमें क्या हो गया है". 


Saturday, January 15, 2022

जीत का जश्न - कहानी

 दूर से बजते नगाड़ों की आवाज़ सुनाई दे रही थी, खटिया पर लेटे लेटे बंशी ने बाहर देखा। लगता है कि नतीजा आ गया और जिस तरह से उसके पट्टी में उत्तर की तरफ़ नगाड़े बज रहे थे, उसे आभास हो गया कि नन्हे चच्चा जीत गए। थोड़ी दूर पर दूसरी खटिया में जोखू भी खाँसते हुए पड़ा था, आज उसकी तबीयत भी गड़बड़ लग रही थी।

"का हो जोखू, तबीयत कैसी है हो", बंशी ने कंहरते हुए पूछा।

"बुख़ार चढ़ रहा है और खाँसी भी लगता है, कल सुबह शहर चले जाएँगे", जोखू को बोलते बोलते फिर से खाँसी आ गई। घर के अंदर जोखू-बो काढ़ा बना रही थी, वह बाहर आ गई।

"पानी लाएँ का सोनू के पापा", उसने जोखू को देखते हुए दूर से ही पूछा। आज भी वह जोखू को नाम से नहीं बुलाती है, हालाँकि अब उसकी पीढ़ी की कुछ लड़कियां अपने शौहर को नाम से बुलाने लगी हैं।

"ले आओ और अदरक भी काट के ले आना, खाँसी से राहत मिल जाएगी", जोखू ने खटिया पर बैठते हुए कहा।

अब नगाड़े की आवाज़ काफ़ी नज़दीक आ गई थी, बंशी किसी तरह खटिया से उठकर बाहर जाने का उपक्रम करने लगे। आख़िर इसी के लिए तो वह अपना पूरा कुनबा लेकर महानगर से गाँव आए थे।

"बाहर मत जा, सब लोग अंदर आएँगे", जोखू ने कहा तो बंसी वापस खटिया पर ढह गए।

गाँव में पिछले तीन बार से चुनाव में आरक्षण के चलते उनके पट्टी से ही लोग खड़े होते थे। पहले तो सिर्फ़ बड़ी जाति के लोग चुनाव लड़ते, परधान बनते और फिर पाँच साल बाद दुबारा यही सब होता। जितने लोग परधान बने, उन सबका घर पक्का हो गया और उनके दरवाज़े पर एकाध गाड़ी भी खड़ी हो गई। लेकिन बड़ी जाति के लोगों के परधान बनने पर उनके पट्टी में में फ़र्क़ बस इतना होता कि बदहाली थोड़ी और बढ़ जाती और कुछ नए घरों पर ताला लटक जाता, लोग रोटी और रोज़गार के लिए गाँव से बाहर पलायन कर जाते। आज की तारीख़ में कम-से-कम 25 घर ऐसे थे जहाँ के सभी लोग महानगर जा चुके थे और सिर्फ़ शादी बियाह और परधानी के चुनाव में घर आते।

"अरे का हो बंसी काका, ल लड्डू खा, नन्हे चच्चा जीत गए", नन्हे के भतीजे ने आकर लड्डू का एक छोटा पैकेट उनकी तरफ़ बढ़ाया और फिर बिना उनके जवाब का इंतज़ार किए आगे बढ़ गया। बंसी ने डिब्बा खटिया पर ही रख दिया, उनकी इच्छा नहीं हो रही थी कि वह लड्डू खाते।

"अरे का भईल, लड्डू न खइबा का?,जोखू ने कहा तो उसकी आवाज़ में तंज़ साफ़ झलक रहा था। तब तक जोखू-बो पानी और कटा हुआ अदरक लेकर आ गई, उसने पानी जोखू को पकड़ाया और धीरे-से लड्डू का डिब्बा उठा लिया।

बंसी कुछ नहीं बोले, वापस खटिया पर लेट गए। उनको यह तो पता ही था कि जोखू इस बार गाँव आने पर ख़ुश नहीं था। वैसे भी पूरा देश इस समय महामारी के क़हर से जूझ रहा था और जोखू पूरे घर को मुश्किल में डालकर गाँव आने का ख़तरा नहीं लेना चाहता था।

लगभग दस बरस पहले बंसी भी गाँव छोड़कर महानगर चले गए थे और वहाँ पर एक बंगले पर चौकीदारी करने लगे थे। जोखू की माँ और जोखू को लेकर कुल तीन लोग थे और रहने का ठिकाना भी मिल गया था। जोखू की माँ भी घर से ही पापड़ बड़ी आदि बनाने लगी और थोड़ी-बहुत कमाई उससे भी होने लगी। गाँव के ही कुछ और लोग भी वहीं रहते थे और सबका मन लगा रहता था, बस साल में एकाध बार गाँव आना होता था।

जोखू कुछ साल तक तो किसी तरह से पढ़ाई करता रहा, फिर उसने भी एक फ़ैक्ट्री में काम करना शुरू कर दिया। अब आमदनी ठीक-ठाक होने लगी और बंसी का परिवार आराम से रहने लगा। दो साल पहले एक रात जोखू की माँ को बुख़ार आया और अगले सात दिन तक चढ़ता उतरता रहा। बाद में हस्पताल में जाने के बाद अगले दिन ही वह चल बसी। अब घर में सिर्फ़ दो प्राणी बचे, दोनों नौकरी करने वाले तो खाना बनाने का संकट आ गया। इसलिए तीन महीने बाद ही जोखू की शादी हो गई और घर के देखभाल के लिए एक औरत आ गई।

जैसे-जैसे इस महामारी ने अपना पाँव फैलाना शुरू किया, लोगों की नौकरियों पर संकट आने लगा। ऐसे में एक दिन बंसी को भी अगले दिन से काम पर नहीं आने का फ़रमान मिला तो वह मन ही मन रो पड़ा। लेकिन जोखू की नौकरी क़ायम थी तो खाने के लाले नहीं पड़े और फिर जोखू-बो ने भी अपनी सास वाला काम शुरू कर दिया। दिन बस इस संकट के टलने के इंतज़ार में बीत रहे थे और सबकी तरह बंसी भी इसी आस में जी रहे थे कि सब ठीक हो जाएगा।

दस दिन पहले ही गाँव से नन्हे चच्चा का फोन आया "का हाल हौ बंसी, सब ठीक हौ न"।

बंसी ने भी हामी भर दी "पाँय लागूं चच्चा, सब ठीक हौ इहाँ, उहाँ गाँव में सब ठीक बा न"।

"हाँ, इहाँ भी सब ठीक हौ लेकिन तोहरे परिवार का ज़रूरत हौ। अब तोंहके त पता हौ कि गाँव पर परधानी क चुनाव होत हौ अउर इ बार हम खड़ा हुई। पिछला परधान त गाँव ख़ातिर कुछ नाहीं कइलेस, अब हमहीं के कुछ करे के पड़ी", नन्हे चच्चा एक साँस में बोल गए।

बंसी हूँ हाँ करते रहे, चच्चा आगे बोलना शुरू किए "अब अगर तू लोग न अईबा त के हमार मदद करी, के हमके वोट देई। ए से तूँ फटाफट गाँव चल आवा। तोहके हमार परचार भी त करे के पड़ी"।

बंसी ने थोड़ा सोचा, फिर बोले "ठीक हौ चच्चा, हम आ जाईब"। उनको लगा कि वैसे भी वह घर पर खाली ही बैठे हैं तो गाँव जाएँगे तो कुछ मन बहल जाएगा।

"अरे तोंहके अकेले नाहीं आवे के हौ, पूरा परिवार लेके आवा। आख़िर तीन वोट हौ तोहार, सबकर आपन आपन लोग ए समय आवत हउअन", नन्हे चच्चा ने बात ख़त्म कर दी।

बंसी दिनभर सोचते रहे कि जोखू से चलने के लिए कहें या नहीं, वैसे भी जोखू गाँव से कोई मतलब नहीं रखता था। लेकिन अब बात उनके अपने सगे पट्टीदारी की थी, नन्हे चच्चा अगर परधान बने तो उसके लिए भी शायद कुछ बढ़िया ही हो।

शाम को जोखू घर आया तो बंसी ने बात छेड़ी "आज नन्हे चच्चा का फोन आया था, इस बार परधानी में खड़े हो रहे हैं"।

"अच्छा", जोखू ने कोई उत्साह नहीं दिखाया।

बंसी एक बार ठिठके, आगे कुछ कहें या नहीं। लेकिन बात कहनी भी ज़रूरी थी इसलिए फिर से बोले "चच्चा हम सब को गाँव बुलाए हैं, उनकी मदद करना हमारा भी फ़र्ज़ है"।

जोखू ने पलटकर देखा, उसकी आँखों में आश्चर्य और ग़ुस्सा था 'आपका दिमाग़ तो नहीं ख़राब हो गया है बाऊ, इस समय चारो तरफ़ महामारी फैली है और आपकी भी तबीयत अब ठीक नहीं रहती। अब ऐसे में हम गाँव जाने का सोच भी नहीं सकते, आप चच्चा से कोई बहाना मार दीजिएगा"।

जोखू की पत्नी भी तब तक पानी का गिलास लेकर आ गई थी। वह अमूमन इन सब बातों में अपनी कोई राय नहीं देती थी इसलिए पानी देकर वह चुपचाप खड़ी हो गई।

बंसी ने जोखू के पानी पीने का इंतज़ार किया और एक बार फिर बोले 'अरे तुम समझते नहीं हो, आख़िर पटिदारी का मामला है। हमको भी आज नहीं तो कल गाँव तो जाना ही है, उस समय क्या मुँह लेकर जाएँगे"।

जोखू ने कुछ नहीं कहा और कपड़ा बदलने लगा। कपड़ा बदलकर जब वह आया तो बंसी उसको ही देख रहे थे। उसे समझ में आ गया कि कुछ जवाब तो देना ही पड़ेगा तो उसने कहा 'न तो आप जाएँगे और न हम लोग, समझ गए न"।

बंसी का मुँह उतर गया, उनको उम्मीद तो थी कि जोखू को एक-दो बार कहना पड़ेगा लेकिन उनको ये भी उम्मीद थी कि वह आख़िर में मान जाएगा। अगले दो घंटे बेहद ख़ामोशी में बीते, रात का खाना भी बंसी ने आधे मन से ही खाया और वह जोखू और उसकी पत्नी को भी दिख गया।

सोते समय उसकी पत्नी ने बात छेड़ी "अगर बाऊजी कह रहे हैं तो उनकी बात मान क्यों नहीं लेते। अब बड़े हैं और गाँव समाज भी उनको ही देखना है, तुम्हारे मना करने से समाज में उनकी क्या इज़्ज़त रह जाएगी"।

जोखू भड़क गया 'तुम्हारा भी दिमाग़ फिर गया है क्या, ऐसे समय में कौन जाता है गाँव। अगर ग़लती से यह बीमारी लग गई तो मुश्किल हो जाएगा, वैसे भी बाऊजी कमज़ोर हो गए हैं आजकल"।

"वो तो ठीक है लेकिन उनको मना करना भी ठीक नहीं है। एक काम करो, आप चले जाओ गाँव, हम बाऊजी का ध्यान रख लेंगें", जोखू की पत्नी ने मनौती करते हुए कहा।

यह बात जोखू को ठीक लगी, वह दो-तीन दिन के लिए गाँव चला जाएगा और वोट देकर वापस आ जाएगा। उसने करवट बदल ली और सोने का उपक्रम करने लगा।

सुबह बंसी चुपचाप कुर्सी पर बैठे ऊपर ताक रहे थे, जोखू की पत्नी ने चाय दिया और पूछा "बाऊजी तबीयत तो ठीक है न, काहें उदास लग रहे हैं"।

बंसी ने चाय का कप पकड़ा और फीकी हँसी हँस दिए। कारण दोनों को पता था लेकिन उनकी आपस में इससे ज़्यादा कभी बात नहीं होती थी इसलिए बंसी ख़ामोशी-से चाय सुड़पने लगे। थोड़ी देर में जोखू आया तो उसे भी बाऊजी का लटका मुँह दिख गया। रात की बात उसे याद आई और उसने आवाज़ लगाई "अरे सुनो, मुझे भी चाय देना। अच्छा बाऊजी एक काम करते हैं, मैं गाँव चला जाता हूँ और चच्चा को वोट देकर आ जाऊँगा। ये ठीक रहेगा न?

बंसी को एक बार तो लगा कि ठीक ही है, जोखू गाँव जाकर वोट दे आएगा और चच्चा की बात भी रह जाएगी। लेकिन फिर उनको लगा कि वह नहीं जाएँगे तो चच्चा बुरा मान जाएँगे, वैसे भी उनके साथ के कुछ लोग इसी चुनाव के लिए गाँव जाने वाले थे। उन्होंने जोखू की तरफ़ देखा, वह चाय पी रहा था।

'ऐसा है जोखू कि यहीं से कुछ लोग गाँव जा रहे हैं और अगर हम नहीं गए तो चच्चा बुरा मान जाएँगे। आख़िर मेरे जाने में तुमको क्या दिक़्क़त है, चच्चा ने भी सबको बुलाया है"।

"आपकी तबीयत आजकल ठीक नहीं रहती है और ये महामारी भी फैली हुई है। ऐसे में गाँव जाना कोई समझदारी का काम नहीं है, आप बात को समझते क्यों नहीं?, जोखू ने उनको फिर से समझाने का प्रयास किया।

लेकिन बंसी जाने पर आमादा थे उन्होंने कह दिया "अगर हम नहीं गए तो हमारी तबीयत ज़्यादा ख़राब हो जाएगी। अरे गाँव में लोगों से मेल मुलाक़ात होगी तो मन बहल जाएगा हमारा"।

जोखू समझ गया कि बाऊजी बात नहीं मानने वाले हैं, ऐसे में अगर दोनों जाएँगे तो यहाँ उसकी पत्नी अकेले रह जाएगी और वहाँ गाँव पर भी भोजन कौन बनाएगा। इसलिए उसने हार मानते हुए कहा "ठीक है बाऊजी, बस चार पाँच दिन के लिए चलेंगे हम लोग और फिर आप हमारे साथ ही वापस आएँगे'।

बंसी के लिए इससे बढ़िया बात और क्या हो सकती थी, वह एकदम ख़ुश हो गए 'ठीक हौ, तोहरे संघे हम भी वापस आ जाएँगे"।

उधर जोखू अपने फ़ैक्ट्री गया, इधर बंसी ने गाँव चच्चा को फोन लगाया "पालागी चच्चा, हम लोग गाँव आ जाएँगे, आख़िर तोहरे परधानी का मामला हौ"।

अगले दिन पूरा परिवार गाँव के लिए निकल पड़ा, जोखू ने बाऊजी को भी मास्क पहनाया और ख़ुद भी पूरी सावधानी बरतते हुए गाँव चला। सड़क वही थी लेकिन लगता था जैसे उसका मिजाज़ ही बदल गया हो। कहाँ इस सड़क पर निकलने पर बस भीड़ ही भीड़ दिखाई पड़ती थी, चारो तरफ़ चिल्लाते हॉर्न, धुआँ उगलती गाड़ियाँ और एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में लगे लोग। लेकिन आज तो सब बदला हुआ था, भीड़ भी नहीं के बराबर थी और चिल्ल पों भी ग़ायब। ख़ैर पहले बस से, फिर टेम्पो से धक्का-मुक्की करते शाम होते होते वे लोग गाँव पहुँच गए। गाँव पहुँचते ही बंसी मुँह हाथ धोकर नन्हे चच्चा के यहाँ निकल गए।

"पालागी चच्चा, हम लोग आ गए। और सब कइसन चल रहा है, परचार तो ठीक हौ न?

नन्हे भी उनको देखकर ख़ुश हो गए, उनका तीन वोट पक्का हो गया था। उन्होंने भी हाथ जोड़कर नमस्कार किया और घर में आवाज़ लगाई 'अरे बंसी आए हैं, तनी चाय तो पिलाओ"। बाहर एक तरफ़ गोहरी पर बट्टी बन रहा था तो दूसरी तरफ़ दाल। कुछ लोग सलाद काट रहे थे तो कुछ बैंगन का चोखा बना रहे थे। कुछ खलीहर बीड़ी पीते हुए कुर्सी पर बैठे देश प्रदेश की राजनीति पर बहस छेड़े थे। उनमें से बहुत से लोग बंसी को पलग्गी करने के लिए खड़े हो गए तो कुछ लोग आकर हालचाल भी पूछने लगे। बंसी की सफ़र की थकान लगभग ग़ायब हो गई, आख़िर इसी के लिए ही तो वह गाँव आना चाहते थे। एक चीज़ सबमें कामन थी, किसी ने भी चेहरे पर मास्क नहीं लगाया था।

चाय पीते समय नन्हे चच्चा ने बंसी से धीरे-से कहा "बाक़ी लोग भी तोहरे पास वोट माँगने आएँगे, चालाकी से बात करना। किसी को अहसास न हो कि तोहार वोट हमको ही मिलेगा"।

लगभग साढ़े तीन सौ की आबादी वाले इस गाँव में तीन चौथाई पिछड़ी जाती के लोग थे। गाँव में तीन अलग-अलग पट्टी थी जिसमें पक्के घर वाले मकान ऊँची जाति वालों के थे। दूसरी पट्टी में यादव और कुनबी कोइरी थे जो बीच वाले थे, उनके पास खेती भी थी और कुछ धंधा भी करते थे। तीसरी पट्टी उनके लोगों की थी जिसमें अधिकांश घर बस किसी तरह से बने हुए थे। दो-चार अच्छे घर भी थे और उस घर से कोई या तो नौकरी कर रहा था या महानगर में अच्छा धंधा कर रहा था। वैसे तो ऊपर से देखने पर लगता था जैसे गाँव में बहुत शांति है, आपसी संबंध मधुर है लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं था। जातिगत वैमनस्य और किसी की तरक्क़ी पर जलना हर आम गाँवों की तरह यहाँ भी मौजूद था। और असली फ़र्क़ चुनाव के समय नज़र आता था जब ऊँची जाती के लोग चाहते थे कि पिछड़ी बस्ती से उनका कोई अपना आदमी ही परधान बने। और इसके लिए वह रुपया पैसा भी ख़र्चने को तैयार रहते थे। लेकिन अब समय बदल गया था और पिछड़ी जाति के लोग भी अपना महत्त्व समझने लगे थे। उनको पता था कि चूँकि उनमें से ही किसी को परधान बनना है तो वे भी चाहते थे कि कोई ठीक आदमी ही बने।

शहर में तो महामारी के चलते लोग थोड़ा सतर्क थे, मास्क वग़ैरा लगाते थे। लेकिन गाँव में तो जैसे उस महामारी का कोई ख़ौफ़ ही नहीं था। इसकी एक वजह तो यह थी कि जब पिछले साल यही महामारी पहली बार आई थी तो गाँवों में इसका कोई असर नहीं हुआ था। इसलिए लोगों को इस बार भी भरोसा था कि गाँव में इसका कोई असर नहीं होगा। बंसी ने तो उसी समय मास्क उतार दिया लेकिन जोखू ने अगले दिन भी लगाए रखा।

"का जोखू भैया, तबीयत ख़राब हौ का", एक गाँव के लड़के ने उसे टोका तो उसे आश्चर्य हुआ।

"हम त एकदम ठीक हैं, काहें पूछत हौ", उसने पूछा।

"अरे गाँव में कउनो महामारी न हौ, फिर इ बीमारन वाला मास्क काहें लगाए हो। पूरे गाँव में और कोई दिखाई देत हौ मास्क लगइले", उस लड़के ने हँसते हुए कहा।

ख़ैर उसने मास्क तो नहीं उतारा लेकिन उसे गाँव में कई लोग खाँसते और छींकते दिखाई दिए। उसने किसी से पूछा तो उसने बड़े आराम से जवाब दिया 'अरे मौसमी खाँसी हौ, दिन में एतना धूप और रात में ठंडी, एही से इ सब होत हौ"।

रात को जब बाऊजी आए तो उनको भी खाँसी हो रही थी। उसकी पत्नी ने काढ़ा बनाया और अदरक के टुकड़े खाने के लिए दिए जिससे कि बाऊजी कि खाँसी ठीक हो जाए।

"बाऊजी, थोड़ा अपना भी ख़याल रखिए, मुझे तो लगता है कि यहाँ भी महामारी फ़ैल रही है। अपने आपको लोगों से दूर ही रखिए", उसने बाऊजी के सर पर हाथ रखते हुए कहा। उनका सर हल्का गरम था लेकिन बाऊजी ने मुस्कुरा कर उसका हाथ हटा दिया "अरे मैं ठीक हूँ जोखू, बस मौसमी सर्दी खाँसी है, ठीक हो जाएगा"।

अगला तीन दिन चुनावी दौड़भाग में बीता, नन्हे चच्चा के अलावा पाँच और उम्मीदवार थे लेकिन असली मुक़ाबला नन्हे चच्चा और छुन्नन में ही था। तीनों दिन कभी एक प्रत्याशी उनके घर आता तो कभी दूसरा आता। जो भी आता, झुककर प्रणाम करता और सबका हालचाल भी पूछता। सभी रात को अपने यहाँ होने वाली दावत में आने का न्यौता ज़रूर देते और साथ में बँटने वाली दारू का भी इशारा कर जाते। बंसी ने अब दारू पीना लगभग बंद कर दिया था, और जोखू को इससे सख़्त चिढ़ थी। उसने अपनी पट्टी के कई घर इस दारू के चलते बर्बाद होते देखे थे इसलिए उसने दारू से तौबा कर ली थी। जोखू की पत्नी के आने के बाद बंसी को लगा कि अब पतोहू के सामने कभी जोखू ने दारू के लिए कुछ बोल दिया तो उनकी सारी इज़्ज़त धूल में मिल जाएगी। इसलिए उन्होंने भी दारू से दूरी बना ली थी। फिर चुनाव के दिन ख़ूब चहल-पहल रही और जब शाम को चुनाव ख़त्म हुआ तब सबको राहत मिली। उस रात बंसी जब घर पर सोए तो उनको तगड़ा बुख़ार आ गया और जोखू को भी हरारत महसूस होने लगी।

गाँव के बाज़ार वाले डॉक्टर से दवाई लेने के बाद कुछ देर तक तो ठीक रहता लेकिन बाऊजी को बुख़ार फिर आ जाता। धीरे-धीरे गाँव के कई लोगों को बुख़ार ने जकड़ लिया और हर घर के सामने खटिया पर छींकते लोग नज़र आने लगे। उसने वापस चलने के लिए कहा तो बंसी ने दो दिन और रुकने के लिए कहा "जब इतना दिन रुके तो दो दिन में रिज़ल्ट आ जाएगा, फिर चलेंगे। नन्हे चच्चा के जीत का नगाड़ा भी तो बजाना है"।

वह ख़ुद भी दवा लेता रहा और बाऊजी को भी खिलाता रहा। गाँव में न तो उस महामारी के लिए कोई टेस्टिंग की व्यवस्था थी और न ही कोई ऐसा हस्पताल जहाँ ज़्यादा बीमार होने पर किसी को भर्ती कराया जा सके। उसके लिए गाँव से बीस किमी दूर क़स्बे के हस्पताल में ही जाना पड़ता था।

जुलुस आगे बढ़ा और बंसी वापस खटिया पर लोट गए। जोखू भी पत्नी को खाने के लिए बोलकर वहीं टहलने लगा, कल सुबह ही यहाँ से निकल जाना है, उसके दिमाग़ में बस यही चल रहा था। हल्की खिचड़ी बनी थी जिसे खाने का मन नहीं था लेकिन बाऊजी को खिलाने के चलते उसे भी साथ-साथ खाना पड़ा। खाना खाकर दोनों लेटे ही थे कि नन्हे चच्चा के यहाँ से एक आदमी आया और अगले दिन के दावत का न्यौता दे गया।

"काल जीत के ख़ुशी में खस्सी का दावत हौ बंसी भैया, ज़रूर से आवा"।

रात को अचानक जोखू की आँख बाऊजी के कंहरने से खुली, उसने घड़ी देखी, रात के दो बज रहे थे। वह बाऊजी के खटिया पर गया और बाऊजी को उठाया। उनकी साँस बहुत तेज़ चल रही थी और ऐसा लग रहा था कि उनसे साँस लेते नहीं बन रहा है।

"बाऊजी, गहरी साँस लीजिए", वह घबरा गया।

उसकी पत्नी भी इतने में आ गई और दोनों मिलकर बाऊजी को साँस देने की कोशिश करने लगे। लेकिन बंसी की हालत देखकर उनको लगने लगा कि इनको तुरंत हस्पताल लेकर जाना पड़ेगा।

"मैं नन्हे चच्चा को बुलाता हूँ, इनको तुरंत हस्पताल लेकर जाना पड़ेगा", उसने घबराते हुए कहा। उसे भी हल्का बुख़ार था और कमज़ोरी भी थी। वह नन्हे चच्चा के घर भागा और थोड़ी देर बाद वहाँ से उनके लड़के को लेकर आया। पीछे से ड्राइवर भी जीप लेकर आ गया और दोनों ने बंसी को उठाकर जीप में लिटाया और शहर की तरफ़ चल पड़े।

इधर सुबह की पहली किरण निकली, उधर बंसी ने जीप में ही आख़िरी साँस ली। गाँव में भी तब तक जगाहट हो गई थी और नन्हे चच्चा के घर से कुछ लोग खस्सी ख़रीदने के लिए बगल के गाँव के लिए निकल गए। आख़िर आज उनकी परधानी में जीत का जश्न मनना था।


चन्नर - कहानी

आज दोपहर दरोगा चच्चा गुज़र गए, पिछले तीन चार हफ़्ते से बीमार चल रहे थे और उमर भी अब काफ़ी हो चली थी। दरअसल आजकल कहीं भी किसी बुज़ुर्ग का गुज़र जाना कोई घटना नहीं होती,बशर्ते वह कोई सेलेब्रिटी न हो। वैसे भी धीरे-धीरे उनकी पीढ़ी के अधिकांश बुज़ुर्ग प्रस्थान कर गए थे और कभी-कभी वह मज़ाक में कहते भी थे “आज सपना में मनोहरा ऊपर से बुलावत रहा, लागत हौ कि अब चले के पड़ी”, और ठठा कर हँस पड़ते।

ख़ैर बात यह नहीं है कि दारोग़ा चच्चा का गुज़र जाना कोई बहुत बड़ी या अप्रत्याशित घटना है, बूढ़ा गए थे, बीमार थे तो यह तो होना ही था। और अपने पीछे गाँव में भरा पूरा परिवार छोड़ गए जिसकी हर सुख-सुविधा का अपने जान में पूरा इंतज़ाम भी करके गए। घटना दरअसल कुछ और ही है, इनके जाने से एक क़िस्से का अंत हो गया जिसे लिखने की शायद अधिकतर लोगों को ज़रूरत महसूस ही नहीं होती। उस क़िस्से का सबसे महत्त्वपूर्ण किरदार “चन्नर” तो कुछ वर्ष पहले ही गुमनाम मौत मर चुका था और अब दारोग़ा चच्चा के गुज़र जाने से तो अगली पीढ़ी को कभी पता भी नहीं चलेगा चन्नरके बारे में। उसका असली नाम तो“चंदर” रहा होगा लेकिन लोगों ने अपनी सहूलियत से चन्नर बना दिया और बड़े तो उसे “चनरा” ही बुलाते थे। अब आप भी सोच रहे होंगे कि जब ऐसी कोई ख़ास बात ही नहीं थी इन घटनाओं में तो फिर मैं यह क्या लिखने बैठ गया, तो शायद इस क़िस्से से गुज़र कर आप समझसकें। वैसे भी अपने समाज में कहाँ किसी को ऐसे लोगों के बारे में सोचने की फ़ुर्सत रही है। और सिर्फअपने समाज को ही क्यों कहें, कमोबेश दुनिया के हर समाज में ऐसे लोग हासिए पर ही रहे हैं जिन्हें न तो वर्तमान में जगह मिलती है और न ही इतिहास में।

बचपन में गाँव जाना हर साल ही होता था,दरअसल उस समय छुट्टी बिताने के लिए आज की तरह न तो टी। वी। थे, न सिनेमा हाल और न ही इंटरनेट। फोन थे नहीं तो समाचार मिलने या भेजने का पत्र ही एक साधन था। गर्मियों की छुट्टी का बड़ी बेसब्री से इंतज़ार रहता था और उसकी वजह थी क़स्बे में गुज़र रहे अनुशासित जीवन से कुछ महीनों की फ़ुर्सत। गाँव में छुट्टी के दरम्यान न तो कोई टोकाटाकी होती और न पढ़ाई के लिए मारपीट। उस समय हमबच्चों को ऊँच नीच, छोटे बड़े का ख़याल नहीं रहता था, जबकि गाँव में सबके टोले अलग-अलग हुआ करते थे। बड़े अलबत्ता कोशिश करते कि बच्चे भी इन गंदगियों को अपने में आत्मसात कर लें लेकिन बच्चे तो बच्चे ही ठहरे।

ऐसी ही एक छुट्टी में गाँव पर मुलाक़ात हुई “चन्नर” से। अब उसे आप मुलाक़ात कहें या कुछ और, हमें तो हर बार कुछ-न-कुछ अलग और दिलचस्प मिल ही जाता था गाँव में। खेलते कूदते दारोग़ा चच्चा के दरवाज़े पर पहुँचने पर सामने से चन्नर दिखा, थोड़ा अलग था इसलिए याद रह गया।आगे के वर्षों में उसके चलने के तरीक़े को लेकर हम लोग अक्सर उसका मज़ाक भी उड़ाया करते थे लेकिन उसके भचक कर चलने के पीछे की दर्दनाक घटना का पता काफ़ी सालों बाद चला। एक अजीब सीमुस्कुराहट उसके चेहरे पर इस तरह रहती जैसे किसी ने पैदा होते ही उसके चेहरे पर इसे चस्पाँ कर दिया हो। और नाक से निकलती पतली आवाज़ जिससे हम लोग अँधेरे में भी चन्नरको पहचान लेते। आज भी चन्नरकी आवाज़ मन में गूँजती रहती है “कइसन हो भैया”, जो वह हमें जब भी देखता, अपनी चिरपरिचित मुस्कराहट के साथ ज़रूर पूछता।

और अगर सच कहूँ तो बचपन में तो हमें पता भी नहीं था कि चन्नरदरोगा चच्चा के घर का नहीं था। उस समय बच्चे बहुत साल तक बच्चे ही रहते थे और धीरे-धीरे उनके अंदर समाज की बुराई पैठ बनाती थी। और इसकी सबसे बड़ी वजह थी टी। वी। और इंटरनेट का न होना। और दूसरा कारण हर घर में बुज़ुर्गों की उपस्थिति थी हमारा ख़ूब ख़याल रखते। वरना आजकल तो बच्चों का बचपन जैसे पैदा होने के साथ ही खो जाता है। वह तो काफ़ी सालों बाद पता चला कि मंदबुद्धि चन्नर बचपन में ही पता नहीं कैसे उनके घर आ गया था और उसके बाद फिर उसकी लाश ही दारोग़ा चच्चा के घर से निकली। इस क़िस्से की शुरूआत तब हुई थी जब देश अंग्रेजों से तो कई साल पहले ही आज़ाद हो चुका था लेकिन जाति और धर्म के बंधन से ज़रा भी आज़ाद नहीं हुआ था। वैसे अपना समाज आज भी इन चीज़ों से आज़ाद कहाँ हुआ है, बस कहने के लिए हम विकसित होते जा रहे हैं। गाँव में ठाकुरों के लगभग 30 घर एक साथ थे और उसके एक तरफ़ यादव टोली, उसके पीछे बनिया और धोबियों के घर और सबसे पीछे गंदगी से बजबजाती जगह में चमरौटी। तब चमरौटी का पता गंदे और बदबूदार जगह से ही होता था, आज की तरह बाबा अंबेडकर की मूर्ति नहीं होती थी। कुनबी और कोईरी जातियाँ दूसरे तरफ़ बसी हुई थीं तो सबसे उपेक्षित और कमज़ोर तबक़ा मुसहरों का था जो गाँव से काफ़ी दूर बसे हुए थे। शादी हो या मरनी करनी, पत्तल मुसहर लोग ही बनाकर लाते थे, पुरवा इत्यादि कोंहार (कुम्हार) लोग बनाते थे। समाज में हर तबक़े का स्थान सदियों से निर्धारित था और उसमें किसी परिवर्तन की बात सोचना भी उस दौर में संभव नहीं लगता था।

उस समय खेतीबाड़ी अधिकतर ठाकुरों के पास ही थी,ये अलग बात थी कि कागज़ों पर ज़मींदारी प्रथा का उन्मूलन हो गया था। थोड़ी-बहुत ज़मीन यादव या कुर्मी लोगों के पास भी थी जिसमें वह लोग सब्ज़ी और थोड़ा गेहूँ चावल उगा लेते थे। ट्रैक्टर इत्यादि उस समय होते नहीं थे और खेती में बैल ही काम आते थे। लिहाज़ा ठाकुरों के हर घर में एक से दो जोड़ी बैल, कुछ गाय भैंस और उनके बच्चे। कुल मिलाकर हर घर में 6 से 12 जानवर थे और उनके सानी पानी (खाना-पीना) और देखभाल के लिए एक मजूर (मज़दूर) भी होता था। अधिकतर तो यह मजूर गाँव के ही चमरौटी से या अन्य निचली जात के लोग होते लेकिन कभी-कभी दूसरे गाँव से भी मजूर मिल जाते थे। जानवरों के गोबर से खाद बनती थी जो खेती में इस्तेमाल होती,हाँ बहुत साल बाद जब ईंधन की कमी होने लगी तो गोबर से ऊपरी (उपले) की पथाई भी शुरू हो गई।

अब ऐसे में किसी को कोई ऐसा लड़का मजूरी के लिए मिल जाता जो कहीं दूर का हो और दिमाग़ी रूप से भी कमज़ोर हो तो उसके भाग्य का कहना ही क्या। अब अपने दारोग़ा चच्चा भी ऐसे ही भाग्यवान थे जिसे चन्नर बचपन में ही मिल गया। किस गाँव का था और उसकी जात क्या थी, शायददरोगा चच्चा को ही पता थी। लेकिन यह हम लोगों को पता नहीं था और न कभी इसकी ज़रूरत ही महसूस हुई। लेकिन इतना तो था कि चन्नर बाहर के साथ-साथ घर के अंदरके काम भी करता था और इससे ये अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि उसकी जाति बहुत निचली नहीं थी। शुरुआती सालों में हमने चन्नर को सिर्फ़ मानसिक रूप से ही कमज़ोर देखा था, शारीरिक रूप से वह स्वस्थ और तंदरुस्त था। लगभग 12 जानवर थे दारोग़ा चच्चा के घर,सबका सानी पानी, गोबर, खेत पर काम और घर पर इनारा (कुआँ) से पानी काढ़ कर लाना, सब काम चन्नर के हीजिम्मे था। अक्सर तो वह हमें मुसकुराता हुआ ही दिखता लेकिन कभी-कभी उसके चेहरे से पता लगता था जैसे वह रोया हो और बाद में उसकी पिटाई की बात हमें पता चल जाती। कुछ बड़े होने पर ही हम लोगों को पता चला कि दारोग़ा चच्चा, जो हमें सिर्फ़ बड़ी-बड़ी मूँछों के चलते डरावने दिखते थे, वास्तव में बहुत ख़तरनाक आदमी थे। अगल-बगल के गाँव वाले भी उनसे भय खाते और चमरौटी तथा अन्य निचली जतियों में तो उनके नाम से लोग सिहर जाते।

गाँव में रहने के दौरान हमारे बाबा उनके कई क़िस्से सुनाते जिसमें अधिकतर उनके अत्याचार के ही होते थे, ये अलग बात थी कि उनको इसका कभी अफ़सोस नहीं होता था। कभी-कभी तो उनके आवाज़ में गर्व भी झलकता था जैसे दारोग़ा बहुत बड़े योद्धा हों। चमरौटी में सुबह-सुबह अगर उनकी आवाज़ सुनाई दे जाए तो मजाल नहीं थी कि वहाँ के मजूरा उनके खेत में काम के लिए नहीं पहुँचें। और उसके बाद जो भी दारोग़ा चच्चा दे दें, सब ठीक, कोई शिकायत करने की हिम्मत नहीं करता था। चमरौटी के पता नहीं कितने पुरुष उनके द्वारा पिटाई के बाद हफ़्तों शरीर पर हल्दी का लेप लगवाकरइलाज कराते थे और कितने ही लोगों के हाथ पैर उन्होने तोड़े थे। लेकिन न तो कोई पुलिस में शिकायत कराने की हिम्मत कर पाया और न ही प्रधान से। उस समय तो प्रधान भी ठाकुरों के ही घर से होते थे,बहुत बाद में जब प्रधानी का पद महिला और अनुसूचित जाति के लिए रिज़र्व हो गई तब भी सिर्फ़ नाम की अनुसूचित जाति की महिला प्रधान होने लगी, काम तो सब ठाकुर लोग ही करवाते थे। एक बात तो थी कि पहले वाले ठाकुर जब ग्राम प्रधान होते थे तो वह कम-से-कम अपने भाई और पटीदारों का कुछ लिहाज़ करते थे लेकिन जैसे-जैसे गाँवों में पैसा पहुँचने लगा, सारे रिश्ते नाते उसकी भेंट चढ़ने लगे। अब ठाकुरों में भी भैया, चाचा, बब्बा इत्यादि रिश्ते सिर्फ़ नाम के ही बचे, वास्तव में उनके अंदर की गर्माहट ख़त्म हो गई।

समय में एक सबसे अच्छी बात यह होती है कि वह जैसा भी हो, बीत जाता है। हमारे क्षेत्र में भी समय अपनी गति से बीतता गया,धीरे-धीरे विकास की किरण दस्तक देने लगी। पंचवर्षीय योजनाओं का असर धीरे-धीरे ही सही, हमारे गाँव और आसपास भी दिखने लगा। गाँव में पहले पक्की सड़क बनी, मोटर गाड़ियाँ चलने लगीं और अंततोगत्त्वा बिजली भी आ गई। कुछ बड़े जोत वालों के घर ट्रैक्टर भी आ गया था जो उसकी हैसियत में चार चाँद लगा देता था। इस विकास का असर दहेज़ पर भी पड़ा, पहले जहाँ शादियों में रेडियो और साइकल मिलना बड़ी बात होती थी,वहीं रेडियो की जगह पहले टू इन वन ने ली और फिर टी।वी सेट ने ले ली। टी।वी भी धीरे-धीरे स्वेत श्याम से रंगीन हुए और साइकल भी मोपेड, स्कूटर से होती हुई मोटर साइकल तक पहुँच गई। ट्रैक्टर आने के साथ सबसे बड़ा दुख हमें इस बात का हुआ कि अब गेहूँ की दंवाई (मंडाई) थ्रेशर से होने लगी। वरना पहले तो खलिहान में गेहूँ की फ़सल काटकर बिछा दी जाती और हम लोग बैलों द्वारा चलने वाले दंवाई मशीन पर बैठकर घूमा करते। गेंहू की दंवाई के साथ-साथ हमारी मौज भी होती थी।

ख़ैर इसी सिलसिले में एक और क़िस्सा अपने कल्लन बब्बा का है। गाँव के अधिकतर बड़े बुज़ुर्ग एकदम भोर में जग जाते थे और फिर उनका राम राम शुरू हो जाता था। उन्हीं में से एक थे कल्लन बब्बा जिनकी आवाज़ ऐसी ज़बरदस्त थी कि अगर गाँव के एक किनारे खड़े होकर आवाज़ लगाएँ तो गाँव के दूसरे किनारे तक उनकी आवाज़ साफ़ सुनाई पड़ती। गेंहू की दंवाईअक्सर गर्मी के चलते तड़के ही शुरू हो जाती, चारो तरफ़ सन्नाटा रहता और सिर्फ़ बैलों के गले की घंटियाँ ही सुनाई देती। बैल भी दो शब्दों को बख़ूबी समझते थे, एक तो चलने के लिए “चल” और दूसरा रुकने के लिए “होर रह।” अब कहा यह जाता था कि सबके खलिहान में बैल मशीन के साथ दंवाई के लिए लग जाते और फिर कल्लन बब्बा की आवाज़ से ही पूरे गाँव के बैल चलते और रुकते। वैसे इस क़िस्से में भी अतिशयोक्ति तो ज़रूर रही होगी लेकिन कम-से-कम अगल-बगल के चार छह खलिहान के बैल तो ज़रूर उनकी आवाज़ से ही काम करते रहे होंगे।

गाँव में आपसी रिश्तों को तोड़ने में दूसरा सबसे बड़ा कारण चकबंदी थी, पैसा तो सबसे पहला और निर्विवाद कारण था ही। जिन घरों ने कभी कोर्ट-कचहरी का मुँह भी नहीं देखा था, उनके घर का एक सदस्य अब कचहरी का नियमित मेम्बर हो गया। अब तमाम कामों में एक काम तारीख़ पर शहर की कचहरी जाना भी हो गया। कुर्ता पायजामा की जगह अब शर्ट पैंट ने ले ली और सुबह-सुबह अगर किसी को शर्ट पैंट पहने साइकल पोंछते देख लिया तो लोग समझ जाते थे कि कचहरी की तैयारी है। ये मुक़द्दमे अंतहीन थे और विरासत की तरह अगली पीढ़ी को पूरी ईमानदारी से अंतरित किए जाते थे। इसी बहाने गांवोंमे भी वकीलों की नई फ़ौज तैयार होने लगी और आपस के पैसे से ही सही, उनकी भी रोज़ी रोटी चल पड़ी।

इस विकास के साथ-साथ एक और घटना घटी जिसके बारे में हमें बहुत बाद में पता चला। एक साल गर्मी की छुट्टी में जब हम घर आए तो देखा कि चन्नर ठीक से चलनहीं पा रहा है। थोड़ी उत्सुकता हुई और उससे पूछा तो वह हँसकर रह गया। शायद बताना नहीं चाहता था या भय था, पता नहीं। लेकिन अपने घर पर बाबा ने बताया “एक दिन चन्नर गाय चराकर बहुत देर से लौटा और तब तकबाकी जानवरों के सानी पानी का समय बीत रहा था। ऐसे में दरोगाने ही जानवरों को नांद पर बाँधा और सानी पानी किया। फिर जैसे ही चन्नरवापस आया, बिना उससे कारण पूछे दरवाज़े पर पड़ी गोजी (लाठी) लेकर उसपर टूट पड़े और तब तक मारते रहे जब तक उसकी कमर और एक पैर टूट नहीं गया। चन्नर बाप बाप चिल्लाता रहा लेकिन कोई उसे बचाने नहीं आया। बाद में दारोग़ा ख़ुद ही डॉक्टर को बुलाए और थोड़ा-बहुत इलाज़ भी करवाया लेकिन मंदबुद्धि चन्नर फिर विकलांग भी हो गया।

इसे सुनकर ही हमारे रोंगटे खड़े हो गए कि कोई इनसान होकर ऐसा भी हो सकता है। ऐसे ही तमाम क़िस्से बाबा के पास होते थे जिसे वह हमको गाहे-बगाहे सुनाते रहते थे। इन्हीं क़िस्सों में बाबा का एक और क़िस्सा था कि एक बार तो उन्होने चमरौटी के एक आदमी को बल्लम मार दिया था और पूरे चमरौटी में किसी की हिम्मत नहीं पड़ी उसको बचाने की। बाद में ठकुराने के लोग पहुँचे और उसको बचाया, बस ग़नीमत यही थी कि वह ज़िंदा बच गया नहीं तो गड़बड़ हो जाता। दरअसल देश में उस समय हरिजन ऐक्ट लागू हो चुका था और बड़ी जातियों का दबदबा अब घटने लगा था। कुछ गाँवों में तो इसके चलते गिरफ्तारियाँ भी होने लगी थीं।

समय के साथ-साथ हम बड़े हुए तो चन्नर के चेहरे पर भी कुछ मूँछ दाढ़ी आई। वह ख़ुद को किसी तरह घसीटते हुए ज़िंदगी को भी घसीटता रहा। अब वह बहुत काम का नहीं रह गया था लेकिन फिर भी खेतअगोरने और गाय भैंस चराने जैसा काम अपनी समझ और हिम्मत के अनुसार करता रहता। गाहे-बगाहे दारोग़ा चच्चा से पिटना उसकी नियति में शामिल था और उसकी चींखे उस घर में मौजूद किसी भी पुरुष या महिला को विचलित नहीं करती थीं। वही महिलाएँ जो अपने बच्चों के बहते ख़ून देखकर अमूमन बेहोश होने लगती थीं, उनको चन्नर के बहते ख़ून और चीख़ से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था। कई बार तो बुरी तरह पिटने के बाद वह दो-तीन दिन तक अपनी टूटी खटिया पर पड़ा रहता। ऐसे में घर से जो कुछ रूखा-सूखा खाने को मिल जाता, उसी से अपनी साँसें जारी रखता। और अगर घर में किसी को दया आ गई तो चन्नर की दवा भी करा देता। फिर ठीक होते ही वह वापस अपने काम में ऐसे जुट जाता जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो। प्रतिरोध करना तो पशुओं को भी आता है और इनसान न करे, ऐसा हो ही नहीं सकता। चन्नर से भी जब उससे हो रही मारपीट की बात हम करते, तो उसके चेहरे पर कुछ पल के लिए तनाव आ जाता। लेकिन मानसिक और शारीरिक रूप से अपंग चन्नर के लिए इससे ज़्यादा प्रतिरोध कर पाना संभव भी नहीं था। एक चीज़ जो बड़े होकर बहुत परेशान करती थी वह यह थी कि हमारे गाँव में बहुत से लोग पढ़ लिखकर अच्छे पदों पर आ गए थे, लेकिन किसी को भी चन्नर के लिए दारोग़ा चच्चा से कुछ कहते नहीं सुना। उल्टा उसकी पीड़ा में रस लेने वाले ज़रूर बढ़ गए थे।

जीवन का एक पहलू यह भी है कि समय के साथ-साथ उनसे भी लगाव हो जाता है जिससे नफ़रत का ही रिश्ता रहा हो। और यही हुआ चन्नर के साथ भी, उसे दारोग़ा चच्चा के घर के अलावा और किसी जगह अच्छा नहीं लगता। अब शरीर की तो अपनी केमिस्ट्री होती है और चन्नर की बढ़ती उम्र के साथ-साथ उसके शरीर की ज़रूरत भी पैदा होने लगी। दरअसल चमरौटी की बहुत सी महिलाएँ काफ़ी हंसोड़ और मज़ाकिया थीं और उनको चन्नर को छेडने में मज़ा आता था। वैसे भी चन्नर से ठकुराने की औरतें तो चाहकर भी मज़ाक नहीं कर सकती थीं, वह उनका मजूर जो ठहरा। ऐसे में उसको चमरौटी से जोड़कर कई क़िस्से बन गए, हालाँकि मुझे कभी भी उन क़िस्सों पर भरोसा नहीं हुआ। गाँव में कई लोग उसे छेड़ते भी कि चन्नर फ़लाने से बियाह कर लो लेकिन वह अपनी अस्पष्ट आवाज़ में इनकार कर देता।

साल दर साल बीतते रहे, हर गर्मी की छुट्टी में चन्नर एक साल में ही दस साल बूढ़ा दिखने लगता। लेकिन मिलने पर वही मुस्कराहट और “कइसन हो भैया” जारी रहा। अब उसका चलना फिरना बहुत कठिन हो गया था और दिखाई देना भी काफ़ी कम लेकिन ज़िंदगी से उसका लगाव कभी कम नहीं दिखा। दारोग़ा चच्चा भी अब बढ़ती उमर का शिकार हो रहे थे लेकिन अभी भी अपने सब काम करते रहते। गाँव में विकास बढ़ता रहा, घर और खेत छोटे होते गए और लोगों के इगो विकास से भी दोगुनी रफ़्तार से बढ़ते रहे। अब गाँव जाने पर सबके घर-घर जाने का उत्साह पहले जैसा नहीं था, आपसी रिश्तों के बीच एक ठंडापन नज़र आने लगा। ऐसे ही एक साल दारोग़ा चच्चा के दरवाज़े पर चन्नर नहीं दिखा तो चिंता हुई। पूछने पर पता चला कि अब उससे चला फिरा नहीं जाता है और उसे दिखाई भी नाममात्र ही देता है। यह पता चलने पर कि वह कुन्बियाने के तरफ़ के खेत पर गया है, मेरे क़दम अपने-आप उधर मुड़ गए। मन में एक बात लगातार चल रही थी कि चन्नर मुझे पहचान पाएगा कि नहीं। खेत के सामने पहुँचते ही चन्नर एक झोलंगी खटिया पर बैठा दिख गया, उसके हाथ में एक पतला-सा डंडा था और वह आहट आने पर आवाज़ की तरफ़ देखते हुए कुछ बोलने लगता।

मैं उसके सामने जाकर खड़ा हो गया और मेरी आहट मिलते ही चन्नर ने बुदबुदाते हुए कहा “देखत हुई।” मुझे थोड़ा समय लगा उसका कहा समझने में लेकिन फिर बात समझ में आते ही दिल भर आया। एक देख पाने में असमर्थ व्यक्ति देख लेने का दावा कर रहा है, और समाज के कर्णधार जिन्हें सब दिखता है, वह जानबूझ कर अंधे बन रहे हैं। कुछ पल बाद जैसे ही मैंने उसे आवाज़ दी, उसके चेहरे पर वही पुरानी मुस्कराहट खिल गई और उसने अस्पष्ट शब्दों में कहा “कइसन हो भैया।” कुछ देर वहाँ खड़ा रहने के बाद मैं भारी क़दमों से वापस आ गया लेकिन मन में कुछ चुभ गया।

वैसे इस बार घर पर बब्बा ने बातचीत के दौरान एक बात बताई थी जिसको सुनकर मुझे बेहद सुकून हुआ। गाँव में कई लोगों ने दारोग़ा चच्चा से कहा कि अब चन्नर को काहे घर पर रक्खे हो,बनारस जाकर गंगा के घाट पर क्यों नहीं छोड़ देते, वहीं भीख माँगकर पड़ा रहेगा। लेकिन दारोग़ा चच्चा ने उनको पलटकर ऐसा जवाब दिया कि लोगों की बोलती बंद हो गई “अइसन हौ, आपन पूरा उमर चनरा हमरे यहाँ काम कइले हौ, अब ई ससुर यहीं मरी। घरे के कुक्कुर बिलार से भी लगाव हो जाला, ई त तब्बो इनसान हौ।” मैं इसके बाद बहुत देर तक मानव स्वभाव के पेंचीदगियों में उलझा रहा, कहाँ इसी चन्नर को दारोग़ा चच्चा जानवर की तरह पीटते थे और कहाँ उसी को घर पर ही रक्खे जब तक वह ज़िंदा रहा।

एक सेवानिवृत्त व्यक्ति का सबसे बड़ा दुख होता है उसकी पहचान का ख़त्म होना, उसकी कुर्सी के साथ जुड़ी इज़्ज़त का समाप्त हो जाना। कुछ यही हो रहा था हमारे गाँव में भी, फ़र्क़ बस इतना था कि गाँव पर ठाकुरों की झूठी और भयवश होने वाली इज़्ज़त अब धीरे-धीरे कम हो रही थी। सूबे में सरकार बदलने से पिछड़े और कमज़ोर तबक़े के लिए, कागज़ों पर ही सही, तमाम योजनाएँ आने लगीं और बहुत से गाँव “अंबेडकर ग्राम” बन गए। हमारा गाँव भी इस लहर से अछूता नहीं रहा और वह भी इसीका हिस्सा बन गया। जिस चमरौटी में एक भी पक्का घर नहीं था, वहाँ अब सरकारी मदद से कुछ पक्के मकान खड़े होने लगे। गाँव से लगभग 10 किमी दूर एक बैंक की शाखा भी खुल गई और बहुत से पिछड़े लोग जो कभी ठाकुरों और बनियों के सामने आर्थिक मदद के लिए हाथ फैलाते थे, वह लोग कुछ दलालों के मार्फत बैंक से लोन लेने लगे। आरक्षण का, सीमित ही सही, फ़ायदा दिखाई पड़ने लगा और गाँव के चमरौटी के एक-दो घर के लड़के अब सरकारी मुलाज़िम बन गए। अब धीरे-धीरे ठाकुरों का दबदबा कम हो रहा था और उनके सामने हाथ जोड़कर खड़े रहने वाले और उनकी बेगारी करनेवाले अब कम होते जा रहे थे। दारोग़ा चच्चा का भी यही दर्द था, किसी समय उनके सामने जिनके मुँह से बकार भी नहीं निकलती थी, अब उन्हीं लोगों के लड़के उनके सामने खटिया से भी खड़े नहीं होते थे।

अगले कुछ सालों तक मैं गाँव जाता रहा, आर्थिक परिवर्तन का असर दिखाई पड़ने लगा था। अब गाँव के ठकुराने के कुछ लोग भी चमरौटी में चाय पानी पीने लगे और एक-दो घरों की शादियों में भी आना-जाना होने लगा (उन्हीं घरों में जो सरकारी मुलाज़िम बन गए थे)। एक और चीज़ ने इस भेदभाव को दूर करने में बहुत बड़ा काम किया था और वह थी अमूमन हर गाँव में बनने वाली देशी शराब। अक्सर इस शराब की भट्ठी चमरौटी या ऐसे ही इलाक़ों में ही होती और उसे पीने वालों में कोई सामाजिक भेदभाव नहीं दिखाई पड़ता। ख़ैर अब आपसी भेदभाव काफ़ी कम होने लगा और ऐसे में दारोग़ा चच्चा जैसे पुरानी सोच के लोगों का दुखी होना लाज़मी था। फिर एक बार गाँव जाने पर पता चला कि चन्नर गुज़र गया। बाबा ने बताया कि उसका अंतिम संस्कार दारोग़ा चच्चा ने हिंदू रीति रिवाज़ों के हिसाब से किया और उसकी आत्मा की शांति के लिए कुछ पंडितों को भी खिलाया। चन्नर के गुज़र जाने के बाद उनके दरवाज़े पर फिर कोई मजूर नहीं आया, दरअसल अब मजूर मिलना संभव भी नहीं था। चमरौटी के लोग या तो शहर जाकर मज़दूरी करने लगे थे या साड़ी की बुनाई। अब चमरौटी में भी मोटर साइकल और टी।वी आ गए थे और दारोग़ा चच्चा ने उधर जाना छोड़ दिया था। इसी तरह समय आगे बढ़ता गया और एक दिन ख़बर मिली कि दारोग़ा चच्चा भी दुनिया से कूच कर गए। और एक ऐसे क़िस्से का अंत हो गया जिसे हमारी आने वाली पीढ़ी क़िस्से कहानियों में तो शायद कभी पढ़ लेगी लेकिन उसपर भरोसा नहीं कर पाएगी।

कोई और चारा भी तो नहीं- कहानी

 आज दुक्खू पंडित बहुत पेशोपेश में थे, दिल उनका अब भी मानने को तैयार नहीं होता था। लेकिन अगर ऐसा नहीं करेंगे तो फिर खेती का क्या होगा और घर पर अन्न कैसे पहुँचेगा, वह कुछ तंय नहीं कर पा रहे थे। ख़ैर एक बार उन्होंने खेत में खड़ी मटर की फ़सल को देखा और फिर उनके हाथ बल्लम पर मज़बूती से कस गए।

पिछले दो दिन से घर पर उनकी पंडिताइन से इस मसले पर बहस हो रही थी। उनका दिल किसी भी हाल में इसके लिए तैयार नहीं था और वह उनको हर हाल में ऐसा करने से रोक रही थी। लेकिन दुक्खू पंडित भी आख़िर क्या करते, उनके सामने घर चलाने का संकट साफ़-साफ़ दिख रहा था।

"अब भूलकर भी ऐसा पाप मत करना, चाहे जो हो जाए। जैसे हमेशा हाँक देते हैं, वैसे ही हाँक दिया करिए, वरना नरक में भी जगह नहीं मिलेगा सोच लीजिएगा", पंडिताइन ने अंदर से भयभीत होते हुए बहुत दुखी मन से कहा था। उन्होंने कुछ जवाब नहीं दिया और खाने के बाद थरिया में हाथ धोकर बाहर निकल गए।

चाहे जो भी सोचकर माँ-बाप ने उनका नाम दुक्खू रखा था लेकिन आज उनको लग रहा था जैसे उन लोगों ने इनका भविष्य बचपने में ही देख लिया था। फिर एक बार उनके दिमाग़ में आया कि काश उनका नाम सुक्खू रखा होता तो कितना अच्छा होता, शायद नाम के प्रभाव से ही कुछ सुख उनके हिस्से में भी मुअस्सर होता। एक समय था जब उनके गाँव में उन लोगों का ख़ानदान पंडिताई के सहारे मज़े में जीवनयापन कर रहा था। एक यही तो काम ऐसा था जिसमें हर समय लोग याद करते थे, अब चाहे जनम हो, शादी बियाह हो या मरनी करनी। और गाँव समाज में इज़्ज़त प्रतिष्ठा अलग से थी, इसलिए खेती बारी होते हुए भी उनके घर के लोग कभी खेती बारी पर ध्यान नहीं देते थे। ज़मींदारों की बात अलग थी लेकिन बाक़ी सभी काश्तकारों से अपने को बेहतर ही मानते थे ये लोग।

धीरे-धीरे समय बदला, पंडिताई में अब वह बात नहीं रही। शादियाँ तो अब भी होती थीं और बाक़ी सब भी वैसे ही चल रहा था लेकिन उनके ख़ानदान में भी बँटवारा होते होते बहुत से लोग इस पेशे में आ गए। जैसे-जैसे कमाई घटती गई, उनके ख़ानदान के लोग भी खेती पर ध्यान देने लगे। बाप-दादा के चलते खेत ज़्यादा तो नहीं थे लेकिन काम भर का अनाज और सब्ज़ी वग़ैरा हो जाता था।

उनको याद आया कि एक समय था जब खेत में कुछ भी लगा देते थे, उसे अगोरने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। कितना अच्छा समय था वह, जब कई परजा भी गाहे-बगाहे उनकी खेती बारी देख ही लेते थे। और उस समय कोई भी किसी और के खेत से बिना पूछे शायद ही कुछ लेता था। लेकिन धीरे-धीरे समय बदला, ज़रूरतें बदलीं और ज़िंदगी में पैसे की अहमियत बढ़ने लगी। लोग अब ऐसे ही बिना किसी मतलब के किसी को कुछ देने से परहेज़ करने लगे। इसका असर दुक्खू पर भी पड़ा और वह भी अब बिना मतलब शायद ही किसी को कुछ देते थे, हाँ किसी से कुछ काम हो तो अलग बात थी। अब खेत को अगोरने का काम लगभग सबने शुरू कर दिया था और सबके खेतों के किनारे एक झोलंगी खटिया बिछ गई थी।

समय धीरे-धीरे बीत रहा था, अधिकांश घरों की स्थिति एक जैसी ही थी, बस किसी तरह दाल रोटी चल रही थी। और हर कोई धीरे-धीरे अपने आपको बदलते समय के साथ अभ्यस्त कर चुका था। दुक्खू भी अपने दरवाज़े से लगभग टूट चुकी खटिया लाकर अपने खेत के किनारे रख दिए थे और फ़सल के सीज़न में रात खेत पर ही बिता देते थे। गर्मी के समय तो ठीक था लेकिन बरसात और जाड़े में खेत के किनारे रात बिताना बेहद कष्टकारी होता था। साल इसी तरह बीत रहे थे और गाँव के तमाम लोगों की तरह उनकी ज़िंदगी भी धीरे-धीरे इन्हीं सब में जाया हो रही थी।

फिर कुछ साल पहले, या यूँ कहें कि इक्कीसवी सदी के प्रारंभ ने, उनके गाँव के लोगों को एक नई समस्या से रू-ब-रू कराया। अचानक खेतों की तरफ़ कुछ जानवर आने लगे जो देखने में गाय जैसे लगते थे। शुरूआत में लोगों को लगा कि शायद जंगली गाय जैसा कुछ है। फिर लोगों को पता चला कि ये घड़रोज (नीलगाय) हैं जो कि गाय नहीं होते बल्कि जंगली जानवर होते हैं। लेकिन दिखने में ऐसे थे कि दुक्खू को हमेशा लगता जैसे गाय ही है। कभी-कभार इक्का-दुक्का घड़रोज आते तो उतना नुक़सान नहीं होता लेकिन जब झुंड के झुंड ये खेतों में आते तो पूरा इलाक़ा तहस-नहस कर देते। किसान तबाह होने लगे तो बात प्रशासन तक पहुँची और फिर उनको मारने का लाइसेंस भी यदा-कदा जारी होने लगा। लेकिन तब भी दुक्खू और उनके जैसे तमाम हिंदू परिवार नीलगाय को मारने के बारे में नहीं सोच पाते थे, क्योंकि उसके नाम में आख़िर गाय जो लगा हुआ था।

दुक्खू के गाँव के चार तरफ़ अलग-अलग बिरादरियों के गाँव बसे हैं, एक तरफ़ हरिजन बस्ती तो दूसरी तरफ़ कुनबियों का गाँव। बीच में अहिरान है तो एक तरफ़ मुस्लिम लोगों का गाँव। मुस्लिम बस्ती के लोग तो बंदूक़ से नीलगाय का शिकार करने लगे और फिर उसकी दावत उड़ाते। दुक्खू को भी मन ही मन राहत महसूस होती कि चलो उनसे छुटकारा मिला और खेत भी बचे। इसी तरह कभी फ़सल बचती और कभी बर्बाद होती, लेकिन खेती पर नीलगायों का आतंक कम होने का नाम नहीं ले रहा था।

इस समय तक समाज ठीक-ठाक स्थिति में ही था, आपसी तनाव बहुत नहीं दिखता था। वैसे तो बाबरी मस्जिद भी ढह चुकी थी और हिंदुस्तान कई बार सांप्रदायिक दंगे की आँच में झुलस चुका था। लेकिन अभी भी दुक्खू के अपने टोले और पड़ोसी मुस्लिम टोले में बहुत फ़र्क़ नहीं दिखता था। आपस में ईद में सेवई, बकरीद में मटन और दीवाली में मिठाइयों का लेन-देन बदस्तूर जारी था, हाँ महँगाई का असर ज़रूर दिखने लगा था। तो बात हो रही थी नीलगाय की जिसके आतंक के साए में दुक्खू और उनके अगल-बगल के गाँव के किसान लगातार जी रहे थे। उनसे पार पाने के लिए कई लोगों ने चिड़िया मारने वाली बंदूक़ें ख़रीद लीं, तो कुछ ने अपने खेत कंटीले तारों से घेरने चालू कर दिए थे।

इस बीच भारतीय राजनीति में बदलाव का दौर शुरू हुआ जिसकी आहट सबको सुनाई पड़ रही थी। अब जय सियाराम के नारे की जगह जय श्रीराम ने ले ली थी और गाँव के कुछ घरों पर भगवा झंडे टंगने शुरू हो गए थे। टेलीविजन और कई अख़बारों ने धीरे-धीरे दुक्खू और उनके जैसे अनेक हिंदुओं के मन में ये भावना पुख़्ता करना शुरू कर दी कि पहले वाली सरकार ने दूसरी क़ौम के लोगों का विशेष ध्यान रखा था। और अब समय आ गया है कि वह लोग भी अपने हिसाब की सरकार चुनें और अपने लोगों को आगे बढ़ाएँ। और मतदान के बाद जब केंद्र में नई सरकार आई तो दुक्खू और उन जैसे तमाम लोगों को लगा जैसे अब उनके तमाम दुखों का अंत हो जाएगा।

अब अख़बार की सुर्ख़ियाँ गाय और मंदिर जैसी ख़बरें होने लगीं और इनको पढ़कर कहीं-न-कहीं दुक्खू को बहुत सुकून मिलता। उसकी माली हालत में तो कोई बदलाव नहीं हो रहा था लेकिन उसका कोई मलाल दुक्खू और उनके जैसे अनेक लोगों को नहीं था। कई जगहों पर गौ सेवकों के तांडव की ख़बरें आतीं लेकिन दुक्खू को पढ़कर अच्छा ही लगता था। गाय से जुड़ी हुई भावना के चलते ऐसी ख़बरें दुक्खू और अधिकतर गाँव वालों को विचलित नहीं करती थीं। और कुछ लोग जो ऐसी ख़बरों का विरोध करते थे वह इन लोगों को फूटी आँखों नहीं सुहाते थे। फिर समय ने और करवट ली और प्रदेश में भी यही सरकार आ गई। बस अब दुक्खू को लगा कि जैसे रामराज्य फिर से स्थापित होने का समय आ गया।

नई सरकार के आने के कुछ समय बाद ही बूचड़खानों पर कार्यवाही शुरू हुई और वजह चाहे जो भी रही हो, दुक्खू को लगा जैसे अब गौ माता की रक्षा में कोई कोर-कसर बाक़ी नहीं रहेगी। गाँव की चौपालों पर चलने वाली बहस अब सिमटकर इन्हीं मुद्दों पर आ गई और दुक्खू और उसके जैसे लोग अपनी बात को हर क़ीमत पर मनवाने लगे। ख़ैर इन सबसे न तो दुक्खू के रहन-सहन में कोई फ़र्क़ आया और न ही उनकी ख़ुशहाली बढ़ी लेकिन धीरे-धीरे एक नया संकट खेती किसानी पर मंडराने लगा।

पहले भी गाँवों में गायें उतनी ही थीं और उनके बच्चे भी लेकिन आश्चर्यजनक बात यह थी कि दुक्खू के दरवाज़े पर ही क्या किसी और गाँव में भी किसी के भी दरवाज़े पर कोई बछड़ा नहीं दिखता था। सबके दरवाज़े पर सिर्फ़ गाय और बछिया ही नज़र आती थी, किसी किसी के दरवाज़े पर कोई बछवा अगर दीखता भी था तो बेहद कमज़ोर और बीमार सा। आख़िर गायों से पैदा हुए बछड़े कहाँ जाते थे, इसपर न तो किसी ने सोचने की ज़हमत उठाई और जो शायद जानते भी थे उन्होंने इस बात की चर्चा कभी की। आज के समय में खेत की जुताई के लिए हर तरफ़ ट्रैक्ट्रर आ गए थे, यहाँ तक कि दुक्खू का खेत भी मनोहर यादव का ट्रैक्टर जोतता था, तो किसी को भी अब बैल रखने की कोई ज़रूरत महसूस नहीं होती थी। बैल अब बिल्कुल अप्रासंगिक और ग़ैरज़रूरी हो गए थे, उनका न तो कोई उपयोग था और न कोई उन्हें गौ माता की तरह सम्मान देता था। लेकिन हर घर में गायें थीं तो उनके बच्चे भी थे, कुछ बछिया देतीं तो कुछ बछड़ा भी। लेकिन ये बछड़े जैसे ही थोड़े बड़े होते, लोग उनको सिवान में ले जाकर हाँक देते थे। और कुछ दिन बाद ही वे बछड़े परिदृश्य से कुछ यूँ ग़ायब हो जाते थे जैसे चुनाव के बाद अपने क्षेत्र से नेता। पता तो शायद सबको ही था कि इन बछड़ों का क्या होता था लेकिन चूँकि सबने अपने दरवाज़े से उनको हाँक दिया होता था तो किसी को उनकी चिंता भी नहीं होती थी।

नई सरकार के द्वारा जब कुछ बूचड़खाने बंद करवा दिए गए और कई दूसरे धर्म और निचली जात के लोगों को गाय की तस्करी के आरोप में गौ सेवकों द्वारा, जिनको प्रशासन का खुला समर्थन था, पीट दिया गया तो लोगों में इसके प्रति डर बैठ गया। अब धीरे-धीरे बछड़े, जो पहले बड़े होने के पहले ही अंतर्ध्यान हो जाते थे, वे सड़क पर घूमते फिरते दिखाई देने लगे। अब उनको खाना पानी तो कोई देता नहीं था तो वे अपने भोजन की तलाश में खेतों में उतरने लगे। किसान, जो कि अभी तक नीलगाय के आतंक से उबर भी नहीं पाए थे, उनके सर पर यह दूसरी बड़ी आपदा थी। इन बछड़ों को मारने के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता था, एक तो गाय की संतान, दूसरे वर्तमान सरकार और उसके संरक्षित गौरक्षक। दुक्खू के खेत पर भी उनका आक्रमण शुरू हुआ तो शुरूआत में दुक्खू उनको पुचकार कर भगाने का उपक्रम करते रहे। लेकिन जब खेत में खड़ी लहलहाती फ़सल उनके सामने बर्बाद होने लगी तो उनके सामने भी कोई चारा नहीं बचा। अपने आपको ज़िंदा रखना ही था तो वह भी अन्य गाँव वालों की तरह ही इनसे छुटकारा पाने की तरकीब सोचने लगे।

पंडिताइन भी इन सबसे अनजान नहीं थीं, उनकी भी अपनी मंडली थी जिसमें गाँव और घर गृहस्थी की पंचायत चलती थी। उनको भी अपनी मंडली और अगल-बगल के घरों से इन बछड़ों के आतंक के बारे में पता चलता रहता था। लेकिन जिस गौ माता के बारे में उनके मन में अगाध श्रद्धा थी, उनके बछड़े के बारे में कोई ग़लत विचार लाना उनको पाप लगता। एकाध बार दुक्खू ने कहा भी कि लगता है कि इन बछड़ों का कुछ करना पड़ेगा नहीं तो अनाज का एक दाना भी घर नहीं आएगा, तो पंडिताइन ने उनको कुछ भी ग़लत करने से रोक दिया।

"आख़िर हैं तो गौ माता के बछड़े ही, हाँक दिया करो उनको। मारना मत नहीं तो बड़े पाप के भागी बनोगे", पंडिताइन हर हालत में दुक्खू को किसी भी ऐसे क़दम लेने से रोकती थीं।

"तो का चाहती हो, हवा फांकें हम लोग, या पानी पीकर ज़िंदा रहें। बड़ी मुश्किल से तो अपनी फ़सल नीलगाय से बच रही थी कि यह नई मुसीबत भी आ गई। यही हाल रहेगा तो भीख माँगना पड़ेगा हम लोगों को", दुक्खू अपना पक्ष रखते। और यह बात सिर्फ़ दुक्खू की ही नहीं थी, कमोबेश सभी गांववालों की थी। लेकिन कुछ-कुछ सहमत होते हुए भी पंडिताइन ने दुक्खू को हमेशा ऐसा करने से रोका।

गाँव में लोग आपस में बात करते, दबी ज़ुबान से लगभग सबकी इच्छा यही थी कि जैसे घड़रोजों को मारकर भगाने में कोई दिक़्क़त नहीं होती, वैसे ही इन बछड़ों को भी मारना होगा। लेकिन कोई भी खुलकर यह बात कह नहीं सकता था, आख़िर सरकार इसके ख़िलाफ़ थी।

बल्लम पर हाथ कसे हुए दुक्खू के मन में यह सारी बातें घूम रही थीं तभी उनको सामने से बछड़ों का दल आता दिखाई पड़ा। एक बार तो उनके हाथ कांपे, आज तक नीलगाय पर भी कभी बल्लम नहीं चलाया था उन्होंने। लेकिन अपनी फ़सल की दुर्दशा और आसन्न भविष्य को सोचकर उनके हाथ बल्लम को उठाकर अपने-आप तन गए और उन्होंने उसे सामने से आ रहे बछड़े की तरफ़ फेंक दिया।


Wednesday, December 8, 2021

कुछ तो रिश्ता है--संस्मरण

 पिछले साल जून में जब हम उज्जैन आये थे तो हमें यह सपने में भी इल्म नहीं था कि कुछ ऐसे खूबसूरत रिश्ते बनेंगे यहाँ पर. ये अलग बात है कि इसका आभास मुझे उस पहले दिन ही हो जाना चाहिए था जब सुबह सोकर उठते ही दरवाजे पर रखी कुर्सी पर बिल्ली के दो प्यारे प्यारे बच्चे आराम फरमाते मिले थे. बहरहाल उन बच्चों को देखकर बेहद ख़ुशी हुई और फिर धीरे धीरे रोज उनको देखने की आदत सी पड़ गयी. उनके लिए दूध और ब्रेड रोज रखना हमारा नियम होने लगा और फिर उनमें से एक बिल्ली (जिसका नाम ही हम लोगों ने बिल्लू रख दिया है), वह हमसे खूब हिल मिल गया. न तो वह हमें देखकर भागता था और न ही घबराता था, बल्कि वह खेलता जरूर था. समय के साथ साथ वह बड़ा होता गया और फिर वह हमारी जिंदगी का एक हिस्सा बन गया. अगर किसी रोज वह सुबह नहीं आता तो मन में सवाल पैदा हो जाता था कि कहाँ रह गया. और अगर वह शाम तक भी नहीं नजर आया तो हम उसे ढूंढने निकल जाते थे. और आखिरकार वह अपनी कॉलोनी के ही किसी घर के आसपास मिल जाता और फिर उसे हम अपने साथ साथ लेकर आते. दूर से किसी को भी यह आभास हो सकता था कि वह हमारा पालतू बिल्ली है लेकिन दिन भर कहीं और बिताने के बाद वह सिर्फ सुबह और शाम को ही आता था. आते ही उसकी अपनी आवाज में चिल्लाना शुरू होता और वह तब तक नहीं बंद होता जब तक उसे दोष और ब्रेड नहीं मिल जाता. जाड़े में हमने अपने बरामदे में उसके लिए एक कार्टून में कुछ कपडे रख दिए थे जिसमें वह आराम से सो जाता था और सुबह जैसे ही हमारी आहट आती, वह उठकर अपनी आवाज लगाना शुरू कर देता.

इसी तरह से समय बीत रहा था और इसी दरम्यान हमारे यहाँ एक प्यारे से कुत्ते "सोबो" का आगमन हो गया. वह बहुत छोटा था जब आया था और बिल्लू के साथ वह मजे में रहता था, कोई लड़ाई झगड़ा नहीं होता था. अब हमारे पास दो प्यारे जानवर हो गए थे, एक घर के अंदर तो दूसरा घर के बाहर. इसीबीच एक दिन मैं एक दावत में बाहर गया हुआ था. वापस लौटने में रात हो गयी और जब मैं कॉलोनी के अंदर आया तो अचानक मेरी नजर एक बिल्ली पर पड़ी जो किसी के कार के पीछे लेटी हुई थी. मुझे उत्सुकता हुई कि आखिर कौन बिल्ली है जो रात के समय इस तरह कार के पीछे लेटी है. और जब मैंने पास जाकर देखा तो वह हमारा बिल्लू ही था लेकिन उस तरह लेते रहना उसके स्वाभाव में नहीं था. मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ और जब मैंने उसे अपनी मोबाइल की रोशनी में ध्यान से देखा तो वह बिलकुल निस्तेज पड़ा हुआ था. मैंने चिंता में उसे थोड़ा हिलाया डुलाया तो उसके अजीब तरह से कराहने की आवाज आयी. अब मुझे यकीं हो गया कि इसके साथ कोई दुर्घटना जरूर हुई है. उसके शरीर में कीचड़ लगा हुआ था और उसपर से वह खड़ा भी नहीं हो पा रहा था. मैंने गार्ड को बुलाकर पूछा तो उसने बताया कि यह नाली में गिर गया था और किसी तरह से बाहर निकलकर यहाँ पड़ा हुआ है. तब तक कॉलोनी के कुछ और लोग भी आ गए और पूछने लगे कि क्या हुआ है. मैंने उसी समय बेटी को भी बुलाया और उसने भी जब बिल्लू को देखा तो वह भी परेशान हो गयी. खैर उसने तुरंत उस डॉक्टर को फोन किया जिससे हम सोबो की दवा लेते थे और हमारे कॉलोनी के लोगों ने भी एक डॉक्टर से उसके संभावित इलाज के बारे में पूछ लिया. सोबो के डॉक्टर ने बताया कि मैं एक दवा लिख रहा हूँ, उसे मंगवा कर दे दीजिये. शायद इससे बिल्लू ठीक हो जाए और अगर नहीं ठीक हुआ और सुबह तक जिन्दा रहा तो हस्पताल लेकर आईये. हमने बिल्लू के लिए तुरंत दवा मंगवाई और फिर उसे किसी तरह पकड़कर दवा दिया गया. अबतक उसके कराह में थोड़ी कमी हो गयी थी और ऐसा लग रहा था कि शायद वह सुबह तक ठीक हो जाएगा. उसको किसी तरह बोर में डालकर हम अपने घर ले आये और फिर उसे उस कार्टून में रख दिया. उसके लिए थोड़ा सा दूध और ब्रेड भी रख दिया गया कि शायद वह इसे खा ले. इन सब में रात के लगभग बारह बज गए थे और ठण्ड भी बढ़ गयी थी तो हम लोगों ने बिल्लू को कार्टून में छोड़ा और घर के अंदर आकर सोने चले गए.

अब ऐसे में नींद तो क्या खाक आती, बस किसी तरह सुबह हुई और हम बाहर बिल्लू को देखने आये. दिल तो धड़क रहा था लेकिन उम्मीद थी कि बिल्लू ठीक हो गया होगा. जैसे ही बाहर आकर हमने कार्टून को हिलाया, बिल्लू ने छलांग लगायी और बाहर आकर खड़ा हो गया. उस समय इतनी ख़ुशी मिली जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है लेकिन थोड़ी देर तक शरीर सीधा करने के बाद उसने एक छलांग लगायी और वह गेट पर चढ़ गया. हम लोग प्रसन्नता से उसे जाते हुए देख रहे थे, वह थोड़ी दूर आगे गया और फिर रुका. उसने एकबार पलटकर हमारी तरफ देखा और शायद अपनी देखभाल करने के लिए हमें धन्यवाद देकर चला गया. शाम को वह वापस आया और उसी तरह से आवाज करके खाना माँगा. अब हमें यक़ीन हो गया कि वह एकदम से ठीक हो गया है और हमारी एक बड़ी चिंता दूर हो गयी. इसके एक दो महीने बाद अचानक वह एकदिन बुरी तरह लंगड़ाते हुए आया और फिर महीनों वह लंगड़ाकर ही चलता रहा. शायद उसके पेअर में चोट लग गयी थी लेकिन उसे लेकर डॉक्टर के पास जाना मुश्किल था. फिर दो तीन महीने बाद एक दिन वह बिलकुल ठीक हो गया, वैसे ही जैसे वह लंगड़ाने लगा था. 

पिछले दो तीन महीनों से वह हफ्ते में एकाध बार ही आता था और कभी कभी उसकी चिंता होने लगती थी. लेकिन अब पिछले एक हफ्ते से वापस वह सुबह शाम आने लगा है और आकर पहले जैसे ही वह भोजन के लिए हल्ला मचाता है. अब फिर से बेहद सुखद अनुभूति हो रही है, दोनों बिल्लू और सोबो मजे में साथ साथ रहते हैं और आपस में बिलकुल झगड़ते नहीं हैं. बस उनमें थोड़ी बहुत मस्ती चलती रहती है जो देखने में बेहद सुखद लगती है. 


Thursday, November 25, 2021

एक यात्रा जो भुलाए नहीं भूलती-- यात्रा संस्मरण

 

वैसे तो यात्रायें की ही इसलिए जाती हैं कि न सिर्फ व्यक्ति उसके बाद तरोताजा हो जाए और यात्रा में देखे गए स्थलों को किसी भी हाल में भूल नहीं पाए, बल्कि उनकी स्मृतियों को अपने मन के किसी कोने में सहेज कर रख दे. इस लिहाज से हर यात्रा अविस्मरणीय ही होनी चाहिए लेकिन कुछ यात्रायें सचमुच ऐसी होती हैं जो भुलाये नहीं भूलतीं. ऐसी ही एक यात्रा हम लोगों ने जनवरी 2017 में, जब हम लोग जोहानसबर्ग, दक्षिण अफ्रीका में थे, तब की थी जो आज भी मानस पटल पर छपी हुई है. दक्षिण अफ्रीका के लगभग साढ़े तीन साल के प्रवास में हम लोगों ने उस देश की खूबसूरती को खूब देखा और जहाँ भी गए, वह जगह हमें दुबारा बुलाती रही. और इसी का नतीजा था कि एक ही जगह को हम लोगों ने कई कई बार देखा. मसलन जोहानसबर्ग से सबसे नजदीक और दर्शनीय शहर डरबन था जिसे हमने कई बार देखा. सबसे खूबसूरत शहर केपटाउन था जिसे हमने कई बार देखा और ऐसे ही कई अन्य जगहें थीं जिन्हें हमने कई बार देखा.

लेकिन अगर आपको वन्य प्राणियों में दिलचस्पी हो तो आप वहां स्थित क्रूगर नेशनल पार्क कभी भी मिस नहीं कर सकते. (वैसे भी अफ्रीका अपने बिग 5 जानवरों के लिए जाना जाता है, भैंसा, हाथी, शेर, चीता और गैंडा). एक तो यह पार्क लगभग 19000 वर्ग किमी में स्थित है जिसे पूरी तरह से देखने में आपको कई हफ्ते भी लग सकते हैं. इसी वजह से इसमें प्रवेश और निकास के लिए लगभग 10 गेट बने हुए हैं जिनमें आपस में सैकड़ों किमी का फासला है. और अमूमन आप किसी एक गेट से प्रवेश करते हैं और अगर आपको अंदर नहीं रुकना है तो शाम को 6 बजे के पहले आपको किसी अन्य गेट से बाहर निकलना पड़ता है. पार्क के अंदर गति सीमा भी निर्धारित है जो अधिकतर जगह 40 किमी प्रति घंटा है और आपको पूरा दिन लगातार चलना पड़ता है तब जाकर आप किसी दूसरे गेट से बाहर निकल सकते हैं.

खैर हमने जब दुबारा जनवरी 2017 में क्रूगर नेशनल पार्क जाने का निश्चय किया तो सबसे पहले प्रवेश द्वार के बारे में सोचा गया. इसके पहले जब हम गए थे तब हम लोगों ने फलाबोरवा गेट से प्रवेश किया था, इसलिए इस बार किसी अन्य गेट से प्रवेश करने का निर्णय लिया गया. इस निर्णय के पीछे एक कारण और भी था और वह पिछली बार शेर को नहीं देख पाने का था. इसलिए किसी अन्य गेट से अंदर जाकर घूमने में हमें उम्मीद थी कि वनराज इस बार अवश्य देखने को मिल जाएंगे. इस बार हम लोगों ने पुण्डा मारिया गेट से क्रूगर में प्रवेश करने का निर्णय लिया और उसी आधार पर मैंने उसके आस पास के एक होटल को ऑनलाइन बुक भी कर लिया. चूँकि पिछली बार वाला होटल बहुत अच्छा था जिसे हमने ऑनलाइन ही बुक किया था इसलिए इस बार भी उसी उम्मीद में हमने बुक कर लिया. होटल से कमरा बुक होने का सन्देश भी फोन पर आ गया और हम लोग वहां जाने की तैयारी में लग गए. चूँकि जोहानसबर्ग से पुण्डा मारिया गेट की दूरी लगभग 8 घंटे की थी इसलिए सुबह जल्दी निकलकर वहां पहुँचने की योजना बनी. रास्ते को खंगालते समय पता चला कि उस गेट के पास ही, जो लिंपोपो प्रान्त में था, दक्षिण अफ्रीका के सबसे पुराने पेड़ों में से एक पेड़ "सागोले बाओबाब" है जिसके बारे में धारणा थी कि वह हजारो साल पुराना है और बेहद विशालकाय है. अब हमारे पास थोड़ा समय भी था क्योंकि होटल में तो रात में आराम ही करना था जिससे सुबह तड़के ही क्रूगर में प्रवेश किया जा सके (सुबह 6 बजे से ही लोगों के लिए गेट खुल जाता है और शाम को 6 बजे बंद होता है). इसलिए हमने पहले जी पी एस की मदद लेते हुए उस बिग ट्री के पास जाने का फैसला किया और सुबह 6 बजे ही जोहानसबर्ग से अपनी कार द्वारा निकल पड़े. हर यात्रा में हम लोग कुछ खाने पीने का सामान भी लेकर ही चलते थे जिससे न सिर्फ समय की बचत होती थी बल्कि जेब पर भी वजन कम पड़ता था. सड़क के किनारे रास्ते भर आपको जगहें मिलेंगी जहाँ आप अपनी गाडी खड़ा कीजिये और मजे में भोजन कीजिये. हम लोग लगभग 2 बजे दोपहर में उस विशालकाय पेड़ "सागोले बाओबाब" के पास पहुँच गए. वास्तव में पेड़ तो बेहद विशाल था, उसकी उम्र भी लगभग 1700 साल थी और उसके चारो तरफ उसकी डालें जमीन पर कुछ इस तरह से पड़ी हुई थीं, गोया वे उसे तीनों तरफ से सहारा दे रही हों. पेड़ के तने के बीच में काफी जगह थी और उसके अंदर एक बार भी बना हुआ था जिसमें 6 -7 लोग आराम से खड़े होकर खा पी सकते हैं. बहरहाल इतने विशालकाय पेड़ को देखकर रोमांच हो आया और उसके इर्द गिर्द खूब फोटोग्राफी की गयी. एक अश्वेत महिला वहां देखभाल और टिकट देने के लिए थीं और उन्होंने हमारा स्वागत किया. वहां पर अमूमन अश्वेत महिलाओं को लोग "ममा" पुकारते हैं जो उनके लिए आदरसूचक शब्द है और हम भी उनको इसी सम्बोधन से पुकारते रहे. उस विशालकाय पेड़ के आस पास तमाम आम के पेड़ भी थे जिनपर लाल लाल आम लगे हुए थे. उनको देखकर हम लोगों के मन में उन्हें खरीदकर खाने की इच्छा हुई और हमने ममा से कहा कि हमें आम खाने हैं. ममा ने आम के मालिक को फोन करने की कई बार कोशिश की लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया. दरअसल शनिवार का दिन था और वह वहां पर वीकेंड होता है जिसमें अमूमन कोई न तो कार्य करता है और न ही किसी के फोन का जवाब देता है. बहरहाल हम लोग मन मसोस कर वहां से उन आमों को खाने की हसरत मन में ही रखे आगे बढ़ गए.

वहां से हमारे होटल की दूरी लगभग 2 घंटे की थी लेकिन हम रास्ता भटक गए और इसी बहाने लिंपोपो के ग्रामीण क्षेत्रों को देखते हुए अपने होटल पर पहुंचे. होटल के पहुँचने के रास्ते से ही मुझे अंदाजा हो गया कि इस बार होटल के चुनाव में गड़बड़ी हो गयी है. दरअसल होटल जिस क्षेत्र में था वहां सिर्फ अश्वेतों की ही आबादी नजर आ रही थी और वह हमारे लिए थोड़ा असुरक्षित महसूस हो रहा था. इसके बावजूद भी हम लोग होटल पहुंचकर वहां के स्वागत कक्ष पहुंचे और सोचा कि रात ही तो बितानी है, रुक लिया जाएगा. लेकिन स्वागत कक्ष में बैठी महिला से जब हमने अपने कमरे के बारे में पूछा तो उसने किसी भी बुकिंग से इंकार कर दिया. मेरे पास बुकिंग डॉट काम से आया सन्देश था लेकिन जब मैंने उसे दिखाया तो वह अपना सर इंकार में हिलाने लगी. इसी बीच मेरे जोर देने पर उसने किसी को फोन किया और मेरी बात कराई, उस व्यक्ति ने थोड़ा समय माँगा और बोला कि मैं देखता हूँ कि आपकी क्या मदद कर सकता हूँ. अब मेरे पास थोड़ा समय था तो मैंने सोचा कि पुण्डा मारिया गेट के बारे में पूछ लिया जाए कि वहां तक जाने में कितना समय लगेगा. मुझे उम्मीद थी कि अधिक से अधिक आधे घंटे में हम गेट पर पहुँच जाएंगे लेकिन उस महिला ने बताया कि यहाँ से गेट लगभग दो घंटे की दूरी पर स्थित है. अब मुझे समझ में आ गया कि मैंने इस बुकिंग में गलती कर दी है और फिर हमें उस होटल को छोड़ना ही बेहतर लगा. वैसे भी न तो वहां बुकिंग कन्फर्म हुई थी और वहां से सुबह 6 बजे गेट पहुँचने के लिए हमें चार बजे ही निकलना पड़ता जो उचित नहीं था. इसलिए हमने अपना बैग उठाया और उस महिला को नमस्ते करके हम लोग वहां से गेट की तरफ रवाना हो गए. 

इन सब में शाम हो गयी थी और मुझे उम्मीद थी कि जैसे पिछली बार फलबोरवा गेट के एकदम पास एक होटल मिल गया था, वैसे ही इस गेट के पास भी कोई न कोई होटल मिल ही जाएगा. मन में यह भी था कि रात ही तो बितानी है, कैसा भी होटल चलेगा  और हम लोग पुण्डा मारिया गेट के पास लगभग 7 बजे पहुंचे. अब अँधेरा हो चला था और गेट एकदम सुनसान था, आसपास कोई भी रहने का ठिकाना नहीं था. गेट तक पहुँचने का रास्ता भी एकदम सुनसान था और सड़क के आस पास बेहद गरीब अश्वेत लोग कच्चे घरों में रह रहे थे. हम लोगों ने गेट पर जाकर पूछा कि आस पास कोई रहने की जगह है तो उसने बताया कि सबसे नजदीक और सबसे बढ़िया जगह कोपा कोपा रिसोर्ट है जिसका बोर्ड हमें रास्ते में आते समय भी दिखा था. अब हमारे पास वहां जाने के अलावा कोई और चारा भी नहीं था, बस चिंता इतनी ही थी कि कहीं वहां कोई कमरा नहीं मिला तो फिर कहाँ जाएंगे क्योंकि रात हो गयी थी. वापस कोपा कोपा रिसोर्ट जाते समय सड़क के दोनों तरफ धुप्प अँधेरा था, कहीं कोई बिजली बत्ती का नामोनिशान नहीं था. बस हमें कार के हेड लाइट से सड़क दिखाई दे रही थी और हम लोग तेज गति से वापस जा रहे थे. अचानक सामने सड़क पर एक गधा खड़ा मिला जो कि आते समय नहीं मिला था, वैसे भी दक्षिण अफ्रका में सड़क पर जानवर शायद ही कभी मिलते थे तो आदत भी छूट गयी थी (अपने देश में तो यह आम दृश्य है). अब कार की गति तो काफी तेज थी लेकिन उस समय दिमाग ने काम करना बंद नहीं किया था इसलिए ब्रेक लगाकर कार को जैसे ही बगल की तरफ मोड़ा और आगे निकले तभी सामने एक गाय भी खड़ी मिल गयी. अब उस समय कैसे मैंने उस गाय को बचाते हुए सड़क पार किया, मुझे भी याद नहीं, बस हम लोग बिना दुर्घटना के किसी तरह निकल गए. दिल की धड़कनें काफी बढ़ गयी थीं और जल्दी जल्दी गेस्ट हाउस पहुँचने का ख्याल ही दिमाग में आ रहा था. दरअसल उस समय कई चीजें एक साथ गलत हो रही थीं इसलिए घबराना स्वाभाविक ही था और ऐसी अवस्था में दिमाग सही काम करे, यह थोड़ा अस्वाभाविक था. थोड़ी देर में वह चौराहा आ गया जहाँ से हमें दाहिने मुड़कर रिसोर्ट पहुंचना था. आगे रास्ता भी थोड़ा खराब था और उस समय दुर्भाग्य से उस इलाके में बिजली भी गायब थी इसलिए घटाटोप अँधेरा छाया हुआ था (दक्षिण अफ्रीका में अमूमन बिजली रहती ही है, शायद ही कभी इस तरह का अनुभव हुआ हो). किसी तरह हम लोग रिसोर्ट पहुंचे और वहां के स्वागत कक्ष में प्रवेश किया. रात के लगभग 9 बज रहे थे और हम लोग पिछले तीन घंटे के खराब अनुभवों से सहमें हुए थे. बहरहाल वहां एक प्रौढ़ पुरुष मिले जो अँधेरे में लालटेन जलाकर बैठे हुए थे, जैसे हमने उनका अभिवादन किया उसी समय हमें समझ में आ गया कि वह सज्जन नशे में धुत्त थे लेकिन जब हमने कमरे के बारे में पूछा तो उन्होंने हाँ में सर हिलाया. उस एक हाँ ने हमें तमाम तनावों से मुक्त कर दिया जो हमारे दिमाग में लगातार चल रहा था कि यदि यहाँ पर रहने की जगह नहीं मिली तो इस अँधेरी रात में और इस बियाबान में हम लोग कहाँ जाएंगे.  

बहरहाल हमें चंद मिनट लगे अपने आप को सामान्य करने में और यह महसूस करने में कि अब सब सही होगा. मैंने जाकर कार से अपना सामान निकाला और फिर हम लोग वापस उस स्वागत कक्ष में आ गए. बिजली अभी भी गायब थी और उस जगह के मैनेजर ने हमें बता दिया कि उस रिसोर्ट में एक कॉटेज हमें दे रहा है. वहां की औपचारिकता पूरा करके हम लोग उसी लालटेन की रौशनी में अपने फ्लैट की तरफ बढ़े जहाँ हमें रात बितानी थी. अंदर का पूरा इलाका जंगल का ही एक भाग जैसा लग रहा था और पगडण्डी पर चलते समय लग रहा था कि न जाने किस तरफ से कोई जंगली जानवर आ जायेगा. लगभग आधा किमी चलने के बाद हमारा कॉटेज आ गया और वह सज्जन उसे खोल कर चले गए. फिलहाल तो हम लोगों ने मोबाइल की रोशनी में अपना सामान अंदर किया लेकिन थोड़ी देर में ही समझ में आ गया कि बिना किसी लालटेन या लैंप के भोजन इत्यादि कैसे किया जाएगा. बहरहाल उस प्रौढ़ सज्जन को हमने इण्टरकॉम पर फोन किया तो वह थोड़ी देर में ही हमारे लिए भी एक लालटेन लेकर आ गए. अब उसी लालटेन की रोशनी में हम लोगों ने भोजन किया और सोने की तैयारी करने लगे. उस समय रात के लगभग 11 बज चुके थे और अगले दिन हमें सुबह 6 बजे पुण्डा मारिया गेट भी पहुंचना था. लेकिन जैसे ही हम लोग लेटे, उसी समय बिजली आ गयी और फिर हम लोगों ने एक बार आसपास का मुआयना करना शुरू कर दिया. कॉटेज के पीछे की तरफ एक बढ़िया सा स्विमिंग पूल था और ब्राई करने की जगह भी थी, कुल मिलाकर बेहद शानदार जगह थी. लेकिन सुबह के चलते हमें फटाफट सोना पड़ा और जल्दी ही नींद आ गयी.

सुबह 6 बजे तक हम लोग उस रिसोर्ट से निकल गए और वापस उसी सड़क पर चल पड़े जो पिछली रात के भयानक अनुभव समेटे हुए थी. लेकिन सुबह बहुत खुशनुमा थी, ठण्ड लग रही थी और सड़क बिलकुल सुनसान. हम लोगों ने थोड़ी देर में ही उस जगह को भी पार किया जहाँ पिछली रात हमें गधा और गाय मिली थी लेकिन सुबह उनमें से कोई भी मौजूद नहीं था. शायद रात को वे भी डर गए थे और फिर कभी सड़क पर खड़े नहीं होने की कसम खाकर चले गए थे. 7 बजते बजते हमने पुण्डा मारिया गेट से क्रूगर नेशनल पार्क में प्रवेश किया और फिर धीरे धीरे चारो तरफ देखते हुए आगे बढ़ने लगे. सबसे पहले हमें बिग फाइव में से जंगली भैंसे के दर्शन हुए जो मजे में जंगल की घास चर रहे थे. चूँकि उस जंगल में शेरों का एक निश्चित क्षेत्र था इसलिए ये भैंसे बिना किसी फिक्र के भोजन कर रहे थे. थोड़ा और आगे चलने पर सड़क के दोनों तरफ हिरन इत्यादि जानवर भी दिखाई पड़े. लगभग 30 किमी की यात्रा के बाद पहला जंगली हाथी का झुण्ड मिला जो सड़क पार कर रहा था. हम लोग उन्हें देखकर दूर ही खड़े हो गए और उनकी तस्वीरें लेने लगे तथा वीडियो बनाने लगे. उनके गुजरने के बाद हम लोग आगे बढ़े तो एक और हाथियों का झुण्ड मिला जो सड़क के किनारे खड़ा था. हम लोग दुबारा रुके और उनको देखने लगे. थोड़ी देर में ही जब वे सड़क पार करने लगे और हमें उनके छोटे छोटे बच्चे भी सड़क पार करते दिखाई पड़े तो हम कौतूहलवश उनके नजदीक तक अपनी कार लेकर आ गए. वहीं हमसे गलती हो गयी और एक मादा हाथी ने हमारी तरफ गुस्से में दौड़ना शुरू किया तो हमें अपनी गलती का एहसास हुआ. हम लोग वहां से सरपट भागे और एकाध किमी बाद जब पीछे देखा तो हाथी नहीं थे और हमारी जान में जान आयी. एक तो वहां के हाथी हमारे देश में पाए जाने वाले हाथियों से डील डौल में काफी ज्यादा बड़े और ताकतवर थे और उनके सामने हमारी कार भी खिलौने जैसी ही दिखाई पड़ती थी. वास्तव में मादा हाथी अपने बच्चों को लेकर बहुत पजेसिव होती है और उसे अगर लगता है कि कोई उनको नुक्सान पहुंचा सकता है तो वह तुरंत उसपर आक्रमण कर देती है. खैर हम लोग सकुशल आगे बढ़ गए और फिर भविष्य में कभी भी हाथी के बच्चों के आस पास भी नहीं जाने का निश्चय कर लिया.   

वहां से आगे बढ़ने पर थोड़ी थोड़ी दूर पर कभी हिरणों के झुण्ड तो कभी जिराफ तो कभी जेब्रा के झुण्ड मिलते रहे और हम लोग उनको निहारते, उनकी तस्वीरें खींचते आगे बढ़ते रहे. एकाध जगह जंगली सूअर भी दिखाई दिए और कहीं कहीं सांभर इत्यादि भी दिखे. एकाध घंटे बाद एक जगह हमारी नजर सड़क के किनारे मजे में घूमते छोटे से कछुए पर पड़ी जो स्टार कछुए जैसा था. वह देखने में इतना सुंदर लग रहा था कि हमारी गाड़ी अपने आप ही वहां रुक गयी. हम लोगों ने उसे प्यार से उठाया, कुछ मिनट तक हम सब उसे देखते रहे, फिर उसके फोटो कई ऐंगल से खींची गयी और उसके बाद उसे वहीं छोड़कर हम सब आगे बढ़ गए. कुछ आगे जाने पर हमें एक जगह चीता के भी दर्शन हुए जो पेड़ पर मजे में आराम फरमा रहे थे. क्रूगर पार्क के अंदर हर 40 से 50 किमी पर कोई न कोई पेट्रोल पंप और पिकनिक का स्थान रहता है और आप बिना पेट्रोल के खत्म होने की चिंता किये आराम से घूम सकते हैं. हम लोग भी कुछ घंटे घूमने के बाद के बाद एक पिकनिक वाली जगह पर रुके, थोड़ा नाश्ता किया और पेट्रोल भरकर आगे बढ़ गए.  

एकाध घंटे और घूमने के बाद हम लोग उस क्षेत्र में पहुँच गए थे जहाँ अमूमन शेर पाए जाते हैं. पिछली यात्रा में हम उन्हें नहीं देख पाए थे इसलिए इस बार मन ही मन ठान के आये थे कि हर हाल में उनको देखकर ही जाना है. अचानक दूर सामने ढेर सारी गाड़ियां खड़ी दिखाई पड़ी तो लगा जैसे हो न हो आज तो शेर के दर्शन हो ही गए. जब हम पास पहुंचे तो लोगों ने बता दिया कि सड़क के साथ साथ बहती बरसाती नदी के तलछट में कई शेर आराम फरमा रहे हैं और यह भीड़ उनको ही देखने के लिए खड़ी है. सड़क के किनारे भी पेड़ थे और नीचे नदी के ढलान पर भी पेड़ थे तो दूर से वनराज के दर्शन संभव नहीं थे. अब इन्तजार करने के सिवाय और कोई रास्ता भी नहीं था कि लोग वहां से हटें तो हम लोग शेरों को नजदीक से देखें. आधे घंटे में सारी गाड़ियां वहां से चली गयीं और सिर्फ हम लोग ही बचे तो हमने अपनी कार सड़क से नीचे उतार ली और शेरों को देखने लगे. लगभग 10 शेर रहे होंगे जो आराम से लेटे हुए थे और बिलकुल भी हिल डुल नहीं रहे थे. अब कोई और पास था नहीं तो हमारे मन में आया कि शेर तो आराम फरमा रहे हैं इसलिए हम लोग गाड़ी से उतर कर उनको पास से देखते हैं और कुछ फोटो भी खींच लेते हैं. हमें सपने में भी यह गुमान नहीं था कि हम अपनी जिंदगी की शायद सबसे बड़ी भूल करने जा रहे हैं और आगे आने वाले तमाम वर्षों में अपनी इस भूल को याद करके हम लोग सिहरते रहेंगे.  

 हमारी कार सड़क के नीचे कच्ची जगह पर खड़ी थी और वहां से नदी का किनारा बिलकुल सटा हुआ था. मतलब कि हम तीन चार कदम चलकर नदी के कगार पर पहुँच सकते थे और शेरों को नीचे साफ़ साफ़ देख सकते थे. लेकिन जैसे ही हम दोनों कार से उतरकर बमुश्किल दो कदम आगे बढ़े होंगे, तभी हमें नदी के तलहटी में हलचल नजर आयी. तीन चार शेर जो शायद मानव से बिलकुल भी नजदीकी पसंद नहीं करते थे, वे उठकर खड़े हुए और पलट कर भाग गए. तीन चार शेर हमारी तरफ मुंह करके खड़े हो गए और शायद अंदाज लगाने लगे कि अगर हम लोग उनके पास जाते हैं तो उनको क्या करना चाहिए. बचे हुए एक दो शेर भी वापसी के लिए तैयार हो गए थे. इन सब में शायद दस सेकेण्ड ही लगा होगा और हमें यह एहसास हो गया कि हमने एक बहुत बड़ी भूल कर दी है. वैसे तो ऐसे मौकों पर दिमाग काम करना बंद कर देता है लेकिन उस वक़्त दिमाग ने काम किया और हम बिजली की फुर्ती से वापस अपने कार की तरफ मुड़े और फटाफट अंदर जाकर दरवाजा बंद कर लिया. हमारे दिल बुरी तरह धड़क रहे थे और हम अगले दस मिनट तक यही सोचते रहे कि अगर शेरों ने हमारी तरफ छलांग लगायी होती तो क्या होता. वो शेर बस इतनी दूरी पर थे कि वे दो तीन छलांग में हमारे पास आ सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं सोचा और हम सही सलामत अपनी कार में बैठे थे. उसके बाद अगले कई घंटे, जब तक हम क्रूगर पार्क में विचरण कर रहे थे, हम अपने दिमाग से इस घटना को निकाल ही नहीं पाए. आगे हमें एक जगह अफ्रीकन गैंडा भी दिखाई दिया, फिर से जिराफ और अन्य जंगली जानवर भी दिखे लेकिन शायद वह आनंद नहीं आया जो ऐसे में आना चाहिए था. लेकिन एक बात जरूर हुई कि इस बार हमने अफ्रीका के बिग फाइव जानवरों के दर्शन कर लिए, जिनके लिए अफ्रीका जाना जाता है और जिनको देखे बिना आपकी जंगल यात्रा पूरी नहीं मानी जाती है.  

शाम छह बजे से पहले हमें फाबेनी गेट पहुंचना था जहाँ से हमें आगे ग्रासकोप जाना था और फिर आगे की यात्रा अगले दिन प्रारम्भ होनी थी. हम लोग लगभग छह बजे फाबेनी गेट पहुँच गए और फिर वहां से डूबता सूरज को निहारते हुए ग्रासकोप के लिए निकल पड़े. जिंदगी में कुछ यात्रायें ऐसे ऐसे अनुभव दे कर जाती हैं जिन्हें अमूमन हम लेना नहीं चाहते. लेकिन दो दिन की यह यात्रा जिसमें बहुत रोमांचक और खतरनाक अनुभव हुए थे, वह आज भी दिमाग पर काबिज है और हम चाह कर भी उसे भूल नहीं सकते. 

Tuesday, October 26, 2021

सैलाना की यात्रा--यात्रा संस्मरण

 वैसे तो मध्य प्रदेश में बहुत से दर्शनीय स्थल हैं और ऐसे भी हैं जो बहुत प्रसिद्द हैं. उदहारण के तौर पर हम अगर सबसे मशहूर जगह की बात करें जहाँ सबसे ज्यादा विदेशी सैलानी भी आते हैं तो "खजुराहो" इसमें निर्विवाद रूप से सबसे आगे होगा. प्रदेश की राजधानी भोपाल के आस पास भी एक से बढ़कर एक दर्शनीय स्थल हैं जिनमें एक तरफ प्राचीन भोज मंदिर है तो दूसरी तरह "भीम बैठका" है जहाँ महाभारत कालीन गुफाएं हैं और बड़े बड़े पत्थरों पर प्राचीन कालीन भित्तिचित्र बने हुए हैं. खैर इस प्रदेश में जहाँ भी जाईये, कुछ न कुछ दर्शनीय नजर ही आ जाता है लेकिन मशहूर जगहों के साथ एक बड़ी दिक्कत यह भी है कि वहां जाने पर भीड़ भाड़ का सामना करना पड़ जाता है. कोविड के पहले तो भीड़ भाड़ से कोई परेशानी नहीं थी और चाहे कितनी भी भीड़ हो, लोग मजे में घूमते फिरते थे. लेकिन कोविड संकट के बाद सबसे बड़ा दर भीड़ को देखकर ही लगने लगा है और सभी लोग ऐसी जगहों से बचना चाह रहे हैं जहाँ जाने पर ज्यादा भीड़ का सामना करना पड़े.

अब ऐसे में एक चीज लोगों को खूब भा रही है और वह है ऐसी जगहों पर घूमना जहाँ भीड़ भाड़ नहीं हो. कम से कम कोविड की चिंता तो नहीं रहेगी और घूमने फिरने का कोटा भी पूरा हो जाएगा जो पिछले लगभग डेढ़ सालों से बचा हुआ है. ऐसी ही जगह की तलाश में हमें याद आया रतलाम से लगभग 25 किमी दूर एक शांत लेकिन बेहद रमणीय जगह "सैलाना" जहाँ जाना तो हर सैलानी को चाहिए लेकिन बहुत कम लोग ही जाना पसंद करते हैं. दरअसल वहां न तो कोई ऐसा प्रसिद्द मंदिर है जहाँ भक्तों का सैलाब उमड़े और न ही कोई ऐसा हिल स्टेशन या प्राकृतिक पर्यटन स्थल जो बहुत मशहूर हो. इस जगह के बारे में वैसे तो मुझे पिछले दो साल से पता था और मैं पिछले साल एक बार दो तीन घंटे के लिए वहां गया भी था लेकिन इसे पूरी तरह देखने का लोभ मन में बना हुआ था. खैर इस बार दो अक्टूबर को गाँधी और शास्त्री जयंती के कार्यक्रम के बाद रविवार पड़ा और फिर से इस रमणीक लेकिन बहुत कम मशहूर जगह जाने की इच्छा बलवती हो गयी. एक बार वहां मौजूद दोस्त से फोन पर बात हुई और जब उसने बताया कि वह भी सैलाना में ही मौजूद है तो फटाफट वहां जाने का कार्यक्रम बन गया. 

सुबह साढ़े आठ बजे उज्जैन से निकलने का कार्यक्रम बनाया गया था जो लगभग नियत समय पर ही प्रारम्भ हो गया. पहले तो यात्रा में हम तीन ही हुआ करते थे लेकिन पिछले आठ महीने से हमारा कुत्ता 'सोबो" भी हर सफर का हिस्सा बन गया है. दो घंटे के सफर के पश्चात हम जब रतलाम पहुँचने ही वाले थे तो इच्छा हुई कि चाय पीकर फिर आगे बढ़ा जाए. अब एक बार चाय की तालाब लग गयी तो फिर बिना उसे पिए आगे बढ़ना थोड़ा मुश्किल हो जाता है. रास्ते में एक अच्छा सा होटल दिखा जहाँ रुक कर हमने पूछा कि क्या चाय मिलेगी तो रिसेप्शन पर बैठे कर्मचारी ने हाँ में सर हिलाया और रेस्टॉरेंट में न जाकर वहीं चाय पीने के लिए कहने लगा. हमारे लिए तो ठीक ही था, वहीं पर रखे बढ़िया सोफे पर बैठकर हम चाय का इन्तजार करते हुए आगे की यात्रा के बारे में बात करने लगे. थोड़ी देर में चाय आ गयी और चाय के साथ चीनी का पाउच भी प्लेट में रखा था. अब अगर अलग से चीनी का पाउच रखा हो तो हम यही सोचते हैं कि चाय बिना शक्कर की होगी. इस लिहाज से हमने एक पाउच फाड़ा और उसे चाय के कप में डाल दिया. इसी दरम्यान बेटी ने चाय का घूंट बिना शक्कर डाले लिया तो उसे चाय काफी मीठी लगी. उसने तुरंत मुझे टोका लेकिन तब तक मैं शक्कर चाय में डाल चुका था. अब मैंने भी चाय का घूंट लिया तो काफी मीठी चाय थी, बस गनीमत यही थी कि जो शक्कर मैंने डाली थी उसे कप में मिलाया नहीं था. अब मुझसे रहा नहीं गया और मैंने रिसेप्शन वाले से पूछ ही लिया कि अगर चाय पहले से ही मीठी थी तो अलग से पाउच क्यों दिया. और अगर अलग से दे भी दिया तो कम से कम बताना तो था कि चाय मीठी है, आप की इच्छा हो तो आप और शक्कर डाल सकते हैं. अब वह बेचारा क्या कहता, उसने रेस्टॉरेंट में फोन करके पूछा और बाद में झेंपते हुए बोला कि मैं आपके लिए दूसरी चाय बनवा देता हूँ. हमने भी हँसते हुए कहा कि कोई जरुरत नहीं है, चलो इसी बहाने कम से कम बढ़िया मीठी चाय तो पीने को मिली. 

इसके बाद हम लोग अगले 45 मिनट में सैलाना पहुँच गए और फिर एक जगह नाश्ता करने के बाद हमारा सैलाना भ्रमण प्रारम्भ हो गया. दरअसल सैलाना शहरी भीड़भाड़ से दूर एक आदिवासी क्षेत्र है जहाँ प्रकृति अपने बेहद खूबसूरत और सौम्य रूप से मौजूद है. चारो तरफ न तो कोई शोरगुल और न ही कोई प्रदूषण, बस हरियाली, पहाड़, झरने, मंदिर और छोटी छोटी नदियां जो बरसात के मौसम में कलकल करती बहती रहती हैं और बाकी मौसम में सूख जाती हैं. सबसे पहले सैलाना के मशहूर "कैक्टस गार्डन" में जाना था लेकिन रास्ते में ही बाजार के मध्य में हमें रुकना पड़ गया. उस समय एक जुलूस निकल रहा था जो आसाराम बापू के लिए था. बाद में मुझे पता चला कि यहाँ पर आसाराम के बहुत से शिष्य हैं और उनके आश्रम में सैकड़ों बीघा जमीं इत्यादि भी है. खैर लोग आज भी आसाराम को गुनहगार मानने के लिए तैयार नहीं हैं, यह भी एक आश्चर्य का विषय है. 

सैलाना पैलेस का कैक्टस गार्डन, जो न सिर्फ मध्य प्रदेश का सबसे बेहतरीन गार्डन है (एक समय में यह एशिया का सबसे अच्छा कैक्टस गार्डन माना जाता था), बल्कि हिन्दुस्तान का सबसे पुराना भी है  यह सैलाना महल के पीछे के हिस्से में मौजूद है जिसकी एक बार फिर से देखभाल की जा रही है ताकि ज्यादा से ज्यादा संख्या में लोग यहाँ देखने के लिए आएं. वैसे महल का एक हिस्सा भी अब होटल के रूप में तब्दील किया जा रहा है जिससे कि रतलाम में रुकने वाले लोग भी सैलाना के महल में ही रुकें और पुराने वैभव को महसूस कर सकें. गार्डन में लगभग 45 मिनट बिताने के बाद हम लोग वहां से निकले और सबसे पहले "अडवानीय केदारेश्वर" मंदिर गए जो जमीं से लगभग 100 मीटर अंदर स्थित है. मंदिर के पास जाते समय ही एक झरने की आवाज आने लगी और जैसे ही हम नीचे पहुंचे, एक खूबसूरत झरना मंदिर के सामने स्थित तालाब में गिर रहा था. मौसम भी अब काफी सुहावना हो गया था और बादलों के चलते धूप का नामोनिशान नहीं था. मंदिर पर लगभग 25 लोग ही मौजूद थे और इस लिहाज से उसे भीड़ नहीं कहा जा सकता था. बस माहौल ऐसा था कि वहां से हिलने का मन नहीं कर रहा था, झरना, पहाड़, मंदिर के घंटे की आवाज और आँखों को सुकून देती हरियाली. लेकिन अभी सैलाना को पूरा देखना था और लगभग 12 बज रहे थे तो वहां से मन मारकर निकलना ही पड़ा. इसबीच वहां खूब सारे फोटो खींचे गए और वहां की यादों को मन में सजोंकर हम आगे बढ़े. अब आगे सैलाना के आस पास के पहाड़, जंगल और हरियाली को देखना था और किसी रमणीक स्थल पर भोजन करने का लुत्फ़ भी उठाना था. हम लोग केदारेश्वर से भेरूघाटा की तरफ बढ़े जहाँ एक घाटी जैसी जगह से नीचे का पूरा क्षेत्र एक हरे भरे कैनवास की तरह दिखाई पड़ रहा था. चारो तरफ हरियाली, पहाड़, बीच में पानी से लबालब एक डैम ऐसे दिख रहा था जैसे किसी चित्रकार ने अपनी कूंची से एक बेहतरीन चित्र बनाया हो. हम लोग काफी देर ताका वहां खड़े होकर इस बेहतरीन और बिलकुल शांत खूबसूरती को निहारते रहे. लगभग आधे घंटे खड़े रहने के दरम्यान न तो कोई गाड़ी वहां से गुजरी और न ही कोई शोर शराबा, अगर कुछ था तो हवा की सरसराहट, पक्षियों की आवाज और वहीं पास के एक आदिवासी के झोपड़े के पास खेलते हुए कुछ बच्चों की कुतूहल भरी आवाज. बच्चे भी कौतुहल से हमें देख रहे थे और शायद आपस में एक दूसरे से पूछ भी रहे थे कि यहाँ हमारी शांति को भांग करने ये कौन से लोग आ गए हैं. बहरहाल हम लोग वहां से आगे बढ़े और थोड़ी दूर जाने पर एक और आदिवासी गांव पड़ा. लगभग सभी घर कच्चे थे, बीच बीच में कुछ ईंट के बिना पलस्तर के मकान भी बने दिखाई दिए और पूछने पर पता चला कि ये मकान राज्य सरकार के द्वारा चलाये गए एक योजना के तहत बैंकों से ऋण देकर बनवाये गए हैं. उन मकानों को देखकर सहज ही अंदाजा लग जाता है कि किसी भी राज्य सरकार या केंद्र सरकार की योजना का क्या हश्र होता है. भ्रष्टाचारी बाबुओं के चलते शायद ही कोई योजना उस तरह से लागू हो पाती है जिसकी कल्पना उसकी योजना बनाते समय की जाती है. यकबयक ही अपने भूतपूर्ण प्रधानमंत्री स्व श्री राजीव गाँधी का एक बहुचर्चित कथन याद आ गया जो इसी सिलसिले में कहा गया था. उसी समय एक टेम्पो ने ध्यान भंग किया और जब साथ वाले व्यक्ति ने उस पर बैठे लोगों की संख्या की तरफ ध्यान दिलाया तो ऑंखें खुली की खुली रह गयी. जितने लोग टेम्पो के अंदर बैठे थे, उससे ज्यादा टेम्पो के ऊपर बैठे थे और मैंने आजतक एक टेम्पो में इतने ज्यादा व्यक्ति बैठे हो सकने की कल्पना भी नहीं की थी, देखना तो दूर की बात है. अंदाजन लगभग 30 लोग तो रहे ही होंगे उस टेम्पो में और जितने भी बैठे थे, सब ख़ुशी ख़ुशी जा रहे थे, किसी को भी इस तरह से सफर करने का कोई अफ़सोस नहीं था. साथ चल रहे मित्र ने बताया कि यह क्षेत्र राजस्थान का बॉर्डर है और यहाँ पर चाहे टेम्पो हो या जीप हो, सभी पर ऐसे ही लोग सफर करते हैं. बाद में हमें ऐसी तमाम जीपें जाती दिखाई पड़ीं जिसमें जितने लोग नीचे बैठे थे, कमोबेश उतने ही लोग ऊपर भी बैठे थे. एक दो किस्से भी याद आ गए, पहला किस्सा तो बिहार का था जहाँ हमने बस पर सबसे पहले लोगों को ऊपर ही बैठते देखा था. मतलब जैसे ही वहां बस रूकती थी, लोग सबसे पहले ऊपर छत पर जाकर बैठते थे, बाद वाले बस के अंदर बैठते थे. वह दृश्य भी हमारे लिए बिलकुल गुरुत्वाकर्षण बल के विपरीत जैसा ही था क्योंकि मैं जहाँ से हूँ, वहां लोग अव्वल तो बस के छत पर यात्रा करते ही नहीं हैं और अगर करते भी हैं तो पहले लोग बस के अंदर घुसते हैं और जगह नहीं होने की स्थिति में ही बस की छत का रुख करते हैं. दूसरा किस्सा हमारे नौकरी के दरम्यान का ही याद आया जब बनारस में हमारे एस्टीम कार में लगभग 12 बच्चे बैठकर एक हॉस्टल गए थे और जब वहां एक एक करके बच्चे बाहर निकलने लगे तो लोगों का हँसते हँसते बुरा हाल हो गया था. इस हैरतअंगेज नज़ारे को देखकर हम लोग उसी सड़क पर आगे बढ़े और हमारी मंजिल पर बोरखेड़ा तथा सकरवाड़ा था. बोरखेड़ा से आगे बढ़ते ही सड़क के दोनों तरफ ऊँचे ऊँचे पहाड़ नजर आये जिसपर मंदिर बने हुए थे. अब सोचा गया कि इन्हीं पहाड़ों में से किसी एक पर चढ़ा जाए और जाने के रास्ते की जानकारी के लिए वहीं सड़क के किनारे स्थित एक किसान के घर के सामने हम लोग रुके. पुरानी किताबों में वर्णित किसी भी आम किसान का घर जैसा होता है बिलकुल वैसा ही घर था उस किसान का. घर के सामने कुछ मुर्गे मुर्गियां टहल रही थी, एक तरफ कुछ बकरियां भी घास चार रही थीं और दो भैंस तथा कुछ गायें भी घर के सामने बंधी हुई थीं. चारो तरफ खेत और हरियाली तथा उसके बीच अपने घर में सर पर पगड़ी बांधे मौजूद वह किसान. उसने बड़े प्यार से एक पहाड़ी पर जाने का रास्ता समझाया और इसी बीच मैंने उससे उसके बैंकिंग के बारे में भी पूछ लिया. खैर इस बातचीत में जो बात मुझे पता चली उसने मन को गुस्से और दर्द से भर दिया जो बहुत देर तक मुझे सालता रहा. दरअसल उसने बताया कि उसका ऋण खाता सैलाना में ही स्थित किसी और बैंक में है और जिस एजेंट ने उसे ऋण दिलवाया था, उसने एक बड़ी रकम रिश्वत के तौर पर हड़प ली थी. उस किसान की स्थिति को देखने के बाद मुझे लगा कि जिसने भी ऐसे व्यक्ति से रिश्वत लिया होगा, वह निश्चित रूप से इंसान तो नहीं ही होगा, अलबता उसे भेड़िया जरूर कहा जा सकता है. खैर मैंने अपने मित्र को कहा कि वह उसकी बैंकिंग सम्बन्धी जो भी मदद हो सकती है, वह जरूर करे और हम मन में एक तीस लेकर आगे बढ़ गए.

थोड़ी दूर पर ही पहाड़ी थी और उसके बगल से ऊपर जाने के लिए एक कच्चा रास्ता था. उस रास्ते पर जीप ही जा सकती थी और हमारे मित्र की एस यू वी भी बड़े आराम से ऊपर चली गयी. हम लोग तो पैदल ही आनंद लेते हुए ऊपर पहाड़ी पर पहुंचे जहाँ से एक बार फिर चारो तरफ का दृश्य इतना खूबसूरत था मानों हम सब चम्बा में आ गए हों. थोड़ी देर बाद ही नजर पड़ी मंदिर के आसपास बकरी और गाय भैंस चराते बच्चों पर जो मजे में वहां खेल रहे थे और उनके जानवर अपने हिसाब से हरी घांस का सेवन कर रहे थे. पहाड़ी के ऊपर से चारो तरफ घूम घूमकर हमने सैलाना की हरियाली को निहारा और फिर यह निश्चित हुआ कि भोजन भी वहीं उस शानदार वातावरण में किया जाए. ऊपर एक हैंडपम्प भी लगा हुआ था जिसे चलने पर ठंडा जल निकला जो पीने में बहुत बढ़िया था. अभी हम लोग साथ लायी दरी को बिछाने ही जा रहे थे कि मौसम ने एकदम से करवट लिया और बूंदाबांदी होने लगी. दूर दूसरी पहाड़ी के पीछे काले काले बादल दिखाई पड़ रहे थे जिससे यह स्पस्ट था कि उस तरफ बरसात हो रही थी और यहाँ भी किसी भी वक़्त मूसलाधार बरसात हो सकती है. अब हम लोग थोड़ा उदास हो गए कि शायद इस पहाड़ी पर भोजन करने का सूख नहीं मिल पायेगा. लेकिन चंद मिनटों में ही बूंदाबांदी कम हो गयी और वहीं पर मौजूद एक पेड़ के नीचे हम लोगों ने चटाई बिछायी और फटाफट भोजन के लिए बैठ गए. भोजन में ठेठ राजस्थानी स्वाद था, दाल बाफले के साथ कढ़ी थी और प्याज तथा मिर्ची के भजिये थे. अमूमन राजस्थान के नजदीक के इलाके में यह भोजन किया जाता है लेकिन ये लोग मिर्ची और मीठा बहुत ज्यादा इस्तेमाल करते हैं. जैसे ही हमने दाल को चखा, खांसी आने लगी और आंख तथा नाक से पानी गिरने लगा, दाल बहुत ज्यादा तीखी थी और बड़ी मिर्च के भजिये मानों और डरा रहे थे. खैर कढ़ी ने थोड़ी राहत दी और हम लोग बमुश्किल एक बाफले दाल और कढ़ी के साथ खा पाए. बस भजिये खूब सारा खाया गया क्योंकि मिर्च के साथ साथ सादे भजिये भी थे और उनको खाने में बहुत आनंद आया. अक्सर ऐसे समय में जो होता है, वही हुआ और ढेर सारा भोजन बच गया. फिर हम लोगों ने वहां खेल रहे बच्चों को आवाज देकर बुलाया और उनको भोजन दे दिया कि वह जहाँ चाहें इसे खा लें. बच्चों ने भोजन लिया और उसे लेकर दूसरी तरफ निकल गए जहाँ उन्होंने तसल्ली से बैठकर खाया होगा. इस बीच बकरियों को देखकर सोबो भौंक रहा था जिसके चलते कुछ कुत्ते भी वहां पहुँच गए लेकिन किसी ने भी सोबो को डराने का प्रयास नहीं किया. भोजन करने के बाद तथा सारा कूड़ा एक बड़े से बैग में भरकर हमने गाड़ी में डाल लिया और उस पहाड़ी पर कम से कम २०-२५ पेड़ अपनी तरफ से लगाने का प्राण लेकर हम लोग नीचे उतरे. नीचे सड़क के पास एक झोपडी थी जहाँ आते समय कोई मौजूद नहीं था लेकिन इस समय एक बुजुर्ग किसान बढ़िया पगड़ी बांधे बैठा हुआ था और कुछ दूर पर उसकी बकरियां चर रही थीं. मैंने अपनी आदत के मुताबिक उस किसान से बात करने की सोची और मुझे लगा कि इस झोपडी में रहनेवाला और अपनी बकरियां चराने वाला किसान कोई छोटा मोटा किसान होगा. जब मैं उसके पास पहुंचा तब वह जमीन पर बैठकर बीड़ी पी रहा था. मैंने जब उनसे पूछा कि क्या मैं आप से बातचीत कर सकता हूँ तो वह हड़बड़ा कर अपनी बीड़ी फेंकने के लिए उद्यत हुआ. मैंने कहा कि आप तसल्ली से बीड़ी पी लो फिर बात करते हैं तो उसने बीड़ी के दो कस खींचे और बात करने लगा. मैंने उससे उसकी बकरियों के बारे में पूछा तो उसने बताया कि पहले एक बकरी थी और धीरे धीरे काफी हो गयी. फिर उसने बताया कि कई बकरों और बकरियों को वह अच्छे दामों में बेच भी चूका है. मैंने जब पूछा कि बरसात में आपकी झोपड़ी तो टपकती होगी तो उसने हंसकर इंकार कर दिया. थोड़ी देर की बातचीत के बाद ही मेरा भ्रम चकनाचूर हो गया जब उसने बताया कि उसके पास काफी खेत है और उसकी पिकअप वैन भी चलती है. अब मैंने पूछ ही लिया कि अगर इतना कुछ है तो आप इस टूटी सी झोपडी में क्यों रहते हो तो उसने बताया कि यह झोपडी तो बस यहाँ आकर लेटने के लिए है. उसका घर सड़क के उस पार थोड़ी दूर पर था जो उसने दिखाया. उसके बाद मैंने झोपड़ी के अंदर जाकर देखा, एक खटिया पड़ी हुई थी जो उसके लेटने के लिए थी. आखिर में जब मैंने उससे पूछा कि वह किस बैंक से अपनी बैंकिंग करता है तो उसने हमारे बैंक का ही नाम लिया और हमारे साथ मौजूद एक स्टाफ को पहचान भी लिया. फिर उस स्टाफ ने भी बताया कि यह दादा बैंक आते रहते हैं और इनका हमारे यहाँ ठीकठाक खाता है. उन्होंने फसल ऋण तथा गाड़ी का ऋण भी हमारी बैंक से ही लिया था और यह बात मेरे लिए काफी सुकून पहुंचाने वाली थी. फिर हम लोग वहां से निकले और अपनी अपनी गाडी लेकर मुख्य मार्ग पर आ गए जहाँ से हमारी मंजिल आगे आने वाला गांव था. 

एक बार फिर हम लोग हरे भरे रास्तों और पहाड़ों के बीच से निकलते हुए आगे बढे, थोड़ी दूर आगे जाने पर एक घाटी जैसा नजारा था जहाँ से नीचे एक बड़ा सा तालाब जिसपर बांध बना हुआ था, नजर आया. दूर पहाड़ भी दिखाई दे रहे थे और एक तरफ जंगल भी था. लोगों ने बताया कि एक समय था जब प्रदेश के मुख्यमंत्री इसी जगह पर रात बिताने आते थे और ग्रामीणों से उनके दुःख दर्द भी सुनते थे. अब खैर दुःख दर्द तो क्या ही सुनते रहे होंगे लेकिन इसी बहाने इस जिले के अधिकारियों के लिए एक हफ्ते का हाड़तोड़ परिश्रम जरूर हो जाता रहा होगा. एक बार इच्छा हुई कि किसी तरह वहां से नीचे उतरा जाए और उस डैम को पास से देखा जाए लेकिन फिर लगा कि वहां तक पहुंचना मुश्किल होगा. दरअसल बरसात के चलते रास्ता बहुत अच्छा नहीं रह गया था और कुछ किमी शायद पैदल भी चलना पड़ता. हमारे साथ के एक व्यक्ति ने किसी परिचित को फोन लगाने का प्रयास किया जिससे कि उस डैम तक जाने में मदद मिले लेकिन उनके फोन में नेटवर्क गयाब था. फिर मैंने अपने फोन से काल किया तो फोन लग गया लेकिन फोन उनके बच्चे ने उठाया और बताया कि उसके पिताजी कहीं गए हैं और फोन उसके पास है. खैर इस कोविड काल में पढ़ाई के लिए ये स्मार्ट फोन ही काम आये और बहुत से लोगों ने अपने फोन बच्चों को दे दिए जिससे कि वह पढ़ाई जारी रख सकें. बहरहाल वहां जाने का इरादा त्यागकर हम लोग आगे बढे और आगे जाकर एक जगह हमारी गाड़ी रुक गयी. सामने एक जगह थी जहाँ सड़क के ऊपर से पानी बाह रहा था और वहां कोई छोटी सी पुलिया भी थी. अब हमें तो अंदाजा नहीं लग रहा था कि वास्तव में सड़क पर कितना पानी है और हम सोच ही रहे थे कि इतने में सामने से एक चरवाहा अपने गाय भैंस के साथ उस पानी भरे पुल को पार करते हुए हमारी तरफ आने लगा. इसी बीच में एक मोटरसाइकिल सवार भी उस पानी भरे सड़क से गुजर गया तो हमें तसल्ली हुई कि हम सब भी निकल सकते हैं. आगे कई गांवों से गुजरते हुए हम एक ऐसे इलाके में पहुंचे जहाँ सड़क के किनारे बहती हुई नदी बहुत छिछली थी और वहां आसानी से पानी में उतरा जा सकता था. वहां पर हम लोगों ने अपनी गाड़ियां रोकीं और फिर धीरे धीरे पानी में उतर गए. पानी में जो पत्थर थे उसपर फिसलन काफी थी और हम लोग कई बार फिसलने से बचे भी. लेकिन फिर हमने उसे पार किया और उस तरफ जाकर कुछ समय बिताया. इस बीच वहां कुछ बच्चे भी आ गए थे और वे हमें कुतूहल से देख रहे थे मानों हम किसी और गृह के प्राणी हों. वैसे उनका कौतुहल जायज ही था क्योंकि उनके लिए तो हम लोग सचमुच किसी अन्य लोक के ही निवासी थे जिनके पास सभी भौतिक सुख सुविधाएँ उपलब्ध थीं.

लेकिन जो चीज उनके पास थी, हम उसी की तलाश में उस क्षेत्र में भटक रहे थे और वह चीज थी "सुकून, शांति, प्रकृति का सानिध्य और स्वच्छ हवा". खैर चलते समय हमने उन बच्चों को बिस्किट का पैकेट पकड़ाया जिससे हम यह महसूस कर सकें कि हमने उनको थोड़ा तो दिया. उसी दरम्यान वहां पर एक ग्रामीण कुछ पूजन की सामग्री ले आया था और पूछने पर उसने बताया कि यहीं सड़क पर वह पूर्वजों के लिए पूजा पाठ करेगा. 

वहां से जब हम आगे बढे तो जंगल शुरू हो गया था और साथ चल रहे लोगों ने बताया कि यहाँ पर जानवर भी मिलते हैं. खैर वहां ग्रामीणों के घर पर बहुत से मवेशी थे और कभी कभी एकाध बकरी इत्यादि जानवर उठा ले जाते थे. लेकिन ऐसा बहुत कम ही होता था, दरअसल जानवर भी सबसे ज्यादा हम इंसानों से ही डरते हैं और यथासंभव हमसे दूर ही रहने में अपनी भलाई समझते हैं. इसी बीच हमारे मित्र ने एक दिलचस्प लेकिन खतरनाक किस्सा सुनाया, खतरनाक उनके लिए था लेकिन हमें सुनने में बहुत दिलचस्प लगा. एक बार वह अपने एक साथी के साथ, ऐसे ही किसी गांव में जो जंगल के आसपास था, गया जहाँ पर किसान से मिलने के लिए उसके खेत पर जाना पड़ा. वहां उसने ध्यान दिया कि खेत के बीचोबीच एक गड्ढा जैसा इलाका है जहाँ सोयाबीन नहीं लगी है. उसे कौतुहल हुआ तो उसने उस किसान से पूछ लिया. जवाब में किसान ने जो बताया उसे सुनकर उसके होश उड़ गए "क्या बताएं साहब, यहाँ पर कुछ दिन पहले दो शेर लड़े थे जिसके चलते वहां की फसल नष्ट हो गयी" और उसने उस जगह को वैसे ही खाली छोड़ दिया. अब हमारे मित्र की हालत खराब हो गयी कि कहीं वे शेर दुबारा जोर आजमाईस करने इसी जगह आ गए तो क्या होगा. और उन्होंने किसान को सलाम किया और तुरंत नौ दो ग्यारह हो गए. अब ऐसे में हम भी रहे होते तो उस गांव की तरफ अगले एक साल भी अपना रुख नहीं करते.

पीछे दो घंटे में हम जहाँ भी थे वहां पर फोन का नेटवर्क भी नहीं था इसलिए बाहरी समाज से हमारा संपर्क बंद था. जैसे हम लोग थोड़ा बाहर आये, फोन के मैसेज टन ने बता दिया कि हमारी शांति भंग होने का समय वापस शुरू हो गया है. अब ऐसे इलाकों में जहाँ फोन का नेटवर्क भी नहीं आता हो, वहां बैंकिंग सेवा भी देना एक दुरूह कार्य है. इसलिए इन गांव के लोगों को नदी और पहाड़ पार करके मीलों दूर बैंक या अन्य सरकारी कार्यालय आना पड़ता है. इसका एक दूसरा पहलू भी है कि इन गांवों के ऐसे लोग जिनको सरकार द्वारा छोटी मोटी पेंशन जैसे वृद्धावस्था पेंशन इत्यादि लेने के बहाने ही गांव से निकल कर शहर या कस्बे में आते हैं और वापस जाते समय घर के बच्चों के लिए कुछ मिठाई या खिलौने ले जाते हैं. तभी हमारे एक साथी के फोन पर कोई काल आया और वह एक जगह के बारे में बात करने लगा जहाँ पर उस फोन करने वाले से मुलाकात हो सके. थोड़ी देर में हम कुछ अन्य गांवों को पार करते हुए एक और पुलिया के पास पहुंचे जहाँ एक सज्जन मोटरसाइकिल से हमारा इन्तजार कर रहे थे. उनके पास लौकी जैसी कोई सब्जी थी जिसके बारे में हमें बाद में पता चला कि इसे "बालम खीरा" कहते हैं. कोई भी व्यक्ति उसे पहले नजर में लौकी ही समझेगा क्योंकि वह लौकी जितना बड़ा होता है और उसका रंग भी बिलकुल वैसा ही होता है. इस सीजन में ही यह एक गांव "बालम" में खूब पैदा होता है और वहां से व्यापारी इसे थोक भाव में खरीदकर महानगर भेज देते हैं. वैसे हमारे लिए इस खीरे को देखने का यह पहला ही अवसर था, पढ़ा तो मैंने इसके बारे में पहले भी था. 

अब हम सर्वं गांव से होते हुए अपनी आखिरी जगह की तरफ बढ़ चले जो "कोटड़ा केदारेश्वर" था. शाम होने लगी थी और वापस उज्जैन भी आना था इसलिए हम लोग जल्दी जल्दी वहां पहुंचे. यह भी एक मंदिर है जो पहाड़ी के बीच में जमीं से लगभग 500 मीटर नीचे स्थित है और इस मंदिर के सामने भी एक झरना अपनी पूरी खूबसूरती से गिर रहा था. नीचे एक गुफा थी और उसी में मंदिर था तथा मंदिर के दूसरी तरफ एक और झरना गिर रहा था. मंदिर के अंदर से गिरते हुए झरने के संगीत को महसूस करना बहुत अद्भुत अनुभव था और हम लोग काफी देर तक वहीँ खड़े रहे. इसी बीच ढेर सारी तस्वीरें भी ली गयीं और हम लोगों ने खूब आनंद उठाया. हम लोग जब वापस मंदिर से निकलकर ऊपर आये तो एक साथी ने कहा कि हम लोग दूर बाह रहे उस दूसरे झरने तक जा सकते हैं. अब ऐसा अवसर मिले तो भला हम उसे कैसे जाने देते इसलिए हम लोग तुरंत उस दूसरे झरने को नजदीक से देखने के लिए निकल गए. चारो तरफ पहाड़, बीच में खेत और झरने के जल द्वारा बानी हुई एक संकरी नदी, कुल मिलाकर एक अविष्मरणीय दृश्य था और नखें इसे देखकर भरती नहीं थीं. यही सब निहारते हुए हम लोग उस दूसरे झरने तक पहुंचे और उसके जल में हाथ और पैर धुलने का लोभ संवरण नहीं कर पाए. थोड़ी देर वहां बिताने के बाद यह एहसास हो गया कि अगर हम दिल की बात सुनेंगे तो यहाँ से जाने की इच्छा नहीं होगी. लेकिन दिमाग की बात सुनते हुए हम लोग वहां से वापस आये क्योंकि उज्जैन भी जाना था. वहां से निकलकर हम लोग लगभग दो किमी आये और फिर वहां से हमारे रास्ते अलग हो गए, हम लोग उज्जैन के लिए रावण हो गए और वे लोग सैलाना निकल गए.

वापस आते समय दिल एक तरफ तो बहुत प्रसन्न था कि आज प्रकृति के सचमुच पास वक़्त गुजरने का मौका मिला था लेकिन वह समय इतना कम था कि हमने भविष्य में एक बार और वहां जाने और एक रात उस आदिवासी क्षेत्र में बिताने के बारे में भी सोच लिया. अब देखते हैं कि वह मौका कब आता है लेकिन उम्मीद है कि जरूर आएगा और फिर उस यात्रा संस्मरण को शब्दों में ढालने का प्रयास किया जाएगा.