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Saturday, November 15, 2014

देहरी--

देहरी को लांघते हुए उसके पैर काँप रहे थे , क्या वो सचमुच ये कदम उठा पायेगी | 
घुंघरुओं की आवाज उसे किसी और दुनिया में ले जाती थी | उसका एक ही सपना था कि वो नृत्य की दुनिया में नाम करे ,पर कितना मुश्किल था अपने रूढ़िवादी परिवार को समझाना | ये बताना कि नृत्य भी एक कला है , एक साधना है , इबादत है | 
उस छोटे से कसबे में गुरु को ढूँढना भी एक दुरूह कार्य था , लेकिन इरादे अटल हों तो सब मुमकिन है | फिर शुरू हुई साधना , घंटों का रियाज़ और मंजिल पाने का अथक प्रयास | 
और आखिरकार वो दिन भी आ गया जब उसने पैरों में घुंघरू बांध कर , पारम्परिक वेश भूषा में अपना पहला कार्यक्रम देने के लिए देहरी को लांघा | उसे गुरु के कहे शब्द " अपने आगे बढ़ाये कदम कभी पीछे मत खींचना " याद थे | बजती हुई तालियों की गड़गड़ाहट ने वापसी में उसके क़दमों को आत्मविश्वास से भर दिया था |

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