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Thursday, November 15, 2018

कलम और कुर्सियाँ- लघुकथा

"कुछ भी लिखते हो, इतने महीने हो गए यहाँ काम करते हुए, तुमको आजतक पता नहीं चला कि कुछ क्षेत्र कलम चलाने के लिए वर्जित भी होते हैं?
उसने अपनी रिपोर्ट को डस्टबिन में जाते देखा, अंदर उठे क्रोध को किसी तरह दबाकर वह खड़ा रहा. पढ़ाई के दरम्यान कई चीजें जो उसे इस पेशे में आने के लिए प्रेरक का काम करती थीं, आज निरर्थक लग रही थी.
"अपनी कुर्सी की धौंस दिखाकर आप मुझे सच्चाई से दूर नहीं कर सकते सर", वह कहना चाहता था लेकिन चुपचाप पलटकर जाने लगा.
फिर उसे बॉस पर तरस आ गया, वह भी तो उन तमाम कुर्सियों का जिक्र नहीं कर सकता जिनकी धौंस उसे हमेशा सुननी पड़ती होगी.

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