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Thursday, November 29, 2018

उम्मीद ही तो जरुरी है-- लघुकथा

"क्या बात है, बहुत खुश हो आज तो?, समीर ने उसके चेहरे को देखते हुए कहा. दरअसल ख़ुशी उसके चेहरे से छलकी जा रही थी और समीर ही क्या, कोई भी उसे पढ़ सकता था.
"अरे यार, आज मन सचमुच प्रसन्न है, आज उस पत्रिका से मेल आया कि वह मेरी रचना छाप रहे हैं", उसने हँसते हुए समीर का कन्धा दबा दिया.
"सचमुच उससे मेल आया है, इस बात पर तो पार्टी बनती है दोस्त. वैसे छपने के लिए भेजा कब था तुमने ?, समीर ने पूछ लिया.
अब उसने एक लम्बी सांस ली और बोला "सच बताऊँ तो मैं तो भूल ही गया था कि मैंने कुछ भेजा भी है. जब उनका मेल आया तो मैंने चेक किया तो देखा कि ठीक एक साल पहले मैंने भेजा था और आज स्वीकृति आयी".
समीर के चेहरे पर आश्चर्य उभर आया "एक साल बाद, बाप रे, तुमने तो उम्मीद ही छोड़ दी होगी. और उसके बाद तो फिर कभी भेजा भी नहीं होगा वहां प्रकाशन के लिए!
"उम्मीद ही तो नहीं छोड़ी थी दोस्त", उसने मुस्कुराते हुए कहा. 

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