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Friday, November 16, 2018

दरअसल मसला कुछ और है- कहानी

अजीब सी कश्मकश में गुजर रहे थे हरी बाबू पिछले एक महीने से, एक तरफ उनके खुद के पुराने विचार तो दूसरी तरफ इस छोटी सी चीज पर उनकी असहमति. पहले तो वह ऐसे नहीं थे, बल्कि खुले विचार वाले और हर चीज को सकारात्मक दृष्टिकोण से देखने वाले व्यक्ति थे और उनके सभी दोस्त और रिश्तेदार उनकी इसी सोच के कायल थे. जितना उन्होंने अपने धर्मग्रंथों का अध्ययन किया था, उससे कहीं कम दूसरे धर्मों के बारे में नहीं पढ़ा था. और इसी वजह से उनको धर्म की नकारात्मक बातों से एक तरह से एलर्जी थी. उनके अपने अध्ययन कक्ष में रामायण, गीता के साथ साथ क़ुरआन शरीफ और बाइबिल भी रखी थी.
बच्चों को भी उन्होंने कभी भी धर्म के बारे में किसी विशेष सोच को मानने के लिए नहीं कहा, हमेशा उनको अपने विचार खुद से समझने के लिए ही प्रेरित किया. बेटी अर्पिता पिछले दो साल से नौकरी में थी और उन्होंने कह रखा था कि या तो खुद ही शादी कर लो या जहाँ मन हो बता देना, शादी कर देंगे. लेकिन अपने उदार सोच और प्रगतिशील विचारों के बावजूद एक छोटी सी बात वह चाह कर भी किसी से नहीं कह पाए थे.
उनके सभी मज़हब और जातियों के दोस्त हमेशा से थे और उन्होंने कभी उनमें फ़र्क़ भी नहीं किया. लेकिन पिछले कुछ वर्षों से धर्म के आधार पर हो रहे तमाम बहसों और घटनाओं ने उनके मन के किसी कोने में एक मज़हब के खिलाफ एक चिढ़ सी भर दी थी. समय के साथ साथ यह चिढ़ कब नफरत के ज्यादा करीब हो गयी, उनको खुद इसका इल्म नहीं हुआ. लेकिन दिक्कत यह थी कि इस बात को वह न तो खुल के कह पा रहे थे और न हीं इसे जज़्ब कर पा रहे थे. बहरहाल उन्होंने एक आवरण अपने ऊपर ओढ़ रखा था जिसके अंदर जाकर ही कोई उनके अंतर्मन को समझ सकता था. हाँ उनके मन में चलते अंतर्द्वंद में कभी उनके पुराने विचारों की जीत होती तो कभी मौजूं हालातों की ताक़त उनके मन पर हावी हो जाती.
पिछले हफ्ते जब अर्पिता ने उनको कहा कि अब वह शादी के लिए सोच रही है तो उनका पहला सवाल यही था कि उसने किसे पसंद किया है. और लड़के का नाम सुनकर उनको जोर का झटका लगा और उस समय उनको कुछ प्रतिक्रिया देते नहीं बना. उस लड़के का नाम और कुछ भी रहा होता तो उनको शायद ही कोई दिक्कत हुई होती. अर्पिता भी कुछ पल उनकी तरफ देखती रही और जब उनके चेहरे पर प्रसन्नता के कोई लक्षण नहीं दिखे तो हैरान रह गयी. अब चूँकि उन्होंने कभी किसी पर अपनी यह नयी पैदा हुई सोच जाहिर नहीं होने दी थी तो अर्पिता ने भी उस लिहाज़ से नहीं सोचा और पूछ बैठी "क्या हुआ पापा, आप लगता है खुश नहीं हैं मेरी पसंद से? आप ने ही कहा था कि बताना तो मैंने बताया, लेकिन आप एक बार उससे मिल लीजिये, फिर बताईयेगा".
अर्पिता की इस बात ने उस वक़्त उनको जैसे उबार लिया और वह अपने आप को भरसक संयत करते हुए बोले "अरे तेरी पसंद मेरी पसंद है, फिर भी तू कहती है तो एक बार मिल लेता हूँ. अगले हफ्ते के बाद किसी दिन ले आना उसको", और इसके बाद उनको और कुछ पूछना याद ही नहीं रहा.
अर्पिता उस समय तो चली गयी लेकिन कहीं न कहीं उसे भी यह सब खटक रहा था. कहाँ तो उसने सोचा था कि पापा उसकी पसंद का ज़िक्र सुनते ही उससे सवालों की झड़ी लगा देंगे और कहाँ उन्होंने कुछ पूछा तक नहीं. बहुत सोचने के बाद भी उसका दिमाग मज़हब तक नहीं पहुंचा, उसे लगा कि शायद पापा ने कोई और लड़का पसंद कर रखा है. लेकिन फिर वह उलझ गयी कि अगर किसी लड़के को पापा ने पसंद भी किया होता तो कभी न कभी तो उसके बारे में मुझसे जिक्र किया होता. इतना खुलापन तो था ही उसके और पापा के दरमियान. अब वह पापा के सभी दोस्तों और परिचितों के लड़कों के बारे में सोचने लगी, जो उसके हिसाब से पापा के पसंद हो सकते थे. लेकिन फिर भी उसे कोई चीज स्पष्ट नहीं हो रही थी और पापा से सीधे पूछने का भी उसे मन नहीं हो रहा था. दरअसल कभी भी उसने इस बात पर पापा से खुद कोई बात नहीं की थी, हमेशा पापा ही उसको बोलते थे, इसलिए अचानक उसको इस मसले पर पापा से बात करना बड़ा अटपटा लग रहा था.
हरी बाबू भी उस दिन से रोज अपने आप को अपने विचारों के हिसाब से मथते. एक तरफ तो उनकी अपनी सोच और दूसरी तरफ अर्पिता की ख़ुशी. जब भी वह बेटी का चेहरा देखते, उनको लगता कि इस मासूम के फैसले से असहमत होकर अच्छा नहीं कर रहे हैं. लेकिन फिर उस मज़हब का ध्यान आते ही उनकी सोच बदल जाती. अख़बारों में छपने वाले और सोशल मीडिया पर बहुचर्चित कुछ शब्दों जैसे "लव ज़िहाद" आदि ने हालिया वर्षों में उनके मन में एक ग्रंथि सी भर दी थी. एक समय था जब किसी भी और जाति या मज़हब का दोस्त उनसे मिलने आता तो उनको कभी यह महसूस भी नहीं होता था. लेकिन अर्पिता के कहने के बाद तो जैसे उस विशेष मज़हब का कोई भी दोस्त आता तो उनको लगता जैसे वह उनके जले पर नमक ही छिड़कने आया है. उनको देखते ही उनके अंदर एक अजीब सी चिढ़ घर कर जाती. उनको लगने लगा था कि जैसे उस मज़हब के व्यक्ति ने उनकी बेटी उनसे छीनने की कोशिश करके उनकी खुशियों पर ग्रहण लगा दिया है. एकाध बार उनके दोस्तों को उनका यह बदला व्यवहार खटका भी लेकिन किसी को इसका कारण समझ में नहीं आया, आखिर उन्होंने कभी कुछ खुल कर कहा भी तो नहीं था.
एक दिन अर्पिता ने इस बात का जिक्र मम्मी से भी किया लेकिन उनको भी कुछ ठीक से समझ नहीं आ रहा था. उसके बाद उन्होंने हरी बाबू से पूछा भी कि क्या बात है, लगता है आप अर्पिता की पसंद से खुश नहीं हैं, तो उन्होंने टाल दिया. उनको भी यही लगा कि शायद बेटी की शादी को लेकर परेशान हो रहे हैं इसीलिए व्यवहार में ऐसा फ़र्क़ दिख रहा है. मम्मी ने इसके बाद अर्पिता को समझाया कि संभवतः पिता होने के नाते ही वह परेशान होंगे इसलिए एक बार मिलने के बाद सब ठीक हो जाएगा.
एकाध बार पापा से यूँ ही बात करने के बाद भी अर्पिता को जब कुछ नहीं सूझा तो उसने इस बारे में अनवर से जिक्र करना बेहतर समझा. अनवर भी बहुत कुछ सोच नहीं पाया, उसे लगा शायद एक पिता की चिंता ही इसकी वजह होगी. दरअसल अर्पिता ने उसको अपने पापा के उदार विचारों के बारे में इतना बता रखा था कि उसकी सोच में भी मज़हब का कोण नहीं आया.
"अरे पापा तेरी शादी की बात के चलते ही टेन्स हो गए हैं, कुछ दिन में सब नार्मल हो जायेगा. और उनसे मिलते ही मैं उनको अपनी तरफ से पूरी तरह से निश्चिन्त कर दूंगा, डोंट वरी".
इसके बाद लगभग दो सप्ताह बीतने को आये, हरी बाबू ने अपनी तरफ से होने वाले दामाद से मिलने की कोई इच्छा नहीं दर्शायी. अर्पिता रोज शाम को सोचकर आती कि अगर आज पापा ने बात नहीं की तो वह खुद ही बात कर लेगी, लेकिन कहीं न कहीं उसका आत्मसम्मान उसको रोक लेता. आखिर आज तक जब उसने कभी बात नहीं की तो आज कैसे करे. अनवर रोज उससे पूछता और कहता कि चलो मैं खुद ही मिल लेता हूँ, लेकिन अर्पिता उसे मना कर देती.
आखिरकार अर्पिता ने खुद ही बात करने का निश्चय कर लिया और एक रात वह भी पापा के साथ टहलने निकल गयी. वैसे तो हरी बाबू रोज रात को खाना खाकर टहलने जाते थे और शायद ही कभी अर्पिता या उसकी मम्मी उनके साथ टहलते थे. उस दिन अर्पिता को साथ आते देखकर हरी बाबू समझ गए कि आज बात करनी ही पड़ेगी और वह अपने मन में अपने विचारों को व्यवस्थित करने लगे. घर के सामने वाले पार्क में जाकर बैठना अर्पिता ने उचित समझा तो उसके पापा को भी यह ठीक लगा. दरअसल घर में यह बात करना उनको ठीक नहीं लगता था इसीलिए उन्होंने हर बार बात को टाल दिया था.
अर्पिता ने सीधे ही बात कहना ठीक समझा "आखिर बात क्या है पापा, आप बताते क्यों नहीं. इतने दिन हो गए हैं और आपने एक बार भी अनवर के बारे में मुझसे बात नहीं की और न हीं उसे कभी मिलने के लिए बुलाया. अगर आपको किसी ने उसके बारे में कुछ गलत कहा है तो भी मुझसे बताईये, मैं हर बात स्पष्ट करुँगी, लेकिन आप कुछ बोलिये तो".
हरी बाबू ने बेटी का हाथ अपने हाथ में ले लिया और उसको देखते हुए बोले "आज मैं तुमको सब बता दूंगा लेकिन तुम भी मेरी बात को समझने की कोशिश करना".
"आप बताईये न पापा, आप तो मुझे सबसे बेहतर जानते हैं", अर्पिता ने पापा का हाथ पकड़कर कहा.
"क्या तुमको अनवर से बेहतर कोई लड़का नहीं मिल सकता", हरी बाबू ने अर्पिता की तरफ सवालिया निगाहों से देखा.
"लेकिन पापा, अनवर में क्या बुराई है. मुझे अब पूरा यक़ीन है कि किसी ने आपके दिमाग में अनवर के खिलाफ कुछ भर दिया है", अर्पिता को जैसे कुछ कुछ समझ में आने लगा.
हरी बाबू थोड़ी देर तक बेटी को देखते रहे, दरअसल जब वह घर में अर्पिता और अनवर के बारे में सोचते, तब उनको बहुत दिक्कत नहीं समझ में आती थी. लेकिन जब भी एकदम अकेले होते, उनके मन में मज़हब विशेष के प्रति नई पैदा हुई चिढ़ उनको परेशान कर देती.
'देखो बेटा, मुझे अनवर के बारे में बहुत कुछ पता नहीं है और न मैंने जानने की कोशिश ही की है. लेकिन मुझे यह स्वीकार करने में बेहद मुश्किल हो रही है कि मेरी बेटी की शादी किसी मुस्लिम से हो. देखो तुम मुझे गलत मत समझो लेकिन शायद किसी भी और मज़हब का लड़का होता तो मैं इसे बर्दाश्त कर लेता लेकिन इस मज़हब के लड़के को स्वीकार करने को मेरा मन तैयार नहीं होता".
इतना कह कर हरी बाबू खामोश हो गए, अर्पिता को तो जैसे करेंट लग गया, वह तो कभी भी इस पहलू के बारे में सोच भी नहीं सकती थी. उसके हाथ से पापा का हाथ छूट गया, हरी बाबू भी दूसरी तरफ देख रहे थे. शायद अपनी बेटी की नज़रों में गिरने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे.
उन्होंने ने ही फिर बात शुरू की "पिछले कई महीनों में मैंने इस मज़हब के लोगों की करतूतों का गहन अध्ययन किया है, इनका एक ही उद्देश्य है कि किसी भी तरह से दूसरे मज़हब के लोगों को अपने में शामिल करना. आज भले ही नहीं कहें लेकिन शादी के कुछ ही सालों बाद तुम्हारे ऊपर धर्मान्तरण के लिए दबाव पड़ने लगेगा और फिर तुम भी मना नहीं कर पाओगी".
अर्पिता ने एक नजर पिता की तरफ देखा और बोलना शुरू किया "पापा, आजतक तो आपने हमेशा हर धर्म को बराबर ही समझाया हम लोगों को और शायद उसी का परिणाम था कि मैंने भी कभी किसी भी व्यक्ति को उसे मज़हब से जोड़कर नहीं देखा. दूसरी बात आपने हमें यह भी कहा था कि तुम्हारी पसंद मेरी पसंद होगी. अगर आप अनवर को उसकी काबिलियत के हिसाब से परखना चाहते हैं तो मुझे ख़ुशी ही होगी क्यूंकि तब आपके मन में भी कोई शंशय नहीं रह जायेगा. लेकिन सिर्फ इस लिए कि अनवर उस मज़हब से है और आप आजकल के खबरों पर भरोषा करने लगे हैं, आपका यह व्यवहार मुझे नितांत अनुचित लग रहा है. अगर आप नहीं चाहते हैं तो मैं फिलहाल अनवर से शादी नहीं करुँगी लेकिन फिर आप भी मुझे किसी और से शादी करने के लिए मत कहियेगा".
हरी बाबू बेटी को एकटक देखे जा रहे थे इतने में उसने आगे बोलना शुरू किया "आप ने कई किस्से पढ़े होंगे जिसमें धर्म परिवर्तन की बात होगी लेकिन क्या आपने ऐसे किस्से नहीं पढ़े हैं जिसमें दोनों ने आजीवन अपना धर्म अपनाया. यहाँ तक कि अपने बच्चों को भी उनकी समझ से उनका धर्म चुनने दिया. अब आप सिर्फ नकारात्मक खबरों को ही सच मानेंगे तो आपका नजरिया भी एकतरफा ही रहेगा. क्या आपको इसके अलावा भी कोई दिक्कत है इस शादी में?
हरी बाबू को भी लगा कि उन्होंने शायद जल्दबाजी में ऐसा सोच लिया, अनवर में एक मज़हब के अलावा कोई और बुराई उन्होंने कहाँ देखी है. वह पेशोपेश में पड़ गए, आखिर बेटी के ऊपर भरोसा तो करना ही चाहिए था उनको.
"ठीक है, तुम अनवर को घर लेकर आओ, मैं बात करूँगा उससे. लेकिन अभी किसी से भी उसके बारे में जिक्र मत करना", हरी बाबू ने फिलहाल हामी भर दी.
घर के रास्ते में दोनों खामोश थे, अर्पिता ने मम्मी को बता दिया कि पापा अनवर से मिलने को तैयार हो गए हैं लेकिन उसने मज़हब वाली बात जानबूझकर छुपा ली. उसने अनवर को भी फोन पर बता दिया कि पापा से जल्द ही मिलना है और बाकि बाद वह उससे मिलकर बताएगी.
अगले दिन लंच टाइम में अर्पिता जब तक अपने पसंदीदा रेस्त्रां पहुंची, अनवर पहले से ही मौजूद था. अर्पिता के चेहरे को देखकर उसे थोड़ी आशंका हुई, जिस ख़ुशी की वह उम्मीद कर रहा था, वह गायब थी.
"अब तो सब ठीक है अर्पिता, इतना टेन्स क्यों नजर आ रही हो", अनवर ने उसकी देखते हुए कहा.
अर्पिता ने धीरे से मुस्कुरा दिया और अनवर का हाथ अपने हाथ में ले लिया.
"तुम बिलकुल चिंता मत करो, मैं तुम्हारे पापा को निश्चिन्त कर दूंगा अपने भविष्य के बारे में", अनवर उसको समझा रहा था.
लेकिन अर्पिता अभी भी कुछ सोच रही थी, उसने अनवर के चेहरे को देखते हुए पूछा "अच्छा अनवर, एक बात बताओ, क्या शादी के बाद कभी मज़हब हम दोनों के बीच में आएगा".
अनवर को झटका लगा, उसने इस सवाल की उम्मीद कभी नहीं की थी. अब उसे अर्पिता के उदास चेहरे की वजह समझ में आने लगी.
"तुमने कभी इस बात को महसूस किया है आजतक, जैसे तुम्हारा धर्म, वैसे ही मेरा धर्म. लेकिन इस तरह की बात आयी कहाँ से तुम्हारे मन में?
अर्पिता इस सवाल के लिए तैयार ही थी, उसने गंभीरता से अनवर की तरफ देखते हुए कहा "दरअसल सिर्फ मैं और तुम ही नहीं हैं इस रिश्ते में, हमारा परिवार भी है. और ये सवाल तो किसी के भी तरफ से आ सकते हैं, चाहे वह तुम्हारे घरवाले हों या मेरे घरवाले. बहरहाल तुम ये समझ लो कि मेरे घर में यह सवाल उठ चुका है और मैंने अपने तरीके से उनको बता भी दिया है कि हमारे बीच में धर्म कभी नहीं आनेवाला है".
अनवर अर्पिता को एकटक देख रहा था, उसे उसकी समझदारी पर गर्व हो उठा. उसने भी इस चीज को स्पष्ट करना उचित समझा "देखो अर्पिता, हमारे बीच मज़हब कभी भी नहीं था और न आगे कभी होगा. वैसे भी न तो तुम अपना धर्म मुझसे शादी करने के बाद बदलने वाली हो और न ही हमारी अगली पीढ़ी के लिए इसकी कोई बाध्यता रहेगी. वैसे धर्म के किस पहलू पर बात उठी थी तुम्हारे घर पर, बता सकती हो?
अर्पिता थोड़ी हिचकी, क्या खुल कर बता दे पापा की बात. लेकिन अब छुपाने से भी कोई मतलब नहीं निकलता था तो उसने बता देना ही उचित समझा "देखो अनवर, पिछले कुछ सालों में जो कुछ घटा है हमारे समाज में, उसने पापा की सोच पर भी असर डाला है. मैं उनको गलत नहीं कहती, शायद एक पिता होने के नाते भी वह मेरे बारे में ज्यादा सोचते होंगे. उनकी शंका यह थी कि क्या शादी के कुछ साल बाद तुम्हारे अंदर मेरे धर्म को लेकर कुछ फ़र्क़ आएगा. आखिर तुम्हारा भी समाज है, माँ पिता हैं, वह भी सोच सकते हैं कि बहू हमारे धर्म को क्यों नहीं अख्तियार कर लेती".
अनवर ख़ामोशी से सब सुनता रहा, उसके दिमाग में भी विचारों का मंथन चल रहा था. अर्पिता ने जो भी कहा, उसमें गलत तो कुछ भी नहीं था, अधिकतर मामलों में यही तो होता है, या इसी तरह की खबरें आती हैं. उसने अर्पिता के हाथ को कस कर दबाया और मुस्कुराते हुए बोला "तुम्हारे पापा की आशंका निर्मूल नहीं है, आखिर वह भी इसी समाज में रहते हैं जहाँ ये घटनाएं घट रही हैं. लेकिन तुम मेरे बारे में जो जानती हो उसके बाद मुझे सोचने के लिए ज्यादा नहीं बचता. जहाँ तक हमारे धर्म की बात है, मैं इसको लेकर ज्यादा परेशान नहीं हूँ. और चाहो तो मैं तुम्हारे पापा से यह भी कह दूंगा कि वह चाहेंगे तो मैं अपना मज़हब भी बदल लूंगा".
अर्पिता कुछ बोलती उसके पहले ही अनवर फिर से बोला "लेकिन अगर मैंने या तुमने मज़हब बदला तो इसका मतलब हमारी शादी एक समझौता हो जाएगी. और वह हमारे जैसे स्वतंत्र सोच रखने वाले व्यक्ति के हिसाब से भी गलत होगा. और सबसे बड़ी बात, यहाँ मसला मज़हब का बिलकुल नहीं है मेरे हिसाब से, मसला सोच का है. इन सारे पहलुओं को सोचकर ही हमें कोई बात रखनी होगी, अब तुम कहो तो मैं तुम्हारे पापा से बात करूँ".
कुछ देर तक दोनों के बीच में ख़ामोशी पसरी रही, दोनों एक दूसरे को हाथों से ही आस्वस्त करते रहे. इस बीच चाय के दो कप भी खाली हो गए, नाश्ता मंगाने का किसी को ख्याल ही नहीं आया.
"सच कहा तुमने अनवर, असली मसला मज़हब का नहीं, हमारी सोच का है. और इसमें तो कहीं भी कोई शको-सुबहा नहीं है. अब तुम बेफिक्र रहो, मैं पापा को समझा दूंगी. और अगर उसके बाद भी कोई दिक्कत हुई तो तुम मेरे लिए आकाश तो बन ही जाओगे", अर्पिता के चेहरे पर बहुत देर बाद मुस्कराहट नजर आयी.
अनवर ने भी हँसते हुए जवाब दिया "आकाश ही क्यों, तुम कहोगी तो राम भी बन जाऊंगा" और सामने पड़ी चाय को उठाकर पीने लगा.
चाय पीकर दोनों अपने अपने ऑफिस निकल गए, अर्पिता अब काफी हल्का महसूस कर रही थी. कुछ देर पहले चलने वाली गर्म हवा अब उसे शीतलता प्रदान कर रही थी, मौसम काफी बेहतर हो चला था.

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