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Wednesday, November 21, 2018

अंतहीन खामोशी-लघुकथा

बैठक के कमरे में बैठकर उसने अपनी निगाह चरो तरफ दौड़ाई, हर चीज व्यवस्थित थी और यथास्थान रखी हुई थी. पानी पीने के बाद उसने बैग में से पैकेट निकाला और मेजबान को पकड़ा दिया. उम्र के लगभग सातवें दशक में पहुँच चुके मेजबान अभी भी उतने ही ज़िम्मेदारी से घर का सारा काम निबटाने का प्रयास कर रहे थे, ये बाज बात थी कि उनकी उम्र अब इसकी इजाजत नहीं दे रही थी.
अपने एक दोस्त के कहने पर उसको एक पैकेट देने इनके घर आना पड़ा. पहली मुलाक़ात थी और वह इनके बारे में कुछ भी नहीं जानता था. सामने के शोकेस में उनके परिवार का एक चित्र टंगा हुआ था जिसमें पूरा परिवार हँसता हुआ नजर आ रहा था. मेजबान, उनकी पत्नी, एक नवयुवक, एक युवती और एक बच्ची. उसने अनुमान लगाया कि वह नवयुवक उनका पुत्र होगा और युवती उनकी वधू तथा बच्ची उनकी नातिन. आजकल के बेटे बस अपने परिवार का ध्यान रखते हैं, माँ बाप के लिए उनके पास समय कहाँ होता है, उसके दिमाग में बस यही बात चल रही थी और उस पुत्र के उपर उसको बहुत क्रोध आ रहा था.
“यह मेरा पूरा परिवार था, बेटा सब कुछ संभालता था”, मेजबान की दर्द से भरी आवाज़ सुनकर वह चौंक गया. उसकी नजर मेजबान की नजर का पीछा करते एक दूसरे फोटो पर पड़ी जिसपर एक हार टंगा हुआ था. अगले कुछ मिनट तक एक खामोशी पसरी रही जिसका अंत होता उसे नजर नहीं आ रहा था.

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