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Thursday, June 12, 2014

फैसले

जिंदगी में कुछ फैसले ऐसे भी लेने पड़ते हैं जो उस वक्त कठिन लगते हैं | नयी नयी नौकरी लगी थी विकास की और ट्रेनिंग में लोगों से उसकी नजदीकी बढ़ रही थी | कहने को तो ये ट्रेनिंग सेंटर के छात्रो का हॉस्टल था जिसमे मानसिक रूप से बुद्धिजीवी लोग रहते थे , और जिनसे ये उम्मीद कि जा सकती थी कि वो लोग समाज के बीच की खाई को कम करने का प्रयास करेंगे | लेकिन कुछ ही दिनों में ये स्पस्ट होने लगा कि जो चीजे लोगों को बचपन से रटाई जाती हैं वो एक तरह से उनके खून में रच बस जाती हैं और उनसे ऊपर उठना इतना आसान नहीं होता | पढ़ाई करके नौकरी पा लेना और ज्ञान पाना दो अलग अलग चीज होती हैं |
उसने कभी ये नहीं सोचा कि साथ वाले का सरनेम क्या है , वो सिर्फ उसका बैचमेट था , लेकिन ये भी महसूस होने लगा था कि कई अलग ग्रुप किसी खास आधार पर बनने लगे थे | कुछ लोग उससे ज्यादा ही नजदीकी बढ़ाने लगे थे और इन सारे लोगो का सरनेम मिलता जुलता था | कही न कही ये गलत लगा विकास को और उसका मन इसके विरोध में खड़ा हो गया | उनमे से कुछ बहुत अच्छे और प्रतिभाशाली भी थे लेकिन उसने एक बड़े लछ्य के लिए इस छोटे ग्रुप का हिस्सा बनने से इंकार कर दिया था | उस फैसले पर आज भी उसे फक्र है |

कश्मकश

रज्जो सुनो तो , सूरज पुकार रहा था लेकिन रज्जो ने अनसुना कर दिया | सूरज परेशान हो गया , पता नहीं क्या हो गया है इसको | पिछले एक हफ्ते से न तो मैसेज का जवाब दे रही है , न ही कॉल का | सब ठीक ठाक तो चल रहा था फिर ऐसा क्यों कर रही है ये ?
रज्जो भी कश्मकश में थी कि कैसे बताये सूरज को कि क्या हुआ है | कुछ दिन पहले ही जब वो नहा रही थी , उसका फोन मम्मी ने देखा और उसके और सूरज के मेसेजेस पढ़ लिए | फिर तो तूफान उठ गया घर में | मम्मी ने चिल्लाना शुरू कर दिया " अब ये भी यही करेगी , सारे गलत काम हमारे बच्चों को ही करने हैं " | उसे काटो तो खून नहीं था , कुछ नहीं बोल पायी वो | अब उसकी क्या गलती थी कि उसकी चचेरी बहन ने घर से भाग कर शादी कर ली थी |
रात में खबर पापा के पास पहुंची और पापा ने उसे बुलाया | वो चुपचाप गर्दन झुकाये खड़ी थी , और पापा के शब्द उसका कलेजा छलनी कर रहे थे | उन्होंने साफ कह दिया कि अगर उसने तुरंत सूरज से सम्बन्ध नहीं तोड़े तो वो अपनी आगे की जिंदगी जेल में भी बिताने के लिए तैयार हैं |
रज्जो पूरी रात सोचती रही कि क्यों औरों की गलतियों की सजा किसी और को भुगतनी पड़ती है और क्या अपने निजी सुख के लिए अपने परिवार को तहस नहस करना उचित है | अंत में उसने परिवार की ख़ुशी के लिए अपने निजी सुख को भुलाना ठीक समझा |

कसम

भागते भागते किसी तरह टिकट की खिड़की पर पहुंचा , घड़ी देखी तो सिर्फ १० मिनट बाकि थे ट्रेन चलने में | उफ़्फ़ , इतने सबेरे भी इतनी भीड़ , कभी तो सुकून हो जिंदगी में , जब देखो तब भीड़ और भागमभाग | टिकट लेता तो ट्रेन छूटना तंय था , इसलिए लपक कर ट्रेन में चढ़ गया | चढ़ते ही ट्रेन चल दी , किसी तरह एक सीट पर टिका और साँस पर काबू पाने लगा |
पहला मौका था बिना टिकट सफर का , दिल बुरी तरह धड़क रहा था | एक बार पुरे डिब्बे में नजर दौड़ाया , सब लोग अब सोने का उपक्रम करने लगे थे | वैसे भी सुबह के पांच ही बजे थे और जाड़े का समय था तो सब लोग सिकुड़े हुए थे |
उसने भी सोचा कि सो जाये लेकिन नींद तो गायब थी | निगाहें बार बार हर आने वाले व्यक्ति को देख रही थी और सोच रही थी कि पता नहीं कब टी टी आ जाये| पता नहीं कितनी बार सफर किया है इसी ट्रेन में और हर बार तुरंत नींद आ जाती थी लेकिन आज गायब थी | अब वो पूरे डिब्बे को गौर से देखने लगा , चारो तरफ तमाम विज्ञापन चिपके हुए थे लेकिन उन्हें पढ़ने में भी दिल नहीं लगा |
कई स्टेशन पार हो गए , हर स्टेशन से चलते ही दिल धड़कने लगता था कि शायद इस बार टी टी चढ़ेगा डिब्बे में | पहली बार पता चला की कितने स्टेशन आते हैं रास्ते में | जब बेचैनी बहुत बढ़ जाती तो स्टेशन पर रुकते ही गाड़ी से उतर जाता और गाड़ी चलने पर ही चढ़ता | आज प्रतीत हो रहा था कि ट्रेन कितनी धीमी चलती है |
लोगों के खर्राटे उसका दिल जला रहे थे और लगता था कि जैसे उसे छोड़ कर पूरी ट्रेन ने नींद की गोली ले रखी हो | मैगज़ीन बैग में रखी थी लेकिन निकालकर पढ़ने का दिल नहीं किया | समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे सभी इतने बेफिक्र सो रहे थे |
खैर , ख़ुदा ख़ुदा करते मंजिल पर पहुंचे , छह घंटे का सफर हफ़्तों के समान लगा| स्टेशन से बाहर निकलने के बाद कसम ली कि फिर कभी बिना टिकट नहीं चढ़ेंगे ट्रेन में |

एहसान

सो गयी क्या , वल्लभ ने रूपा को हिलाते हुए पूछा | हाँ , सोने दो ना , बहुत थक गयी हूँ मैं | रूपा फिर करवट बदल कर सो गयी | वल्लभ बहुत देर तक जगा रहा , सोचता रहा अख़बार में निकले सम्पादकीय के बारे में |
आज का सम्पादकीय कोर्ट के उस निर्णय के बारे में था , जिसमे कहा गया था कि पत्नी की सहमति के बिना किया गया सहवास भी बलात्कार की श्रेणी में आता है | क्या सच में ऐसा है , क्या पति की इच्छा की कोई जगह नहीं है दांपत्य जीवन में | महिला अधिकार के समर्थक और बहुत सारी महिलाएं इस फैसले को लेकर बेहद उत्साहित थीं और उनकी नज़र में ये स्त्री सशक्तिकरण की ओर एक बहुत बड़ा कदम था |
वल्लभ सोचने लगा की रूपा पहले तो ऐसी नहीं थी , लेकिन शादी के पांच - छह वर्षों में ही उसका रवैया बहुत बदल गया | अब उसे ये एक निहायत गैरजरूरी और उबाऊ काम लगता था | बेमन से कभी कभी वो इसमें साथ दे तो देती थी , लेकिन अधिकांश मौकों पर वल्लभ को एहसास भी करा देती थी की वो उसकी ख़ुशी के लिए ही ये कर रही है |
अब अगर वल्लभ की इच्छा हो तो वो क्या करे , कब तक एहसान लेता रहे रूपा का | तो हल क्या है इसका ? क्या सिर्फ पति ही सम्मान करे पत्नी की इच्छा का , पत्नी नहीं | नहीं , उसे बात करनी चाहिए रूपा से और वो भी नींद के आगोश में समां गया |

Friday, May 2, 2014

पुनरावृत्ति

साँसों की आवाज साफ़ साफ़ सुनाई दे रही थी , लेकिन बार बार पूछने के बाद भी उधर से कोई जवाब नहीं दे रहा था | आज बहुत सालों बाद ऐसा फिर से हो रहा था | उसे अपने कॉलेज के दिन याद आ गए |
बहुत मजा आता था किसी भी अनजान या कभी कभी जाने पहचाने नंबर पर देर रात को ब्लेंक काल करने में | इसी तरह एक बार एक अनजाने नंबर पर काल करने पर उधर से आई आवाज ने तो होश ही उड़ा दिए थे | फिर तो एक सिलसिला ही चल निकला बात करने का | धीरे धीरे उस नंबर से बात करना जिंदगी का एक अहम हिस्सा बन गया | एक दिन इसी तरह बात करते हुए उसने मिलने की इच्छा जताई तो सामने से मना कर दिया गया | दुबारा अगले दिन फिर जब उसने मिलने के लिए कहा तो फोन कट गया | अगले कई दिनों तक बात नहीं हो पायी लेकिन एक दिन जब उसने काल किया तो पता चला कि उसकी शादी की बात चल रही है और उसने एक बार मिलने की इच्छा जताई | अगले दिन पास के एक पार्क में मिलना तंय हुआ |
शाम को वो पार्क पहुंचा , लेकिन उसे अपनी आँखों पर भरोसा ही नहीं हो रहा था | गजब की खूबसूरत थी वो और कहाँ उसका चेचक के दाग से भरा चेहरा | हिम्मत ने साथ छोड़ दिया और पीछे से बिना मिले ही उलटे पाँव लौट पड़ा | अगले कई हफ़्तों तक उसका अपना फोन उसे डराता रहा |
आज २० साल बाद उसे लगा कि वक्त का पहिया उल्टा चल पड़ा है और शायद अब उसी की पुनरावृत्ति हो रही है |

Thursday, May 1, 2014

फ़र्क़--

" आज कल की लड़कियों को तो सलीका ही नहीं रह गया, कैसे कैसे कपडे पहन लेती हैं, न बदन ढँकता है और न ही चेहरा| शर्म लिहाज तो बची ही नहीं इनके पास", चाचा घर के बरांडे में बैठे बड़बड़ा रहे थे|
" लेकिन चाचा, गर्मी भी तो बहुत पड़ रही है न, पास बैठे व्यक्ति ने कहा| अब ऐसी गर्मी में अगर पूरा शरीर ढँका रहे तो वो गर्मी से बेहाल न हो जाएँ"|
" तुम तो कहोगे ही बरखुरदार, तुम भी तो आखिर इसी पीढ़ी के हो न, अरे थोड़ी गर्मी नहीं बर्दास्त कर सकतीं| हमारे ज़माने में तो मजाल थी कि घर से बाहर निकलें और किसी का चेहरा भी दिख जाये"|
अचानक सामने पोते को देख कर चाचा बोले " अरे बेटा, बनियान निकाल कर हवा में बैठ जाओ, पसीना तो सूख जाने दो"|
खुद सिर्फ लुंगी लपेटे और पसीना पोंछते चाचा पोते को समझा रहे थे और वो गर्मी के फ़र्क़ को समझने की कोशिश कर रहा था|

जन्मदिन

आईये आईये वर्माजी , धन्यभाग्य हमारे | कम से कम आपने समय तो निकाला यहाँ पधारने का | हमारा जन्मदिन खास हो गया आज | मेजबान दोहरे हुए जा रहे थे स्वागत में | वर्माजी के पीछे पीछे एक आदमी बड़ा सा गिफ्ट का डिब्बा लेकर आया और रख कर चला गया |
किनारे खड़े उनके पुराने मित्र सोच में पड़ गए कि हम जब आये थे तब स्वागत फीका सा था , लेकिन अब तो बात ही कुछ और है | उनकी परेशानी देखकर दूसरे सज्जन ने समझाया " अमाँ , नाहक परेशान क्यों होते हो | ये स्वागत वर्माजी का नहीं था बल्कि उस बड़े डब्बे का था जो उनके साथ आया था "| अब अंतर समझ में आ गया था और वो नास्ते की तरफ बढ़ गए |