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Thursday, June 12, 2014

ट्रैक्टर--

अपने पिता का अंतिम संस्कार करके लौटा था संजय और दरवाजे पर बैठा सोच रहा था कि काश उसने जिद नहीं की होती | अगर उसने बापू की बात मान ली होती तो शायद ये दिन देखने को नहीं मिलता | इन्हीं सब ख्यालों में डूबे हुए उसे पिछली बातें याद आने लगीं |
उसी ने जिद की थी कि अपने घर भी ट्रैक्टर होना चाहिए | गांव में बहुत से घरों में ट्रैक्टर आ गया था और अब उसके मन में भी इसकी इच्छा हिलोरें मार रहीं थीं | बापू ने बहुत समझाया कि क्या जरुरत है इसकी , तमाम घरों में तो है ही और उनके पास खेत भी इतना नहीं है लेकिन संजय ने एक नहीं सुनी |
जैसे ही उस एरिया के ट्रैक्टर डीलर को भनक लगी कि संजय भी ट्रैक्टर लेना चाहता है , उसने एक एजैंट को उसके पीछे लगा दिया | अब रोज एजेंट का फोन आता और हर दूसरे दिन वो संजय के घर आ धमकता | उसके बापू ने आशंका जाहिर की थी , कि इतने कम खेत पर ट्रैक्टर ऋण नहीं मिलेगा लेकिन एजैंट ने आश्वस्त किया कि ऋण मिल जायेगा | हार कर उसके बापू ने ज़मीन के कागजात संजय को दे दिए और एजेंट ने आनन फानन में ऋण दिला दिया |
अब ट्रैक्टर आ गया , गांव में मिठाईयां बटीं और संजय भी उत्साह से लग गया जुताई करने में | शुरू में तो बहुत से किसानों ने जुताई के लिए कहा , लेकिन पैसे देने के समय एक ही जवाब "फसल पर दे देंगे , भागे थोड़े ही जा रहे हैं"| धीरे धीरे लोगों ने जुताई करवाना कम कर दिया , पैसे का तगादा चलता रहा लेकिन इतना आसान नहीं था पैसा मिलना | अपनी खेती इतनी थी नहीं कि उससे बैंक की किश्त समय से जमा हो सके |
फिर बैंक से नोटिस आना शुरू हुआ और एक दिन कुर्की का नोटिस भी आ गया | बैंक ने ट्रैक्टर भी जब्त कर लिया और खेतों को भी नीलाम कर के अपना पैसा वसूल लिया | इसी सदमे में बापू चल बसे | इस नासमझी से ट्रैक्टर उसके लिए विकास नहीं बल्कि विनाश का कारण बन गया |

संतुष्टि

आपने तो हमें जिन्दा कर दिया साहब , उस औरत के आंसू रुक ही नहीं रहे थे | उसका पति चतुर्थ श्रेणी का कर्मचारी था , शराब और जुए के लत ने बर्बाद कर दिया था | जब साथी कर्मचारियों ने उधार देना बंद कर दिया तो एक ही रास्ता बचा था , सूदखोर के पास जाने का | अब तो महीने में कब तनख्वाह मिली , ये भी उस बेचारी को पता नहीं चलता था | कैसे घर चलाये और बच्चों को स्कूल भेजे , जिंदगी के संघर्षों ने बिलकुल हताश कर दिया था |
एक दिन वो बैंक मैनेजर के केबिन में आकर रोने लगी | पूछने पर बोली " अगर दो बच्चे नहीं होते तो कबका जीवन त्याग चुकी होती और उसने सारा हाल बता डाला " | खैर उसको दिलासा देकर खाता चेक किया तो पता चला कि तनख्वाह जमा तो होती है लेकिन उसी दिन निकल भी जाती है | अगली तनख्वाह पर पता चला कि पासबुक तो सूदखोर के पास है और वो ही निकाल लेता है | उसके ब्याज में ही कमोबेश सारी तनख्वाह चली जाती है और पास में कुछ भी नहीं बचता |
फिर मैनेजर ने उन दोनों को बैंक बुलाया और समझाया कि हम तुम्हे कर्ज देंगे लेकिन तुम्हे साहूकार का सारा पैसा एकसाथ लौटाना होगा | उसकी पत्नी को तो मानो सब कुछ मिल गया |कुछ दिन बाद साहूकार को बुलाकर बैंक ऋण से उसके सारे पैसे चुकता कराये और जैसे ही पासबुक उसकी पत्नी को सौंपा , वो फफक फफक कर रोने लगी और उसका पति हाथ जोड़े खड़ा था | एक परिवार आज उजड़ने से बच गया था और इसकी संतुष्टि सभी के चेहरे पर नजर आ रही थी |

पीड़ा

खा लो बेटा , थोड़ा तो खा लो , रमा अपने छोटे बेटे के पीछे पीछे खाना ले कर घूम रही थी , लेकिन बेटा किसी भी सूरत में खाने को तैयार नहीं था | बड़ी मशक्कत के बाद उसने थोड़ा सा खाया और बाक़ी खाना प्लेट में छोड़ दिया | रमा बहुत दुःखी थी उसके इस आदत से |
अगले दिन जब स्कूल से बेटे को लेकर आते समय रास्ते में सड़क के किनारे एक बच्चे को पेपर के टुकड़े में कुछ खाते देखकर रमा भौचक्क रह गयी | गरीबी और भूख क्या नहीं करा देती , उसका मन पीड़ा से भर गया | फिर कुछ सोचकर उसने बेटे को उस तरफ दिखाया और बोली "बेटा देख , जिन्हे खाना नहीं मिलता है वो कहीं भी , कुछ भी खाने को तैयार हो जाते हैं और तुम खाना बर्बाद कर देते हो "|
पता नहीं क्या लगा बेटे को , लेकिन उसने खाना बर्बाद करना बंद कर दिया | शायद उस भूखे बच्चे की पीड़ा उसके बाल मन को भी छू गयी थी |

फैसले

जिंदगी में कुछ फैसले ऐसे भी लेने पड़ते हैं जो उस वक्त कठिन लगते हैं | नयी नयी नौकरी लगी थी विकास की और ट्रेनिंग में लोगों से उसकी नजदीकी बढ़ रही थी | कहने को तो ये ट्रेनिंग सेंटर के छात्रो का हॉस्टल था जिसमे मानसिक रूप से बुद्धिजीवी लोग रहते थे , और जिनसे ये उम्मीद कि जा सकती थी कि वो लोग समाज के बीच की खाई को कम करने का प्रयास करेंगे | लेकिन कुछ ही दिनों में ये स्पस्ट होने लगा कि जो चीजे लोगों को बचपन से रटाई जाती हैं वो एक तरह से उनके खून में रच बस जाती हैं और उनसे ऊपर उठना इतना आसान नहीं होता | पढ़ाई करके नौकरी पा लेना और ज्ञान पाना दो अलग अलग चीज होती हैं |
उसने कभी ये नहीं सोचा कि साथ वाले का सरनेम क्या है , वो सिर्फ उसका बैचमेट था , लेकिन ये भी महसूस होने लगा था कि कई अलग ग्रुप किसी खास आधार पर बनने लगे थे | कुछ लोग उससे ज्यादा ही नजदीकी बढ़ाने लगे थे और इन सारे लोगो का सरनेम मिलता जुलता था | कही न कही ये गलत लगा विकास को और उसका मन इसके विरोध में खड़ा हो गया | उनमे से कुछ बहुत अच्छे और प्रतिभाशाली भी थे लेकिन उसने एक बड़े लछ्य के लिए इस छोटे ग्रुप का हिस्सा बनने से इंकार कर दिया था | उस फैसले पर आज भी उसे फक्र है |

कश्मकश

रज्जो सुनो तो , सूरज पुकार रहा था लेकिन रज्जो ने अनसुना कर दिया | सूरज परेशान हो गया , पता नहीं क्या हो गया है इसको | पिछले एक हफ्ते से न तो मैसेज का जवाब दे रही है , न ही कॉल का | सब ठीक ठाक तो चल रहा था फिर ऐसा क्यों कर रही है ये ?
रज्जो भी कश्मकश में थी कि कैसे बताये सूरज को कि क्या हुआ है | कुछ दिन पहले ही जब वो नहा रही थी , उसका फोन मम्मी ने देखा और उसके और सूरज के मेसेजेस पढ़ लिए | फिर तो तूफान उठ गया घर में | मम्मी ने चिल्लाना शुरू कर दिया " अब ये भी यही करेगी , सारे गलत काम हमारे बच्चों को ही करने हैं " | उसे काटो तो खून नहीं था , कुछ नहीं बोल पायी वो | अब उसकी क्या गलती थी कि उसकी चचेरी बहन ने घर से भाग कर शादी कर ली थी |
रात में खबर पापा के पास पहुंची और पापा ने उसे बुलाया | वो चुपचाप गर्दन झुकाये खड़ी थी , और पापा के शब्द उसका कलेजा छलनी कर रहे थे | उन्होंने साफ कह दिया कि अगर उसने तुरंत सूरज से सम्बन्ध नहीं तोड़े तो वो अपनी आगे की जिंदगी जेल में भी बिताने के लिए तैयार हैं |
रज्जो पूरी रात सोचती रही कि क्यों औरों की गलतियों की सजा किसी और को भुगतनी पड़ती है और क्या अपने निजी सुख के लिए अपने परिवार को तहस नहस करना उचित है | अंत में उसने परिवार की ख़ुशी के लिए अपने निजी सुख को भुलाना ठीक समझा |

कसम

भागते भागते किसी तरह टिकट की खिड़की पर पहुंचा , घड़ी देखी तो सिर्फ १० मिनट बाकि थे ट्रेन चलने में | उफ़्फ़ , इतने सबेरे भी इतनी भीड़ , कभी तो सुकून हो जिंदगी में , जब देखो तब भीड़ और भागमभाग | टिकट लेता तो ट्रेन छूटना तंय था , इसलिए लपक कर ट्रेन में चढ़ गया | चढ़ते ही ट्रेन चल दी , किसी तरह एक सीट पर टिका और साँस पर काबू पाने लगा |
पहला मौका था बिना टिकट सफर का , दिल बुरी तरह धड़क रहा था | एक बार पुरे डिब्बे में नजर दौड़ाया , सब लोग अब सोने का उपक्रम करने लगे थे | वैसे भी सुबह के पांच ही बजे थे और जाड़े का समय था तो सब लोग सिकुड़े हुए थे |
उसने भी सोचा कि सो जाये लेकिन नींद तो गायब थी | निगाहें बार बार हर आने वाले व्यक्ति को देख रही थी और सोच रही थी कि पता नहीं कब टी टी आ जाये| पता नहीं कितनी बार सफर किया है इसी ट्रेन में और हर बार तुरंत नींद आ जाती थी लेकिन आज गायब थी | अब वो पूरे डिब्बे को गौर से देखने लगा , चारो तरफ तमाम विज्ञापन चिपके हुए थे लेकिन उन्हें पढ़ने में भी दिल नहीं लगा |
कई स्टेशन पार हो गए , हर स्टेशन से चलते ही दिल धड़कने लगता था कि शायद इस बार टी टी चढ़ेगा डिब्बे में | पहली बार पता चला की कितने स्टेशन आते हैं रास्ते में | जब बेचैनी बहुत बढ़ जाती तो स्टेशन पर रुकते ही गाड़ी से उतर जाता और गाड़ी चलने पर ही चढ़ता | आज प्रतीत हो रहा था कि ट्रेन कितनी धीमी चलती है |
लोगों के खर्राटे उसका दिल जला रहे थे और लगता था कि जैसे उसे छोड़ कर पूरी ट्रेन ने नींद की गोली ले रखी हो | मैगज़ीन बैग में रखी थी लेकिन निकालकर पढ़ने का दिल नहीं किया | समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे सभी इतने बेफिक्र सो रहे थे |
खैर , ख़ुदा ख़ुदा करते मंजिल पर पहुंचे , छह घंटे का सफर हफ़्तों के समान लगा| स्टेशन से बाहर निकलने के बाद कसम ली कि फिर कभी बिना टिकट नहीं चढ़ेंगे ट्रेन में |

एहसान

सो गयी क्या , वल्लभ ने रूपा को हिलाते हुए पूछा | हाँ , सोने दो ना , बहुत थक गयी हूँ मैं | रूपा फिर करवट बदल कर सो गयी | वल्लभ बहुत देर तक जगा रहा , सोचता रहा अख़बार में निकले सम्पादकीय के बारे में |
आज का सम्पादकीय कोर्ट के उस निर्णय के बारे में था , जिसमे कहा गया था कि पत्नी की सहमति के बिना किया गया सहवास भी बलात्कार की श्रेणी में आता है | क्या सच में ऐसा है , क्या पति की इच्छा की कोई जगह नहीं है दांपत्य जीवन में | महिला अधिकार के समर्थक और बहुत सारी महिलाएं इस फैसले को लेकर बेहद उत्साहित थीं और उनकी नज़र में ये स्त्री सशक्तिकरण की ओर एक बहुत बड़ा कदम था |
वल्लभ सोचने लगा की रूपा पहले तो ऐसी नहीं थी , लेकिन शादी के पांच - छह वर्षों में ही उसका रवैया बहुत बदल गया | अब उसे ये एक निहायत गैरजरूरी और उबाऊ काम लगता था | बेमन से कभी कभी वो इसमें साथ दे तो देती थी , लेकिन अधिकांश मौकों पर वल्लभ को एहसास भी करा देती थी की वो उसकी ख़ुशी के लिए ही ये कर रही है |
अब अगर वल्लभ की इच्छा हो तो वो क्या करे , कब तक एहसान लेता रहे रूपा का | तो हल क्या है इसका ? क्या सिर्फ पति ही सम्मान करे पत्नी की इच्छा का , पत्नी नहीं | नहीं , उसे बात करनी चाहिए रूपा से और वो भी नींद के आगोश में समां गया |