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Wednesday, June 25, 2014

सरनेम

जिंदगी में कई बातें इस तरह की होती हैं , जिनको साझा कर लेने से ही उनकी चुभन कम हो जाती है , लेकिन ये बात तो आत्मा को झिंझोड़ चुकी थी | स्कूल के समय की बात थी , शायद क्लास 5 की , एक नया नया मास्टर आया था स्कूल में | पहले ही दिन जब उसने क्लास में नज़र डाली , तो उसका मन कुछ खट्टा सा हो गया |
किसी शहर से ताल्लुक रखता था वो और क्लास में जब फ़टे पुराने कपड़े पहने गंदे बच्चों को देखा तो उसका मन बहुत ख़राब हो गया | खैर जब उसने हाजिरी लेनी शुरू की और मैंने अपना पूरा नाम बताया तो वो ठिठक गया | एक बार फिर उसने पूछा और दुबारा जब मैंने अपना सरनेम बताया तो वो बड़े हिकारत से बोला "ये सरनेम तो बड़ी जात वालों का होता है , तुम्हारा कैसे "| मैं कुछ समझ नहीं पाया लेकिन उसने फिर कहा कि अपना सरनेम बदलो नहीं तो क्लास से निकाल देंगे |
खैर रोता , बिसूरता मैं घर पहुंचा और सब बात बताई | लेकिन घर में छायी चुप्पी ने हिम्मत तोड़ दी | अगले कई दिनों तक उस मास्टर के भय से स्कूल नहीं गया | फिर किसी तरह हिम्मत जुटा के स्कूल गया लेकिन अंदर से कुछ टूट चुका था | पता नहीं मास्टर को दया आ गयी थी या वो बाक़ी चीजों में इतना उलझ गया था कि उसने मुझसे पूछा नहीं | लेकिन मैं फिर अगले कई सालों तक किसी को अपना सरनेम बताने कि हिम्मत नहीं जुटा पाया |
आज वो सरनेम तो मेरे नाम के साथ जुड़ा है लेकिन कहीं कुछ चुभा हुआ है आज भी | 

परछाईयाँ

वक़्त कभी नहीं ठहरता , किसी के लिए भी नहीं , चाहे हम जो भी कर लें | अभी कुछ दिनों पहले तक ही कितना खुशनुमा माहौल था , और आज ये सन्नाटा , सचमुच वक़्त नहीं ठहरता |
एक औसत इन्सान की जिंदगी कुछ छोटी छोटी खुशियों और बड़े बड़े मुश्किलात के बीच हिचखोले खाती रहती है | जब ग़म का समय होता है तो समय ही नहीं बीतता , और खुशियों के पल तो सचमुच पल समान ही होते हैं , कब उड़ जाते हैं , पता ही नहीं चलता | वो भी एक आम इन्सान ही था , पढ़ाई पूरी होने के बाद छोटी सी नौकरी मिल गयी थी तो लगा दुनियाँ जहान की खुशियां मिल गयी हैं | फिर शादी हुई और पहले बच्चे के आने की आहट सुनाई देने लगी | बड़े खुश थे वे , तमाम कल्पनायें कर रहे थे बच्चे के बारे में , नाम क्या रखेंगे , कहाँ पढ़ाएंगे , वगैरह , वगैरह |
आखिर वो दिन भी आ गया और हस्पताल पहुंच गए वे दोनों | रात आँखों में ही बीत गयी और सुबह एक प्यारे से बच्चे का आगमन हुआ उनकी दुनियाँ में | खुशियों का पारावार नहीं रहा उस समय , लेकिन कुछ घंटो बाद भी जब बच्चा सुस्त ही पड़ा रहा तो उन्हें चिंता हुई | डॉक्टर के चेहरे की लकीरें बता रहीं थीं कि सब ठीक नहीं है | अगले कुछ दिनों तक उनको होश नहीं था और जब डॉक्टर ने बताया कि बच्चे के दिल में छेद है तो जैसे पहाड़ टूट पड़ा उनपर |
आज सारी कोशिशों के बाद भी जब वो बच्चे को नहीं बचा पाया तो बुरी तरह टूट गया था | और हस्पताल के बाहर दीवाल से पीठ टिका कर बैठे बैठे देख रहा था कि परछाईयाँ भी ग़मों कि तरह बढ़ रहीं हैं | 

Sunday, June 15, 2014

पिता

हर वो शख्श जो बच्चों के लिए जीता ,
हर वो शख्श जो उनके लिए गरल पीता ,
एक सच्चा गुरु , एक सच्चा मार्गदर्शक ,
धरती पर ख़ुदा का रूप , ऐसा होता है पिता !!
इस धरती के सारे पिताओं , और उन अकेली महिलाओं को भी जो दोनों फ़र्ज़ निभा रही हैं , को पितृ दिवस पर सादर प्रणाम एवम नमन |

Thursday, June 12, 2014

सुकून

"सरकती जाये है रुख से नक़ाब , आहिस्ता आहिस्ता" | जगजीत सिंह की ये ग़ज़ल कमरे में बज रही थी और मैं पुरसुकून अपनी अलग दुनिया में खोया हुआ था | रात के ११ बज रहे थे और कमरे में अँधेरा , बजती हुई ग़ज़ल से सामंजस्य बैठाने में कामयाब हो गया था |
अचानक दरवाजे पर आहट हुई और रूम पार्टनर कमरे में घुसा | क्या यार , जब देखो तब सिर्फ ग़ज़लों को सुनते हो , कहते हुए उसने बल्ब जला दिया | बल्ब की रौशनी ने एकदम से वापस हक़ीक़त की दुनिया में पहुँचा दिया मुझे |
कब तुम अपनी कल्पना की आभासी दुनिया से बाहर निकलोगे भाई , पार्टनर मुझे समझाने की कोशिश कर रहा था | जिंदगी की कठोर सच्चाईयों का सामना करो और जिंदगी को भरपूर जियो | सुनना ही है तो रॉक सुनो , पॉप म्यूजिक सुनो , ये क्या की हर समय अँधेरे में ग़ज़लों को सुनते रहते हो |
अब मैं पूरी तरह से जमीनी दुनिया में था | फिर मैंने उससे पूछा कि तुम ये पॉप और रॉक म्यूजिक क्यों सुनते हो | उसने तुरंत जवाब दिया " यार , जिंदगी में मस्ती बहुत जरुरी है और इन्हे सुनकर मजा आ जाता है | गाने सुनो , झूमो और इस लाइफ को पूरी तरह से एन्जॉय करो "| मैंने फिर पूछा " सुकून भी मिलता है तुमको इस संगीत को सुनकर " , उसके पास कोई जवाब नहीं था |
मुझे सुकून मिलता है ग़ज़लों को सुनकर , और मेरे लिए जिंदगी में सुकून के बहुत मायने हैं | इन्हे सुनने का मतलब ये नहीं है कि मैं जिंदगी की तल्ख़ हक़ीक़त से भागने की कोशिश कर रहा हूँ , बल्कि ये मुझे जिंदगी को और संजीदगी से जीने को प्रेरित करती हैं | और मैंने बल्ब बुझाकर फिर से ग़ज़ल सुनना शुरू कर दिया |

पछतावा--

बहुत पछतावा हो रहा था उन्हें अपनी सोच और व्यवहार पर| समझ नहीं पा रहे थे कि कैसे उतरेगा ये बोझ उनके सीने से| जिस बच्चे को उन्होंने नालायक और निकम्मा समझा था और जिसे घर से भी बेरुखी से दूर कर दिया था, आज इतनी बड़ी मुसीबत में वही काम आया| माताजी की आँख से अश्रुधारा अविरल बह रही थी और पिताजी भी खामोश खड़े थे, पश्चात्ताप उनके चेहरे से भी साफ़ झलक रहा था|
ग्लानि से उन्होंने अपने हाथ बेटे की ओर जोड़ दिए|
" माता पिता के हाथ जब भी उठें, आशीर्वाद देने के लिए उठें, हाथ जोड़ने के लिए नहीं, कहते हुए उसने पिता के जोड़े हुए हाथों को अपने सर पे रख लिया|
उनकी सारी ग्लानि आंसुओं में बह गयी और उन्होंने उसे सीने से लगा लिया|

माँ--

" क्या बात है रितु, आज इतना उदास क्यों हो"|
" कुछ नहीं, बस यूँ हीं, कुछ खास नहीं"|
लेकिन उसे पता चल गया था कि वो क्यों उदास है| दरअसल कल मातृ दिवस है और हॉस्टल में सभी बच्चे इसी के बारे में बात कर रहे थे आज| हर कमरे में बस एक ही बात कि कल अपनी माँ के लिए क्या गिफ्ट लेना है या कौन सा कार्ड भेजना है| लेकिन रितु की माँ नहीं है इसीलिए वो उदास दिख रही है|
उसे अपनी माँ याद आ गयी, शायद ही कोई दिन हो जिस दिन उनका फोन नहीं आता हो| और फोन क्या , वो तो पूरा नसीहतों का पिटारा होता है| ये खाना, वो मत खाना, देर रात तक मत जागना, पढ़ाई लिखाई में ध्यान लगाना, और भी न जाने कितनी नसीहतें | आखिर वो कह देती थी कि बस करो माँ, अब मैं बच्ची नहीं हूँ, हास्टल में रह रही हूँ और अपना ख्याल रख सकती हूँ| इसपर उनका जवाब होता कि हाँ अब तो तू बड़ी हो गयी है, अब तो मेरी बातें तुम्हे अजीब लगती होंगी और फिर वो फोन रख देती| लेकिन कुछ ही घंटों में फिर उनका फोन आ जाता और फिर से सारी नसीहतें दी जातीं|
लेकिन आज रितु को देखकर उसे एहसास हो रहा था कि माँ की कमी कितनी महसूस होती है, खासकर तब, जब घर से दूर रहना पड़ता है| कोई नहीं होता जो बिना कहे ही सारी जरूरतों को समझ सके, और उनको पूरा कर सके| जो उनकी ख़ुशी में खुश हो और उनके दुःख में दुखी| और जिसकी माँ ही नहीं हो तो उसकी कमी तो कोई पूरा कर ही नहीं सकता|
फिर उसने माँ को फोन लगाया और बोला " माँ, कल तुम रितु को फोन करना और उसे बताना की उसकी माँ नहीं तो क्या हुआ मैं तो हूँ, माँ नहीं तो माँ जैसी तो हूँ"|

विडम्बना

अरे भाई , क्या बात है , बड़ी भीड़ लगी है कनिया के घर के सामने , मैंने सामने से आ रहे जोखन से पूछा | " आप को नहीं पता , बेचारा आज अल्लाह को प्यारा हो गया " | मैं एकदम से हतप्रभ रह गया | कब हो गया ये और मुझे खबर तक नहीं |
कनिया हमारे गांव का नाई था , पिछले २५ सालों से मैं उसे देखता आ रहा था | उसकी एक आँख गड़बड़ थी जिससे लोग उसे कनिया ही पुकारते थे | किसी को भी , यहाँ तक की उसे खुद अपना सही नाम याद नहीं था | हर जाति और धर्म के लोगों के घर जा कर लोगों के बाल काटना , दाढ़ी बनाना ही उसका पेशा था | उसके पिता भी इसी पेशे में थे और शायद उसकी पिछली कई पुश्तें यही करती आ रही थीं | बड़ा ही खुशमिजाज , सारे गांव की खबर उसके पास होती थी | बाल कटवाते कटवाते पूरे एरिया की खबर मिल जाती थी | इधर उसका काम थोड़ा कम हो गया था क्योंकि नई पीढ़ी के नौजवान अब उसके बदले नए सैलून में जाना पसंद करते थे | लेकिन अभी भी पुरानी पीढ़ी का वही नाई था और कैची और उस्तरा ही उसके औजार थे जिसे वो चमड़े पर घिस घिस कर तेज करता रहता था |
जल्दी से मैं उसके घर के सामने पहुंचा और पूछने लगा कि कैसे हुआ | तभी उसके पड़ोसी ने बताया कि वो टिटनेस से मर गया | दरअसल वो उस्तरे से अपनी दाढ़ी बना रहा था और कट जाने के कारण उसे टिटनेस हो गया | वक़्त की विडम्बना कि वह अपने ही उस्तरे की वजह से ही काल का ग्रास बन गया |