" क्या बात है रितु, आज इतना उदास क्यों हो"|
" कुछ नहीं, बस यूँ हीं, कुछ खास नहीं"|
लेकिन उसे पता चल गया था कि वो क्यों उदास है| दरअसल कल मातृ दिवस है और हॉस्टल में सभी बच्चे इसी के बारे में बात कर रहे थे आज| हर कमरे में बस एक ही बात कि कल अपनी माँ के लिए क्या गिफ्ट लेना है या कौन सा कार्ड भेजना है| लेकिन रितु की माँ नहीं है इसीलिए वो उदास दिख रही है|
उसे अपनी माँ याद आ गयी, शायद ही कोई दिन हो जिस दिन उनका फोन नहीं आता हो| और फोन क्या , वो तो पूरा नसीहतों का पिटारा होता है| ये खाना, वो मत खाना, देर रात तक मत जागना, पढ़ाई लिखाई में ध्यान लगाना, और भी न जाने कितनी नसीहतें | आखिर वो कह देती थी कि बस करो माँ, अब मैं बच्ची नहीं हूँ, हास्टल में रह रही हूँ और अपना ख्याल रख सकती हूँ| इसपर उनका जवाब होता कि हाँ अब तो तू बड़ी हो गयी है, अब तो मेरी बातें तुम्हे अजीब लगती होंगी और फिर वो फोन रख देती| लेकिन कुछ ही घंटों में फिर उनका फोन आ जाता और फिर से सारी नसीहतें दी जातीं|
लेकिन आज रितु को देखकर उसे एहसास हो रहा था कि माँ की कमी कितनी महसूस होती है, खासकर तब, जब घर से दूर रहना पड़ता है| कोई नहीं होता जो बिना कहे ही सारी जरूरतों को समझ सके, और उनको पूरा कर सके| जो उनकी ख़ुशी में खुश हो और उनके दुःख में दुखी| और जिसकी माँ ही नहीं हो तो उसकी कमी तो कोई पूरा कर ही नहीं सकता|
फिर उसने माँ को फोन लगाया और बोला " माँ, कल तुम रितु को फोन करना और उसे बताना की उसकी माँ नहीं तो क्या हुआ मैं तो हूँ, माँ नहीं तो माँ जैसी तो हूँ"|
" कुछ नहीं, बस यूँ हीं, कुछ खास नहीं"|
लेकिन उसे पता चल गया था कि वो क्यों उदास है| दरअसल कल मातृ दिवस है और हॉस्टल में सभी बच्चे इसी के बारे में बात कर रहे थे आज| हर कमरे में बस एक ही बात कि कल अपनी माँ के लिए क्या गिफ्ट लेना है या कौन सा कार्ड भेजना है| लेकिन रितु की माँ नहीं है इसीलिए वो उदास दिख रही है|
उसे अपनी माँ याद आ गयी, शायद ही कोई दिन हो जिस दिन उनका फोन नहीं आता हो| और फोन क्या , वो तो पूरा नसीहतों का पिटारा होता है| ये खाना, वो मत खाना, देर रात तक मत जागना, पढ़ाई लिखाई में ध्यान लगाना, और भी न जाने कितनी नसीहतें | आखिर वो कह देती थी कि बस करो माँ, अब मैं बच्ची नहीं हूँ, हास्टल में रह रही हूँ और अपना ख्याल रख सकती हूँ| इसपर उनका जवाब होता कि हाँ अब तो तू बड़ी हो गयी है, अब तो मेरी बातें तुम्हे अजीब लगती होंगी और फिर वो फोन रख देती| लेकिन कुछ ही घंटों में फिर उनका फोन आ जाता और फिर से सारी नसीहतें दी जातीं|
लेकिन आज रितु को देखकर उसे एहसास हो रहा था कि माँ की कमी कितनी महसूस होती है, खासकर तब, जब घर से दूर रहना पड़ता है| कोई नहीं होता जो बिना कहे ही सारी जरूरतों को समझ सके, और उनको पूरा कर सके| जो उनकी ख़ुशी में खुश हो और उनके दुःख में दुखी| और जिसकी माँ ही नहीं हो तो उसकी कमी तो कोई पूरा कर ही नहीं सकता|
फिर उसने माँ को फोन लगाया और बोला " माँ, कल तुम रितु को फोन करना और उसे बताना की उसकी माँ नहीं तो क्या हुआ मैं तो हूँ, माँ नहीं तो माँ जैसी तो हूँ"|
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