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Saturday, July 5, 2014

आज़ादी

हैप्पी इंडिपेंडेंस डे , आज़ादी की वर्षगांठ मुबारक | आतिशबाजियां छुड़ाते और एक दूसरे को मिठाई खिलाते हुए लोग चिल्ला रहे थे और एक दूसरे को इंडिपेंडेंस डे की शुभकामना भी दे रहे थे |
और सामने की मिठाई की दुकान पर छोटू रात के ११ बजे दौड़ दौड़ कर लोगों को पानी दे रहा था और टेबल साफ़ कर रहा था | 

Friday, July 4, 2014

पढ़ाई लिखाई--

" बीबीजी, आप नौकरी क्यों करते हो, आपके पास तो पैसे की कोई कमी नहीं है"|
" पैसा ही सब नहीं होता रे जिंदगी में, आखिर अपनी पढ़ाई लिखाई कब काम आएगी", बीबीजी ने उसे समझाने की कोशिश की|
अभी कुछ दिन पहले ही जब महरी ने कहा था कि मंहगी बहुत बढ़ गयी है और उसकी पगार भी थोड़ी बढ़ जाये तो बीबीजी ने उसे बड़े ही कठोर लहजे में मना कर दिया था|
आज शायद पढ़ाई लिखाई का उपयोग महरी की समझ में आ गया था|

उदासी--

आज हॉस्टल में उसके जन्मदिन पर खूब मस्ती हुई, केक काटा गया, पार्टी हुई और खूब नाच गाना हुआ| पूरी पार्टी के दौरान वह उदास ही रहा, हालांकि किसी को उसकी उदासी का आभास तक नहीं हुआ| लेकिन रात को जब वह अपने कमरे में पहुंचा तो तमाम कोशिशों के बावजूद भी अपने आँसुओं को नहीं रोक पाया| तभी दरवाजे पर दस्तक हुई, उसने जल्दी जल्दी अपने को सामान्य करने का प्रयास करते हुए दरवाजा खोला।
"क्या यार, तू उदास क्यों है आज ? आज तो तुझे खुश रहना चाहिए, बर्थडे के दिन भी कोई उदास रहता है क्या ?"
"नहीं तो, मैं उदास कहाँ हूँ यार" जबरदस्ती मुस्कुराते हुए उसने कहा|
"देख, तेरी हर बात मुझे पता है, लेकिन अपनी इस उदासी का कारण नहीं बताया तूने मुझे| चल बता, क्या बात है ?"|
बड़ी मुश्किल से रोका हुआ सब्र का बांध ढह गया और हिचकियाँ बंध गयीं उसकी| थोड़ा संयत होने के बाद भरे गले से बस इतना ही कह पाया, "मेरे जन्म का और मेरी माँ के जाने का दिन एक ही नहीं होना चाहिए था"| 

Wednesday, July 2, 2014

हैवानियत

सिग्नल लाल हो गया था इसलिए कार रोकनी पड़ी | अचानक नज़र पड़ी सड़क के किनारे भीख मांगते हुए बच्चों पर | जाड़े का मौसम और फ़टे कपड़े पहने बच्चे इस कार से उस कार तक दौड़ लगा रहे थे | मेरे शीशे पर भी दस्तक देने लगा एक बच्चा , मन व्यथित हो गया और कुछ पैसे निकाल कर दे दिया उसको |
शाम को घर पर चाय पीते हुए एक समाचार पे नज़र गयी , लिखा था कि बच्चों से भीख मंगवाने वाले एक गिरोह का सरगना गिरफ्तार | पूरी खबर पढ़ कर रोंगटे खड़े हो गए , कैसे बच्चों का अपहरण करके उनको इन गिरोहों को बेच देते हैं | फिर उनकी शारीरिक छति ( अंग-भंग ) करके भीख मांगने की ट्रेनिंग देते हैं और उनका टारगेट की रोज़ इतने पैसे लाना ही है नहीं तो भूखा रखेंगे और यातना अलग |
पैसे कमाने के लिए किस हद तक जा सकता है इंसान , उफ़्फ़ | कैसे किसी मासूम को इस पेशे में धकेल देते हैं लोग ? क्या हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं की हम पता लगाएं कि भीख मांग रहा बच्चा सचमुच किसी गरीब घर का है या किसी गिरोह द्वारा अपहृत ? क्या आगे से ऐसे किसी बच्चे को कुछ दे पाउँगा , निर्णय नहीं कर पा रहा था मैं |

Tuesday, July 1, 2014

टीचर

आज ये महसूस हो रहा था कि जिंदगी उतनी आसान नहीं होती , जितना हम सोचते हैं | पढ़ते समय जब ये भी नहीं सोचा था कि आगे चल कर क्या बनना है तो बहुत सारे रास्ते दिखते थे , लेकिन जैसे जैसे समय गुजरता गया वैसे वैसे जिंदगी एक संकरी सुरंग लगने लगी | अपने एक टीचर का कहा अब समझ में आ रहा था कि समय सबसे कीमती चीज होती है , इसकी इज्जत करो | 
इस बार आखिरी मौका था सिविल सर्विसेज का एग्जाम देने का और ये भी निकल गया | अब तो कोई रास्ता ही नज़र नहीं आ रहा था , क्या करें , किधर जाएँ | हर एग्जाम के लिए उम्र निकल चुकी थी |
अचानक उम्मीद कि किरण दिखी , याद आया कि टीचर तो बन सकते हैं अभी | उसके लिए तो उम्र है ,और आखिर उसी मोड़ पे आ गए जहाँ जाने के नाम पे सबकी हंसी उड़ाते थे | घर वालो कि उम्मीद और खुद कि नज़रों में अपनी इज्जत बचाने के लिए थके कदमो से बीएड का फॉर्म भरने चल दिए |

Thursday, June 26, 2014

भागीरथी

भागीरथ ने सोचा की क्यों न धरती पर चलकर गंगा को देखा जाये , वो गंगा जिसे वो कई वर्षों की तपस्या के बाद धरती पर लाये थे | वो सोच रहे थे की गंगा ने तो अब तक समस्त मानवों एवम अन्य प्राणियों का उद्धार कर दिया होगा | धरती पर पहुँच कर वो जिस नदी के किनारे पहुंचे , वो नदी तो बिलकुल नहीं थी | एक सूखी हुई नदी , या नाला कह लें तो बेहतर , गन्दगी से भरी हुई और बुरी तरह से प्रदूषित | उन्होंने कई बार अलग अलग लोगों से पूछ कर तस्दीक करने की कोशिश की , लेकिन हर बार उन्हें एक ही जवाब मिला कि यही गंगा है | वो बहुत दुखी और उदास हो गए |
चिंतित भागीरथ फिर से तपस्या करने चल दिए | अनेक वर्षों की अथक तपस्या के बाद एक बार फिर प्रभु प्रकट हुए और पूछा कि क्या चाहते हो | भागीरथ बोले कि हमारी गंगा नदी , जो कभी सबको जीवनदान देती थी , अब उसे ही जीवनदान की जरुरत है | किसी तरह उसे नया जीवन दीजिये प्रभु |
इतना सुनते ही प्रभु अदृश्य हो गए और थोड़ी देर में ही आकाशवाणी हुई कि हे भागीरथ , इस गंगा को जीवनदान देना तो असंभव जान पड़ता है | जब ये मानव खुद का ही विनाश करने पर तुल गया है तो इसे बचाना अत्यंत दुरूह प्रतीत होता है | अब तो तुम्हे एक बार फिर से गंगा को धरती पर ले जाना पड़ेगा , शायद इस बार वो जीवन दान दे सके इस सृष्टि के सभी प्राणियों को |

बदनसीब--

आज फिर शाम को चला गया था वो सुरेश के यहाँ| पता नहीं क्यों बड़ा अपनापन सा महसूस होता था उसे वहां पर| जब भी मन उदास होता, उसके पैर खुद ब खुद सुरेश के घर की तरफ चल पड़ते थे| 
क्या नहीं था उसके अपने घर में, ऐशो आराम के सब साधन मौजूद थे| पिता बहुत बड़े बिजनेसमैन थे लेकिन उनके पास कमी थी तो सिर्फ समय की| माँ बचपन में ही चल बसी थी, ऐसे में जब भी मन बहुत उदास हो जाता था तो वो सुरेश के यहाँ निकल जाता था|
जैसे ही वो सुरेश के घर के अंदर घुसा, उसे सुरेश के चिल्लाने की आवाज आई| वो अपनी माँ को बुरी तरह डाँट रहा था, लेकिन उसकी माँ खामोश थी और उसे देखते ही वो चुप हो गया|
" क्या बात है बेटा, आज बहुत दिन बाद आये, सब ठीक तो है न"|
" हाँ आँटी, सब ठीक है, बस बहुत दिनों से आप के हाथ का खाना नहीं खाया था तो सोचा की आज चल के खा लिया जाए"|
" क्यों नहीं बेटा, जरूर, बैठो तुम"| इतना कह कर वो किचेन में चली गयीं, कुछ देर पहले कुछ हुआ भी था ये उनके चेहरे पर नजर भी नहीं आ रहा था|
खाना खा कर वो वापस अपने घर पहुंचा और सोचने लगा कि वो कितना बड़ा बदनसीब है| लेकिन फिर उसे लगा कि उससे बड़ा बदनसीब तो सुरेश है जिसे माँ की कोई क़द्र ही नहीं है, क्योंकि उसे एहसास ही नहीं है कि माँ के नहीं होने का दर्द क्या होता है|