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Thursday, August 7, 2014

इज़्ज़त--

" ये सब छोड़ क्यों नहीं देती ", कपड़े पहनते हुए उसने कहा।
" एक नयी जिंदगी शुरू करो, इस गन्दगी से दूर, इज़्ज़त की जिंदगी "।
वो बिफर गयी, " ऐसा है, ऐसे भाषण देने वाले बहुत मिलते हैं, लेकिन कपड़े पहनने के बाद"।
" और ये काम मैं किसी के दबाव में नहीं करती, अपनी मर्ज़ी से करती हूँ और अच्छे पैसे मिल जाते हैं"। ये मुझे भी पता है ज्यादे दिन नहीं चलना है ये, इसीलिए भविष्य के लिए भी कमा लेना चाहती हूँ "।
फिर एक गहरी नज़र और डाली उसने और बोली, " एक बात और, इज़्ज़त जब तुम लोगों की नहीं जाती, तो मेरी क्यों जाएगी"।
अब उसकी ऑंखें मिलाने की भी हिम्मत नहीं थी, चुपचाप निकल गया| 

Wednesday, August 6, 2014

जिंदगी की लौ--

रात काफी हो गयी थी, एक ढिबरी हल्का उजाला फैला रही थी झोपड़ी में। रमिया नींद के झोंके में थी, लेकिन ध्यान दरवाजे की ओर लगा था। रोज तो किसना आ जाता था अब तक, आज पता नहीं कहाँ रह गया। एक कोने में थाली में कुछ रोटियां और थोड़ी सब्जी रखी हुई थी और दूसरे कोने में दोनों बच्चे एक कथरी पर गुड़ मुड़ सोये हुए थे।
अचानक कमरे में शराब की बदबू फ़ैल गयी, रमिया चौंक कर उठ बैठी। किसना अंदर आ गया था और आते ही खटिया पर गिर गया। " खाना लगा जल्दी " किसना दहाड़ा और रमिया ने झट से थाली खटिया पर रख दिया।
" कितनी ठंडी रोटी है और ये पनीली सब्जी बनायीं है, ऐसा खाना तो कुत्ता भी नहीं खा सकता", और थाली फेंक दी उसने। बच्चे थाली की आवाज़ से उठ गए और छोटा रोने लगा।
रमिया ने थाली उठाई, रोटियों को वापस थाली में रखा और दुबारा खटिया की ओर बढ़ी, तब तक किसना खर्राटे भरने लगा था। रमिया ने उसके फटे जूते निकाले, और आ कर बच्चों के पास लेट गयी। छोटा रोते रोते सो गया था, ढिबरी की लौ अब बुझने लगी थी और रमिया अपनी जिंदगी को ढिबरी की लौ की तरह टिमटिमाता महसूस कर रही थी। 

Monday, August 4, 2014

सोच--

बड़ी मुसीबत है , कोई काम करने वाला मिलता ही नहीं आजकल , अगर हो सके तो कोई काम करने वाला ढूंढ दो " ,|
"ठीक है मेमसाब , मैं देखता हूँ " |
कुछ दिन बाद , दरवाजे पर दस्तक हुई , शालिनी ने दरवाजा खोला तो देखा गार्ड के साथ एक लड़का भी खड़ा है ।
" मेमसाब , आपको काम करने वाला चाहिए था न , ये मिला गेट पर , काम ढूंढ रहा था " ।
"क्या नाम है तुम्हारा , कहाँ के रहने वाले हो तुम और तुम्हारे माता पिता क्या करते है ??" | इतने सवाल एक साथ सुनकर लड़का घबरा गया । फिर थोड़ा रुक कर बोला " जी मेरा नाम कलीम है , माँ बाप नहीं हैं और कल से भूखा हूँ , कुछ भी काम कर लूंगा " ।
"कलीम , अच्छा , अभी फ़िलहाल जरुरत नहीं है " और दरवाजा बंद कर दिया । 

Sunday, August 3, 2014

नज़रिया--

" बड़ा ख़राब जमाना आ गया है, अब घर में विधर्मी नौकर रख लिया है, कौन खायेगा, पियेगा उसके घर"। राधा ऊँचे स्वर में अपने पड़ोसन को बता रही थी।
" अरे हमसे कहा होता, हमने दिला दिया होता नौकर, कोई कमी है इनकी ", पड़ोसन ने भी हाँ में हाँ मिलायी।
थोड़ी देर में ही बेटी से बात करते हुई राधा ने पूछा " अरे कोई काम वाली मिली की नहीं "।
" हाँ माँ, मिल गयी है, बहुत सफाई से काम करती है फातिमा "।
" देखना बेटा, संभाल के रखना, आज कल टिकते नहीं ये लोग, समझी "।

चोरी

सिग्नल पे कई गाड़ियां खड़ी थीं , मुझे भी रोकनी पड़ी । अचानक सड़क के किनारे नज़र पड़ी तो देखा कि एक लड़का भाग रहा है , फटे कपड़े पहने हुए और उसके पीछे दो तीन लड़के और दौड़ रहे थे । फिर पीछे से एक अधेड़ पुरुष को चिल्लाते हुए दौड़ते देखा तो माजरा समझ में आया । अब गौर से आगे भागते लड़के को देखा तो उसके हाथ में एक पर्स दिख गया । लेकिन वो तेज नहीं दौड़ पा रहा था , शायद भूखा था या बीमार , लेकिन उसके पीछे दौड़ने वाला अधेड़ तो बिलकुल भी दौड़ नहीं पा रहा था । काफी मोटा आदमी था वो और शायद पैदल चलने की आदत नहीं थी उसकी । एक बार तो मन में आया की मैं दौड़ा के पकड़ लूँ , फिर पता नहीं क्यों , नहीं निकल पाया अपनी गाड़ी से । अब तक सिग्नल हरा हो गया था और गाड़ी आगे बढ़ानी पड़ी ।
रास्ते भर सोचता रहा कि सही किया या गलत । मन कह रहा था कि गलत किया , उसे पकड़ लेना चाहिए था । लेकिन दिल कह रहा था कि उसे नहीं पकड़ के कोई गलती नहीं की , क्योंकि जो लड़का पर्स ले के भाग रहा था , वो बहुत कमजोर और गरीब लग रहा था । जिसका पर्स ले के भागा था , वो काफी अमीर लग रहा था , बड़ी गाड़ी में था और शायद उस पर्स के चले जाने से उसको बहुत फ़र्क़ नहीं पड़ता । लेकिन फिर भी चोरी तो चोरी ही है , हो सकता है कि वो लड़का नशे का आदी हो , लेकिन अगर उस लड़के ने भूख या गरीबी के चलते पर्स चुराया था तो पता नहीं क्यों , मुझे बहुत बड़ा अपराध नहीं लगा । अगर उसे पकड़ लेता तो उसकी जम के पिटाई होती , पुलिस अलग मारती और शायद वो दम ही तोड़ देता ।
पता नहीं , सही किया की गलत , लेकिन अफ़सोस नहीं हुआ । पता नहीं , अगर मेरा पर्स लेकर भागा होता तो , शायद पकड़ता , शायद नहीं पकड़ता । लेकिन शायद उसको लोगों से पिटने नहीं देता ।

Saturday, August 2, 2014

कुक्कुर

" बाऊ , आज त पेट भर खाए के मिली न " लखुआ बहुत खुश था । आज ठकुराने में एक शादी थी और लखुआ का पूरा परिवार पहुँच गया था । पूरा दुआर बिजली बत्ती से जगमग कर रहा था और चारो तरफ पकवानों की सुगंध फैली हुई थी ।
" दुर , दुर , अरे भगावा ए कुक्कुर के इहाँ से " , चच्चा चिल्लाये और दो तीन आदमी कुत्ते को भगाने दौड़ पड़े । लखुआ भी डर के किनारे दुबक गया । तब तक उन लोगों की नज़र पड़ गयी इन पर " ऐ , चल भाग इहाँ से , अबहीं त घराती , बराती खईहैं , बाद में एहर अईहा तू लोगन " । फिर याद आया कि  पत्तल भी तो उठवाना है इनसे तो बोले " अच्छा , जब लोग खाना खा लिहं , तब पतरी उठा के फेंक दिहा , अउर एकदम सफ़ाई से , गन्दा न रहे "।  अब लखुआ फिर से थोड़ा आगे बढ़ा तो बाप ने टोका " ढेर आगे मत जा , अबहीं टाइम हौ " ।
धीरे धीरे रात गहराने लगी , लखुआ के पेट में भूख से मरोड़ें पड़ रहीं थीं । खाना शुरू हुआ , बीच बीच में कुत्ते थोड़ा आगे बढ़ जाते और उनको भगाने वाले चिल्ला के भगा देते । अचानक एक कुत्ता एकदम से पंगत के बीच में पहुँच गया , और शोर मचा कि भगाओ इसे । गुस्से में एक आदमी ने लाठी उठाई और उसे भगाते हुए खींच के मारा । फिर एकदम से आवाज आई " अरे बाऊ " , और लखुआ सर पकड़ के गिर गया । लाठी सीधे उसके सर पे लगी थी और वो वहीँ पर ढेर हो गया । 

प्रतिबिम्ब--

अचानक सोनू लड़खड़ाया और दिव्य ने दौड़ कर पकड़ लिया उसे। इसी पार्क में तो उसने उँगलियाँ पकड़ कर चलना सिखाया था उसको। शाम को ऑफिस से लौटने के बाद रोज़ सोनू को ले आता था यहाँ। सोनू का भी खूब मन लगता था यहाँ और मंजरी को भी समय मिल जाता था खाना बनाने के लिए। धीरे धीरे सोनू शाम होते ही दरवाज़े के आसपास ही रहता था और किसी दिन देर हो जाती दिव्य को तो मंजरी को परेशान कर के रख देता।
दिव्य को तो याद भी नहीं अपने पिता की, बचपन में ही उनका साया उठ गया था उसके सर से। सोनू के साथ खेलकर वो महसूस करता कि शायद वो भी अपने पिता के साथ ऐसे ही खेलता। मंजरी कहती कि ये तो तुम्हारा प्रतिबिम्ब हो गया है अब, तो वो मुस्कुरा देता। और आज पार्क में अपनी ही तरह पीठ पर हाँथ बाँध के जब उसने दिव्य को चलते देखा तो उसे विश्वास हो गया कि वो उसका प्रतिबिम्ब ही है।