रात काफी हो गयी थी, एक ढिबरी हल्का उजाला फैला रही थी झोपड़ी में। रमिया नींद के झोंके में थी, लेकिन ध्यान दरवाजे की ओर लगा था। रोज तो किसना आ जाता था अब तक, आज पता नहीं कहाँ रह गया। एक कोने में थाली में कुछ रोटियां और थोड़ी सब्जी रखी हुई थी और दूसरे कोने में दोनों बच्चे एक कथरी पर गुड़ मुड़ सोये हुए थे।
अचानक कमरे में शराब की बदबू फ़ैल गयी, रमिया चौंक कर उठ बैठी। किसना अंदर आ गया था और आते ही खटिया पर गिर गया। " खाना लगा जल्दी " किसना दहाड़ा और रमिया ने झट से थाली खटिया पर रख दिया।
" कितनी ठंडी रोटी है और ये पनीली सब्जी बनायीं है, ऐसा खाना तो कुत्ता भी नहीं खा सकता", और थाली फेंक दी उसने। बच्चे थाली की आवाज़ से उठ गए और छोटा रोने लगा।
रमिया ने थाली उठाई, रोटियों को वापस थाली में रखा और दुबारा खटिया की ओर बढ़ी, तब तक किसना खर्राटे भरने लगा था। रमिया ने उसके फटे जूते निकाले, और आ कर बच्चों के पास लेट गयी। छोटा रोते रोते सो गया था, ढिबरी की लौ अब बुझने लगी थी और रमिया अपनी जिंदगी को ढिबरी की लौ की तरह टिमटिमाता महसूस कर रही थी।
अचानक कमरे में शराब की बदबू फ़ैल गयी, रमिया चौंक कर उठ बैठी। किसना अंदर आ गया था और आते ही खटिया पर गिर गया। " खाना लगा जल्दी " किसना दहाड़ा और रमिया ने झट से थाली खटिया पर रख दिया।
" कितनी ठंडी रोटी है और ये पनीली सब्जी बनायीं है, ऐसा खाना तो कुत्ता भी नहीं खा सकता", और थाली फेंक दी उसने। बच्चे थाली की आवाज़ से उठ गए और छोटा रोने लगा।
रमिया ने थाली उठाई, रोटियों को वापस थाली में रखा और दुबारा खटिया की ओर बढ़ी, तब तक किसना खर्राटे भरने लगा था। रमिया ने उसके फटे जूते निकाले, और आ कर बच्चों के पास लेट गयी। छोटा रोते रोते सो गया था, ढिबरी की लौ अब बुझने लगी थी और रमिया अपनी जिंदगी को ढिबरी की लौ की तरह टिमटिमाता महसूस कर रही थी।
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