अचानक सोनू लड़खड़ाया और दिव्य ने दौड़ कर पकड़ लिया उसे। इसी पार्क में तो उसने उँगलियाँ पकड़ कर चलना सिखाया था उसको। शाम को ऑफिस से लौटने के बाद रोज़ सोनू को ले आता था यहाँ। सोनू का भी खूब मन लगता था यहाँ और मंजरी को भी समय मिल जाता था खाना बनाने के लिए। धीरे धीरे सोनू शाम होते ही दरवाज़े के आसपास ही रहता था और किसी दिन देर हो जाती दिव्य को तो मंजरी को परेशान कर के रख देता।
दिव्य को तो याद भी नहीं अपने पिता की, बचपन में ही उनका साया उठ गया था उसके सर से। सोनू के साथ खेलकर वो महसूस करता कि शायद वो भी अपने पिता के साथ ऐसे ही खेलता। मंजरी कहती कि ये तो तुम्हारा प्रतिबिम्ब हो गया है अब, तो वो मुस्कुरा देता। और आज पार्क में अपनी ही तरह पीठ पर हाँथ बाँध के जब उसने दिव्य को चलते देखा तो उसे विश्वास हो गया कि वो उसका प्रतिबिम्ब ही है।
दिव्य को तो याद भी नहीं अपने पिता की, बचपन में ही उनका साया उठ गया था उसके सर से। सोनू के साथ खेलकर वो महसूस करता कि शायद वो भी अपने पिता के साथ ऐसे ही खेलता। मंजरी कहती कि ये तो तुम्हारा प्रतिबिम्ब हो गया है अब, तो वो मुस्कुरा देता। और आज पार्क में अपनी ही तरह पीठ पर हाँथ बाँध के जब उसने दिव्य को चलते देखा तो उसे विश्वास हो गया कि वो उसका प्रतिबिम्ब ही है।
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