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Sunday, August 3, 2014

चोरी

सिग्नल पे कई गाड़ियां खड़ी थीं , मुझे भी रोकनी पड़ी । अचानक सड़क के किनारे नज़र पड़ी तो देखा कि एक लड़का भाग रहा है , फटे कपड़े पहने हुए और उसके पीछे दो तीन लड़के और दौड़ रहे थे । फिर पीछे से एक अधेड़ पुरुष को चिल्लाते हुए दौड़ते देखा तो माजरा समझ में आया । अब गौर से आगे भागते लड़के को देखा तो उसके हाथ में एक पर्स दिख गया । लेकिन वो तेज नहीं दौड़ पा रहा था , शायद भूखा था या बीमार , लेकिन उसके पीछे दौड़ने वाला अधेड़ तो बिलकुल भी दौड़ नहीं पा रहा था । काफी मोटा आदमी था वो और शायद पैदल चलने की आदत नहीं थी उसकी । एक बार तो मन में आया की मैं दौड़ा के पकड़ लूँ , फिर पता नहीं क्यों , नहीं निकल पाया अपनी गाड़ी से । अब तक सिग्नल हरा हो गया था और गाड़ी आगे बढ़ानी पड़ी ।
रास्ते भर सोचता रहा कि सही किया या गलत । मन कह रहा था कि गलत किया , उसे पकड़ लेना चाहिए था । लेकिन दिल कह रहा था कि उसे नहीं पकड़ के कोई गलती नहीं की , क्योंकि जो लड़का पर्स ले के भाग रहा था , वो बहुत कमजोर और गरीब लग रहा था । जिसका पर्स ले के भागा था , वो काफी अमीर लग रहा था , बड़ी गाड़ी में था और शायद उस पर्स के चले जाने से उसको बहुत फ़र्क़ नहीं पड़ता । लेकिन फिर भी चोरी तो चोरी ही है , हो सकता है कि वो लड़का नशे का आदी हो , लेकिन अगर उस लड़के ने भूख या गरीबी के चलते पर्स चुराया था तो पता नहीं क्यों , मुझे बहुत बड़ा अपराध नहीं लगा । अगर उसे पकड़ लेता तो उसकी जम के पिटाई होती , पुलिस अलग मारती और शायद वो दम ही तोड़ देता ।
पता नहीं , सही किया की गलत , लेकिन अफ़सोस नहीं हुआ । पता नहीं , अगर मेरा पर्स लेकर भागा होता तो , शायद पकड़ता , शायद नहीं पकड़ता । लेकिन शायद उसको लोगों से पिटने नहीं देता ।

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