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Monday, September 8, 2014

नशा--

उसे अभी भी भरोसा नहीं हो रहा था , उसके सामने बैठी औरत वही थी , जिसे उसने फिल्मों में देखा हुआ था | एक समय था जब उसने हिट फिल्मे दी थीं , लेकिन आज उस पांच सितारा होटल की रेड में ये भी गिरफ्तार हुई थी | पुलिस स्टेशन लाकर उसने उसे बैठने के लिए कहा और पूछा " तुम्हारे इस पेशे में आने की वजह "?
थोड़ा रुक कर उसने जवाब दिया " सफलता से बड़ा कोई और नशा नहीं होता और जब ये नशा उतरता है तो इंसान सही और गलत में फ़र्क़ करना भूल जाता है | लोग अनदेखा करने लगें , बर्दाश्त नहीं होता | कहाँ आगे पीछे घूमती भीड़ और कहाँ अकेलापन , फिर इंसान दूसरे नशों में डूबने लगता है | और जिस जीवनशैली की आदत पड़ चुकी होती है उसे पूरा करने के लिए वो किसी भी हद तक चला जाता है" | 
किसी भी पश्चात्ताप के निशान नहीं थे उसके चेहरे पर |

Sunday, September 7, 2014

दक्षिण अफ्रीका डायरी - ४

यहाँ आने के बाद श्री नेल्सन मंडेला से नहीं मिल पाने का मलाल ताउम्र रहेगा | दरअसल जब मैं यहाँ आया तो वो गंभीर रूप से बीमार थे और हस्पताल में थे | फिर दिसंबर में उनकी मृत्यु हो गयी और मैं उनसे मिलने से वंचित रह गया |
यहाँ पर एक जगह है " फोर्ड्सबर्ग " जो मिनी एशिया जैसा है | यहाँ अपने जरुरत की हर चीज मिल जाती है और यहाँ जाकर महसूस हो जाता है कि हम हिंदुस्तान में हैं | उस एरिया में ट्रैफिक रूल्स कम चलते हैं , अव्यवस्था चारो ओर दिख जाती है और बहुतेरे हिंदुस्तानी या पाकिस्तानी दूकानदार हैं | खास कर सैलून सारे पाकिस्तानी लोगों के हैं और तमाम भारतीय रेस्टोरेंट भी हैं यहाँ | एक और जगह है " लिनेसिआ" जहाँ अधिकांश हिंदुस्तानी लोग रहते हैं और वहां बहुत से मंदिर भी हैं |
अपने त्यौहार जैसे दशहरा , दीवाली इत्यादि मनाने के लिए एक जगह निश्चित है यहाँ " मार्लबोरो " | वहां पर एक मंदिर और कम्युनिटी सेंटर है जहाँ सारे कार्यक्रम होते हैं | महात्मा गांधी की एक प्रतिमा जोहन्नेस्बर्ग टाउन में भी है जहाँ २ अक्टूबर को माल्यार्पण होता है |
दिसंबर में इंडियन क्रिकेट टीम दक्षिण अफ्रीका में आई | जोहानसबर्ग में एक टेस्ट मैच , वन डे मैच और एक वन डे मैच सेंचूरियन ( जोहानसबर्ग से काफी नज़दीक ) में था | टीम उसी माल में रुकी थी जिसमे हमारा बैंक है और इस वज़ह से टीम के लगभग सभी खिलाड़िओं से मिलने का मौका आसानी से मिल गया | हिन्दुस्तान में कभी ये सोच भी नहीं सकते की इन लोगों से आप मिल कर बातचीत भी कर सकते हैं | अंशिका भी दिसंबर में यहाँ एक महीने के लिए आ गयी और फिर मैच देखने से लेकर घूमना फिरना खूब हुआ | क्रमशः

Friday, September 5, 2014

रिश्ता--

पता नहीं कौन सा रिश्ता था उनके बीच , जब भी वो जाता , ऑंखें बहने लगती |
दोस्त थे दोनों , उम्र में थोड़ा अंतर था , फिर समय के साथ दोस्ती का रिश्ता भाईयों सा हो गया |
दोनों दो शहरों में रहते थे लेकिन महीने दो महीने में एक दूसरे से मिलते जरूर थे |
इस बार जब छोटा जाने लगा तो उसने बड़े के पैर छुए | अब तो ये रिश्ता पिता पुत्र जैसा हो गया था , शायद बढ़ती उम्र का असर था | और जब वो बस में बैठ कर हाँथ हिला रहा था तो बड़ा अपनी ऑंखें पोंछ रहा था | 

नेकी--

" नेकी करो और भूल जाओ " इस कहावत को मानने वाले बड़े सुखी रहते हैं और उनको जिंदगी में कभी कभी बड़े सुखद आश्चर्य मिलते हैं | शायद २००१ की बात है , मैं आजमगढ़ में नियुक्त था | नयी शाखा थी और काफी सारे परिचित लोग भी थे उस शहर में | एक रिश्तेदार के ससुराल में शादी तंय हो गयी थी और उनको तिलक के लिए पैसे देने थे लड़के वालों को | पैसा एफ डी के रूप में मऊ के बैंक आफ इंडिया में रखा हुआ था और वो दो नामों से था | एक नाम जिसका था वो उस वक़्त किसी और शहर में था और उसके आने का समय निश्चित नहीं था | पैसा तुरंत चाहिए था लेकिन बैंक वालों ने बिना दोनों के हस्ताक्षर किये पैसे देने से इंकार कर दिया ( नियमतः वो सही थे ) |
वो रिश्तेदार तुरंत मेरे पास आये की किसी भी तरह से मुझे पैसा दिलवा दीजिये नहीं तो शादी में दिक्कत आ सकती है | उन्होंने भरोसा दिलाया कि जैसे ही दूसरे व्यक्ति आएंगे , उनके हस्ताक्षर करवा देंगे | मैंने मऊ शाखा में बात की , और उन्होंने मेरे लिखित आश्वासन पर पैसा दे दिया | बात आई गयी हो गयी , शादी भी हो गयी और मैं इन सब बातों को भूल गया |
लगभग तीन वर्ष पश्चात जब मेरी नियुक्ति मुगलसराय में थी , मेरे एक परिचित जो पुलिस विभाग में बड़ी पोस्ट पर थे ( जिनकी मदद से कुछ बिज़नेस लाने का प्रयास कर रहा था ) से मैं मिलने गया था | उनके ऑफिस में बैठ कर हम चाय पी रहे थे तभी एक नौजवान पुलिस अफसर आया और किनारे बैठ गया | मेरा परिचय हुआ और फिर मैं चाय पीने में मशगूल हो गया | वो नौजवान अफसर मुझे लगातार देखे जा रहा था , जो मुझे भी महसूस हो रहा था | आखिरकार उससे नहीं रहा गया तो वो मुझसे पूछने लगा की आप यहाँ से पहले कहाँ थे | मैंने बताया तो फिर पूछा कि उसके पहले कहाँ थे आप तो मैंने बताया कि आजमगढ़ | ये सुनते ही उन्होंने कहा कि आप ने मुझे नहीं पहचाना | मेरे इंकार करने पर उन्होंने बताया कि मेरी बहन कि शादी थी और आपके चलते ही वो पैसा समय पर मिल गया था | सचमुच मैंने उस अफसर को नहीं पहचाना लेकिन याद आ गया |
वो दिन , और आज का दिन , हम लोग बेहद अच्छे दोस्त हैं | आज उनके जन्मदिन पर अचानक ये सब याद आ गया | जन्मदिन मुबारक प्रिय मित्र |

शिक्षक दिवस पर--

वैसे तो मैं कभी भी ऐसा छात्र नहीं रहा जिसपर गुरुजन गर्व कर सकें , लेकिन कई शिक्षकों ने बहुत प्रभावित किया | कुछ बहुत अच्छी तो कुछ कड़वी यादें हैं छात्र जीवन की , लेकिन आज एक गुरु के बारें में बताऊंगा जिन्होंने प्रभावित किया |
बी एच यू की बात है | हॉस्टल में रहने के कारण देर तक जगना और फिर देर तक सोना | सुबह की प्रैक्टिकल की क्लास अक्सर छूट जाती थी | एक विषय था प्लांट पैथोलॉजी का जिसके प्रैक्टिकल में भी गायब रहता था | मिड सेम की परीक्षा हुई , नंबर उन्होंने अपने प्रैक्टिकल क्लास में ही दिखाया | मैं गया नहीं इसलिए नंबर पता नहीं चला | अब अगले प्रैक्टिकल में जाना मज़बूरी बन गया था | खैर मैं पहुंचा और उनसे अपने नंबर के बारे में पूछा | बड़ी हिकारत भरी नज़र से देखते हुए उन्होंने कॉपी निकाली , लेकिन नंबर देखते ही उनका चेहरा बदल गया | दरअसल मेरे सबसे ज्यादा नंबर थे | अब उन्होंने मेरी तारीफ़ करनी शुरू कर दी कि बहुत सटीक जवाब दिए हैं तुमने , एकदम संक्षिप्त | मेरी आदत रही है कम से कम में लिखने की और मेरी जान में जान आई | लेकिन अब तो फंस गए थे क्योंकि आगे से हर प्रैक्टिकल में जाना मज़बूरी बन गया |
खैर एंड सेम की परीक्षा आई | मैं अपनी आदत के अनुसार मैं फ़टाफ़ट उत्तर लिख कर बाहर निकल गया | चूँकि समय बचा हुआ था इसलिए क्लास के बाहर लॉन में बैठा हुआ था तभी एक लड़का आया और बोला कि मेरा तो प्रश्न छूट गया | मैंने पूछा कि क्यों तो वो बोला कि अरे पेपर के पीछे भी प्रश्न थे जो मैं देख ही नहीं पाया | अब मेरे प्राण सुख गए क्योंकि मैंने भी पीछे नहीं देखा था और मेरे भी वो प्रश्न छूट गए | मैं भाग कर वापस क्लास में गया लेकिन अब लिखने की इज़ाज़त नहीं थी | तब तक टीचर भी आ गए थे और मुझे देखते ही उनके मुंह से निकला " अरे तुम्हारा भी प्रश्न छूट गया " | मैंने बुझे मन से हामी भर दी | अब मुझसे ज्यादा वो परेशान दिखने लगे और बगल में खड़े टीचर से मेरे बारे में बताने लगे | थोड़ी देर बाद उन्होंने सांत्वना दी कि कोई बात नहीं , प्रैक्टिकल में मेहनत करना , सब ठीक हो जाएगा |
खैर प्रैक्टिकल कैसा हुआ , मैं नहीं कह सकता लेकिन उन्होंने मुझे ग्रेड जरूर दे दिया | उसके बाद भी जब तक मैं वहां था , मैं उनसे मिलता रहा और उनके प्रति मेरे मन में आज भी श्रद्धा है क्यूंकि उन्होंने अपने विश्वास को गलत साबित नहीं होने दिया | वो शिक्षक थे श्री डी सी पंत |

शिक्षक दिवस पर -

एक और शिक्षक के बारे में बताना चाहूंगा | इंटरमीडिएट में जिस कॉलेज में मेरा एडमिशन हुआ था वो शायद पढ़ाई के मामले में बनारस के सबसे कमजोर कॉलेजों में गिना जाता था | टीचर्स कम थे , साइंस लैब ख़राब हालत में था और इंग्लिश की पढ़ाई के बारे में सोचना भी कठिन था वहां | लेकिन उस समय इंग्लिश पढ़ने में पता नहीं क्यों दिलचस्पी बढ़ गयी थी , शायद अभाव में ही जरुरत तीव्रता से महसूस होती है | खैर जुम्मा जुम्मा हम दो लोग थे क्लास में जिन्हें सचमुच इच्छा थी कि अपनी इंग्लिश में सुधार किया जाए | इंग्लिश के शिक्षक बड़े तगड़े डीलडौल वाले थे , सारे बच्चे उनको बाघे ( लायन ) बुलाते थे | खैर हम लोगों ने हिम्मत जुटा कर उनसे कहा कि हमें इंग्लिश सुधारनी है , आप हमारा मार्गदर्शन करें | पहले तो उन्हें लगा कि ये लड़के कहीं मजाक तो नहीं कर रहे हैं लेकिन हमारी हालत देख कर उन्हें भरोसा हुआ कि सच में ये सीखना चाहते हैं |
खैर , उन्होंने शुरू में हम लोगों को कुछ ट्रांसलेशन वगैरह दिया और जब देखा कि वास्तव में ये दोनों मेहनत कर रहे हैं तो उन्होंने हमें इज़ाज़त दे दी कि हम लोग खाली घंटों में उनके पास आ सकते हैं | फिर ये लगभग रोज़ का नियम बन गया | कभी ग्रामर , कभी कविता और कभी गद्य , बारी बारी से हम लोगों को जो भी वो बता सकते थे , सब बताया | बाद में तो उनका उत्साह हम लोगों से भी ज्यादा बढ़ गया था और सप्ताह का शायद ही कोई दिन था जब हम लोग कुछ न सीखतें हों |
आज जो कुछ भी टूटी फूटी अंग्रेजी आती है , उसमे उनका सबसे बड़ा योगदान है | और आज ये भी महसूस होता है कि किसी अध्यापक के लिए शायद इससे बड़ी ख़ुशी कि बात और कोई नहीं होती कि कोई बच्चा सच में उनके पास सीखने के लिए आये | उस गुरु का नाम था श्री छविनाथ सिंह | आज शिक्षक दिवस पर उनको सादर नमन |

कमाई--

चार पांच किक के बाद किसी तरह स्कूटर स्टार्ट हुई मास्साहब की | पसीना पोंछते हुए जैसे ही बैठने को हुए कि एक गाड़ी आकर रुकी | गाड़ी से उतरकर उस नौजवान ने मास्साहब के पैर छुए और एक पैकेट उनकी और बढ़ाया |
वो अभी सोच ही रहे थे कि नौजवान बोला " सर , आपकी शिक्षा का ही सुपरिणाम है कि आज मैं कुछ बन पाया हूँ , आज के दिन इंकार मत करिये " | मास्साहब ने पलट कर एक नज़र दरवाजे पर खड़ी अपनी पत्नी की तरफ देखा और विनम्रता से पैकेट लौटाते हुए बोले " तुम्हारे आदर से बड़ी भेंट कुछ और नहीं हो सकती , जीवन में और तरक्की करो " |
पत्नी को अपने कहे शब्द " क्या कमाया है आपने आजतक " का उत्तर मिल गया था |