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Friday, September 5, 2014

शिक्षक दिवस पर -

एक और शिक्षक के बारे में बताना चाहूंगा | इंटरमीडिएट में जिस कॉलेज में मेरा एडमिशन हुआ था वो शायद पढ़ाई के मामले में बनारस के सबसे कमजोर कॉलेजों में गिना जाता था | टीचर्स कम थे , साइंस लैब ख़राब हालत में था और इंग्लिश की पढ़ाई के बारे में सोचना भी कठिन था वहां | लेकिन उस समय इंग्लिश पढ़ने में पता नहीं क्यों दिलचस्पी बढ़ गयी थी , शायद अभाव में ही जरुरत तीव्रता से महसूस होती है | खैर जुम्मा जुम्मा हम दो लोग थे क्लास में जिन्हें सचमुच इच्छा थी कि अपनी इंग्लिश में सुधार किया जाए | इंग्लिश के शिक्षक बड़े तगड़े डीलडौल वाले थे , सारे बच्चे उनको बाघे ( लायन ) बुलाते थे | खैर हम लोगों ने हिम्मत जुटा कर उनसे कहा कि हमें इंग्लिश सुधारनी है , आप हमारा मार्गदर्शन करें | पहले तो उन्हें लगा कि ये लड़के कहीं मजाक तो नहीं कर रहे हैं लेकिन हमारी हालत देख कर उन्हें भरोसा हुआ कि सच में ये सीखना चाहते हैं |
खैर , उन्होंने शुरू में हम लोगों को कुछ ट्रांसलेशन वगैरह दिया और जब देखा कि वास्तव में ये दोनों मेहनत कर रहे हैं तो उन्होंने हमें इज़ाज़त दे दी कि हम लोग खाली घंटों में उनके पास आ सकते हैं | फिर ये लगभग रोज़ का नियम बन गया | कभी ग्रामर , कभी कविता और कभी गद्य , बारी बारी से हम लोगों को जो भी वो बता सकते थे , सब बताया | बाद में तो उनका उत्साह हम लोगों से भी ज्यादा बढ़ गया था और सप्ताह का शायद ही कोई दिन था जब हम लोग कुछ न सीखतें हों |
आज जो कुछ भी टूटी फूटी अंग्रेजी आती है , उसमे उनका सबसे बड़ा योगदान है | और आज ये भी महसूस होता है कि किसी अध्यापक के लिए शायद इससे बड़ी ख़ुशी कि बात और कोई नहीं होती कि कोई बच्चा सच में उनके पास सीखने के लिए आये | उस गुरु का नाम था श्री छविनाथ सिंह | आज शिक्षक दिवस पर उनको सादर नमन |

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