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Wednesday, September 23, 2015

यक़ीन--

" लड़की होकर बाहर काम करेगी , यही दिन देखने बाक़ी थे ", दादी की ये आवाज़ जब से कानों में पड़ी थी तब से परेशान थी सकीना | अब्बू के इंतकाल के बाद घर की माली हालत जर्जर हो चुकी थी और उस सदमे में अम्मी का सिलाई का काम भी ठप हो चला था | वो तो अब्बू ने दादी के तमाम विरोध के बाद भी उसको पढ़ाया था जिससे वो आत्मनिर्भर हो सके |
" बाहर की दुनियाँ बहुत खराब है और तू लड़की है ", दादी का विरोध जारी था | 
" दादी , बाहर की चुनौतियों से जूझने की शक्ति अब्बू ने दी है मुझे , बस मुझ पर यक़ीन रखो "| 
दादी ने सकीना की आँखों में देखा , उसमे उन्हें अपने मरहूम बेटे का अक्स दिखाई दिया | उनके हाथों की सख़्त पकड़ ढीली पड़ने लगी , सकीना ने मुस्कुराते हुए उनके माथे को चूम लिया |

रस्म-

" भाभी , बहुत अच्छी साड़ी है ये | आप लोग कितना ध्यान रखते हैं मेरा ", छोटी बहन ने दोनों हाथों से साड़ी लेते हुए कहा तो अम्मा के सामने पिछले साल का दृश्य घूम गया |
" ऐसी साड़ी तो मेरे यहाँ कामवाली भी नहीं पहनती , रखिये अपने पास | राखी बाँधने आई हूँ तो रस्म अदायगी करने लगी आप ", और साड़ी को छुआ तक नहीं बड़ी बहन ने | बड़ी मुश्किल से भैया ने उनको २५०० देकर मनाया था |
छोटी ने आकर अम्मा का पैर छुआ और धीरे से ५०० निकाल कर उनके हाँथ में रख दिया | काश बाबूजी होते , सोचते हुए अम्मा की आँख भर गयी | लेकिन उनको अपनी छोटी बेटी गरीब घर में होते हुए भी बहुत अमीर लग रही थी |

फ़ौज़ी--

मारिया के साथ सभी बच्चों के हाँथ भी प्रार्थना में जुड़े थे | वो सब हस्पताल में जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहे अपने धर्म पिता के लिए दुआ कर रहे थे | 
उसने मारिया को बाढ़ प्रभावित क्षेत्र से बचाया था और फिर वो उसकी जीवन रेखा बन गयी थी | फिर मारिया ने भी उसी धर्म को अपनाया , अनाथ और बेघर बच्चों को आश्रय देने का | उसके अनाथालय में पलने वाले बच्चों को मारिया और उसके धर्म पिता ने कभी भी माँ बाप की कमी नहीं महसूस होने दी थी | 
फोन की घंटी बजने पर मारिया वर्तमान में लौटी , अपनी जिंदगी के तमाम ज़ंग जीतने वाला उसका धर्म पिता आज जीवन की ज़ंग भी जीत गया था |

मन का अँधेरा -

" कुछ मदद कर दूँ " सामने उस बैसाखी सँभालते युवक को देखते ही निकल गया उसके मुँह से|
" मैं रख लूंगा सब सामान, शुक्रिया ", उसने दृढ़ता से जवाब दिया|
फिर उसे लगा की शायद ज्यादा ही रुखा जवाब हो गया तो नरमी से बोला " मुझे कोई दिक्कत नहीं होती है, बिलकुल आराम से सब कुछ कर लेता हूँ| शायद आपको लगा होगा कि मैं ये सब कैसे कर पाउँगा "|
" जी हाँ , मुझे यही लगा था, दरअसल आदत सी पड़ गयी है ऐसे लोगों को मदद की याचना करते हुए देख कर "|
" जब तन के बदले मन में अँधेरा हो तो ऐसा ही होता है| बहरहाल ऐसे लोगों की वज़ह से कभी किसी जरूरतमंद की मदद करने से पीछे मत हटियेगा "|
बैसाखी संभाले एक खुशनुमा रौशनी बिखेरता वो आगे बढ़ गया|

हिंदुस्तान की खोज़--

" बहुत बहुत बधाई इस प्रतिष्ठित पुरस्कार के लिए , क्या गज़ब का चित्र खींचा आपने और श्वेत श्याम में तो अद्भुत लग रहा है | ऊपर से ये बेहतरीन शीर्षक " हिंदुस्तान की खोज़ "| 
" एक महानगर में रहने वाले के लिए ऐसे चित्रों की कल्पना करना भी दुरूह है और आपने तो इसे जीवंत ही कर दिया ", किसी और ने हाँथ पकड़कर कहा | 
" शुक्रिया आप सब का , बस कोशिश की थी गाँवों की हक़ीक़त सामने लाने की ", मुस्कुराते हुए उन्होंने सबको धन्यवाद दिया |
मन ही मन वो अपने बेटे को धन्यवाद दे रहे थे जिसने उनसे अपने गाँव चलने की ज़िद की थी और वहां पर उन्होंने पिताजी की अखबार पढ़ती तस्वीर खींच ली थी |

रिश्ता--

" सोच रहा हूँ बेटे के यहाँ हो लूँ , तुम भी चलोगी ना ", जवाब जानते हुए भी उन्होंने पूछा |
" तुम ही चले जाओ , मेरा मन नहीं है ", मन ही मन पोते को देखने की जबरदस्त इच्छा के बावजूद उसने मना कर दिया | 
" ठीक है , तब मैं ही चला जाता हूँ ", कह तो दिया उन्होंने लेकिन पिछली बार का दृश्य आँखों के सामने घूम गया |
" आगे से ये लोग आएंगे तो सर्वेंट क्वार्टर में ही ठहराना , कोई सलीका नहीं हैं इनको , पूरा कार्पेट बर्बाद कर दिया ", बहू की आवाज़ आई और घर में सन्नाटा छा गया | 
रात में काफी देर से बेटा आया और उसने खाट पर पैताने बैठ कर इतना ही कहा " पिताजी , मैंने कहा था ना कि इतने ऊँचे घर में रिश्ता मत जोड़ो "|

नया क़दम--

" तुम्हारी लिखी सारी चिट्ठियाँ ले आया हूँ , बहुत चाह के भी उन्हें जला नहीं पाया । सोचा डाकिये का वेश ही बना के चलूँ , पुराने दिन याद आ जायेंगे ", और वो मुड़ कर वापस चलने लगा । 
" रुको , मुझे भी कुछ लौटाना है तुम्हे । अब तो अकेली जिन्दगी में यही सहारा था लेकिन जब तुम सब लौटा रहे हो तो मुझे भी इन्हें रखने का हक़ नहीं है ", और वो भी अंदर से एक पैकेट ले आई । 
पैकेट ले कर वो वापस मुड़ा , लेकिन क़दमों ने साथ नहीं दिया । 
" क्या अब हम साथ जिंदगी जी सकते हैं ", और सहमति में सर हिलते ही उसने नयी ज़िन्दगी की तरफ क़दम बढ़ा दिया ।