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Wednesday, September 23, 2015

नया क़दम--

" तुम्हारी लिखी सारी चिट्ठियाँ ले आया हूँ , बहुत चाह के भी उन्हें जला नहीं पाया । सोचा डाकिये का वेश ही बना के चलूँ , पुराने दिन याद आ जायेंगे ", और वो मुड़ कर वापस चलने लगा । 
" रुको , मुझे भी कुछ लौटाना है तुम्हे । अब तो अकेली जिन्दगी में यही सहारा था लेकिन जब तुम सब लौटा रहे हो तो मुझे भी इन्हें रखने का हक़ नहीं है ", और वो भी अंदर से एक पैकेट ले आई । 
पैकेट ले कर वो वापस मुड़ा , लेकिन क़दमों ने साथ नहीं दिया । 
" क्या अब हम साथ जिंदगी जी सकते हैं ", और सहमति में सर हिलते ही उसने नयी ज़िन्दगी की तरफ क़दम बढ़ा दिया ।

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