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Friday, November 6, 2015

हल--

सबके चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ़ साफ़ दिख रही थी , चुनाव एकदम सर पर थे और कोई ठोस मुद्दा नहीं मिल रहा था उन लोगों को । कई प्रस्ताव दिए वहाँ मौजूद लोगों ने लेकिन सब सिरे से खारिज़ कर दिया रज्जब मियाँ ने । 
" काश , थोड़ा माहौल बिगाड़ पाते हम लोग तो हमारे पक्ष में लहर होती लेकिन अपने ही मोहल्ले के चचाजान सारा खेल ख़राब कर दे रहे हैं । अब उनको कौन समझाए की आज भाई चारा का समय नहीं रहा ", रज़्ज़ब मियाँ खौल रहे थे । 
" तो फिर क्या किया जाये , उनको समझाना तो नामुमकिन सी बात है । कुछ और सोचना होगा हमें "।
" समझा नहीं सकते तो क्या , खामोश तो कर सकते हैं न । और उनके शरीर को उन लोगों के इलाके में डाल देना , एक तीर से दो शिकार हो जायेंगे "।
अचानक वहाँ मौज़ूद लोगों के चेहरे तनावमुक्त नज़र आने लगे ।

पछतावा--

राज रोज ख़बरें आ रही थीं , फलाँ , फलाँ ने फलाँ पुरस्कार लौटाया और उसके बाद अखबार और टी वी पर उनकी फोटो और गर्मागर्म चर्चा | उनमें से कई लोगों का तो उन्होंने नाम भी नहीं सुना था , अब पता चला उनको कि इनको भी फलाँ पुरस्कार मिला था | चच्चा सोच रहे थे कि काश हमें भी मिला होता तो आज हम भी ! 
अचानक उनको याद आया और जल्दी जल्दी अलमारी खंगालने लगे कि इतने में चाची आ गयीं | 
" क्या ढूँढ रहे हो अलमारी में आज , कुछ हेरा गया है का ?
" अरे तुम नहीं समझोगी , एक ठो सर्टिफिकेट था पहले का , वही ढूँढ रहे थे | पता नहीं कहाँ चला गया "|
" अबहीं कुछ दिन पहिले ही कुछ रद्दी कबाड़ी को बेचा था इसमें से निकाल कर , कहीं उसी में तो नहीं चला गया ?
" रहोगी गँवार की गँवार ही , बिना पूछे काहें बेच दिया कबाड़ी को ", और चच्चा बिगड़ते हुए कबाड़ी के दुकान की ओर भागे |
" अरे सजीवन , हमरे घर से कुछ कबाड़ी लाये थे का ? चच्चा के सवाल पर सजीवन ने सर उठाया और थोड़ा सोच कर हाँ में सर हिला दिया |
" कहाँ रक्खे हो उसको , एक ठो बहुत जरुरी सर्टिफिकेट था उसमें | जरा खोज देते तो बहुत मेहरबानी होती ", चच्चा गिड़गिड़ाने लगे |
" देखो चच्चा , इहाँ जो कुछ आता है उ सब कहीं भी फेंका जाता है और फिर ट्रक में लाद कर बाहर भेज दिया जाता है | अब कहाँ ढूँढ पाएंगे उसको , वैसे था क्या उसमें चच्चा ?
चच्चा बिना जवाब दिए वापस चल दिए | कैसे बताते कि बाकी लोगों की तरह उनके मन में भी उस सर्टिफिकेट को वापस करके मशहूर होने की चाहत हिलोरें मार रही थी जो कभी उनको कविता पाठ के लिए मिला था |

Wednesday, September 30, 2015

गाँव के मंजर--

हमसे ये गाँव के मंजर नहीं देखे जाते
हो रहे खेत जो बंजर , नहीं देखे जाते
सुना था हुक्मरानों को , करेंगे गाँव की सेवा
छुपा था बातों में खंजर , नहीं देखे जाते
सिकुड़ती जा रही नदियाँ , नहीं हैं पानी के सोते
है बहता खूब समंदर , नहीं देखे जाते
जो होती थी कभी गुलज़ार , हमारे गांव की बस्ती
वहीँ उजड़े हुए अब घर , नहीं देखे जाते
हमसे ये गाँव के मंजर नहीं देखे जाते
हो रहे खेत जो बंजर , नहीं देखे जाते !!

Wednesday, September 23, 2015

हौसलों के गुब्बारे--

उस दिन बादल तो सुबह से ही घुमड़ रहे थे लेकिन बरसात शायद न हो सोचते हुए रग्घू निकल पड़ा था अपने रंगीन गुब्बारों और भेल के साथ | गुब्बारे क्या थे , वो तो रंगबिरंगे सपने बेचता था | वो सपने जो वो अपने बच्चों के लिए भी देखता था और जो बाक़ी बच्चे भी उसके गुब्बारे देखकर देखते थे | 
अचानक भगदड़ मच गयी समुद्र तट पर , भयानक ज्वार के चपेट में आकर कोई डूब रहा था और लोग चिल्ला रहे थे । रग्घू ने एक पल भी नहीं लगाया और गुब्बारों को हवा में छोड़ कूद गया उसे बचाने के लिए । पर लहरें तेज़ निकलीं और रग्घू भी उसके साथ समां गया समंदर में । 
अब लोगों को कभी कभी , भयानक ज्वार के समय , दूर समंदर के किनारे हांथों में गुब्बारे और दिल में हौसला लेकर खड़ा रग्घू दिख जाता है ।

आज़ादी की कीमत--

सिग्नल पर रुकते ही एक बच्चा झंडे लेकर आ गया | जल्दी से उसने कार का शीशा चढ़ाया और सर दूसरी तरफ घुमा लिया , लेकिन बच्चे ने शीशे पर दस्तक दी और उम्मीद भरी निगाहों से देखने लगा | 
पिज़्ज़ा खाती हुई बेटी ने कहा " पापा , ले लो न झण्डा , स्कूल में ले जाउंगी "| 
उसने बच्चे को आने का इशारा किया और २ झण्डा लेकर ५ का सिक्का उछाल दिया बच्चे की तरफ | बच्चा कुछ कहे उसके पहले ही सिग्नल हरा हो गया और उसने तुरंत कार आगे बढ़ा ली | उसने साइड मिरर में देखा, बच्चा सड़क के किनारे से सिक्का उठा रहा था और कार में ऍफ़ एम पर गाना बज रहा था " मेरे देश की धरती "|

अलग पीढ़ी--

कड़क इस्त्री किया हुआ धवल कुर्ता पैजामा , सफ़ेद एडिडास का जूता और आँखों पर रेबैन का काला चश्मा लगाकर परफ्यूम छिड़कते हुए वो बाहर निकल रहा था । आज फिर किसी चुनावी सभा में भाषण देना था उसको । 
कमरे में खटिया पर धोती और बंडी में लेटे पिताजी ने उसे जाते देखा और अपने स्वतंत्रता संग्राम के दिनों की याद में डूब गए , जब गाँधीजी के आह्वान पर उन्होंने सिर्फ धोती कुर्ता में सादगी से जीवन बिताने का फ़ैसला कर लिया था ।

सहमति--

" अगर उसने मेरी बात नहीं मानी तो मैं आगे से उससे बात नहीं करुँगी | हमारा लड़का ही ऐसा काम करेगा, विधर्मी से शादी "? 
" क्यूँ , अब क्या हो गया | बचपन में तो बस उसका मुँह खुलने की देरी होती थी और तुम हर इच्छा पूरी कर देती थी "| 
" वो तो उसकी ख़ुशी के लिए कर देती थी , लेकिन क्या उसे हमारी ख़ुशी की परवाह नहीं रही | आज तक हमारे खानदान में ऐसा नहीं हुआ ", कहते कहते उसकी आँखों से आंसू टपक पड़े |
" वही तो मैं भी कह रहा हूँ , उसकी ख़ुशी के लिए ही अब भी कर दो | वैसे भी वो हमारा ध्यान रखने में कोई कमी नहीं रखता है "|
उन्होंने धीरे से उनका हाँथ अपने हाँथ में पकड़ लिया और उनके आंसू पोंछ दिए | सहमति मिल चुकी थी |