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Wednesday, September 30, 2015

गाँव के मंजर--

हमसे ये गाँव के मंजर नहीं देखे जाते
हो रहे खेत जो बंजर , नहीं देखे जाते
सुना था हुक्मरानों को , करेंगे गाँव की सेवा
छुपा था बातों में खंजर , नहीं देखे जाते
सिकुड़ती जा रही नदियाँ , नहीं हैं पानी के सोते
है बहता खूब समंदर , नहीं देखे जाते
जो होती थी कभी गुलज़ार , हमारे गांव की बस्ती
वहीँ उजड़े हुए अब घर , नहीं देखे जाते
हमसे ये गाँव के मंजर नहीं देखे जाते
हो रहे खेत जो बंजर , नहीं देखे जाते !!

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