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Tuesday, February 16, 2016

अच्छे दाग--

" नहीं डॉक्टर, मुझे ये दाग़ नहीं मिटवाने। कुछ गलतियाँ भूलनी नहीं चाहिए और खास कर ऐसी गलतियाँ", अपने चेहरे को आइने में देख कर एक बार तो वो खुद सिहर गयी थी लेकिन फिर उसने अपने आप को मजबूत किया। क्या किसी पर भरोसा करना गलती थी, शायद नहीं। लेकिन कुछ तो उसने भी गलती की ही थी।
रोज वो उसी स्टॉप से कॉलेज के लिए बस पकड़ती थी और वो उसको शायद कई महीनों से देखता था। खूबसूरत थी ही और उसकी तारीफ सुनकर समझ नहीं पायी और उसे अपना दोस्त समझ कर उससे सब कुछ साझा करने लगी। वो भी उसे हर चीज में प्रोत्साहित करता और उसे लगता कि एक सच्चा हमदर्द मिल गया है। एक दिन बातों बातों में ही उसने अपने प्यार का इज़हार कर दिया। उसने उसको समझाने की कोशिश की, अपने सपने के बारे में याद दिलाया जो उनका साझा सपना हुआ करता था। लेकिन अब उसका असली रंग सामने आने लगा और वो उसको इग्नोर करने लगी।
उसे याद आया उसका मैसेज " तुम अगर मेरी नहीं हुई तो मैं किसी और की होने लायक नहीं छोड़ूंगा "। उसे कुछ दिन डर तो लगा लेकिन फिर वो अपने सपने को पूरा करने में सब भूलती गयी। उसे देखकर भी अनदेखा करती और अपने काम में डूबती गयी। और फिर दो दिन पहले की घटना, बाइक बगल से गुजरी और जब तक कुछ समझती, उसका चेहरा एक तरफ से जलने लगा था।
एक बार फिर उसने अपना चेहरा आईने में देखा, अब वो दाग उसे कम डरावना लग रहा था। हाँ वो उसे अपने सपने को हर हाल में पूरा करने की हिम्मत जरूर दे रहा था। सामने टी वी पर विज्ञापन आ रहा था " दाग अच्छे हैं "।

Monday, February 8, 2016

मन का रोग--

आखिर ये बात उनके दिमाग में आ क्यूँ रही है, हमेशा तो उन्होंने इन चीजों का विरोध ही किया है| अपने कार्यालय में कितना कुछ किया है उन्होंने इस भेदभाव को मिटाने के लिए और अब तो लगभग हर कर्मचारी एक साथ ही बैठकर लंच करता है| किसी के भी जाति और मजहब से उनको तो कोई भी फ़र्क़ नहीं पड़ता था तो फिर आज ये उलझन क्यूँ?
दोपहर में लंच के बाद जब ऑफिस का जमादार उनके पास आया और उनसे एक प्रार्थना की तो उनको थोड़ा अजीब लगा| हामी तो तुरंत भर दी उन्होंने लेकिन उसके जाने के बाद सोच में पड़ गए| इस बारे में तो कभी सोचा ही नहीं था उन्होंने कि कभी अपने कार्यालय के जमादार के यहाँ भी खाना खाने जाना पड़ेगा| शायद उसको तो उन्होंने मनुष्य की गिनती में ही नहीं रखा था, या ये उनके पालन पोषण का असर था| बचपन से ही जो संस्कार डाले गए थे वो कहीं न कहीं अचेतन में अब भी पड़े हुए थे और आज अपना रंग दिखा रहे थे|
घर पर सोफे पर लेटे हुए ये सब उनके दिमाग में चल रहा था कि उनकी नज़र सामने चल रहे टी वी कार्यक्रम पर पड़ी| कुष्ठ रोगियों के बारे में कार्यक्रम था उसमे और एक डॉक्टर का ये कहना कि ये रोग शरीर से ज्यादा आत्मा को गला देता है, उनके मस्तिष्क को झिंझोड़ गया| उन्होंने भी तो अपना शरीर इस भेदभाव से मुक्त कर लिया है लेकिन आत्मा शायद आज भी इस रोग से गल रही है|
उन्होंने अपनी आत्मा को भी इस रोग से मुक्त करने का निर्णय ले लिया और जमादार के घर की ओर चल पड़े|

Sunday, February 7, 2016

रामराज्य--

" सर, आज तो कुछ भी नहीं है ऐसा जिसे ब्रेकिंग न्यूज़ में चला सकें। कल वाली ही दोहरा दी जाए"।
" कल वाली, अरे वो तो न्यूज़ भी नहीं रही अब। खोजो, आज कहीं तो कुछ हुआ होगा"।
" सुबह से शाम हो गयी सर, कुछ भी नहीं मिला"।
" कोई तो मर्डर हुआ होगा, कोई रेप, डकैती, आत्महत्या, अपहरण, कुछ भी"।
" सर, कोई वारदात नहीं हुई है आज। यहाँ तक कि किसी नेता या अभिनेता ने कोई विवादित बयान भी नहीं दिया है"।
आख़िरकार ख़बर मिल ही गयी, सत्ता पक्ष के नेता ने एक बयान दिया कि हमारा शहर अब शांति के मार्ग पर चल रहा है, रामराज्य की स्थापना हो रही है। और विपक्ष के नेता ने इसे साम्प्रदायिक बयान बताते हुए कहा कि ये सरकार अल्पसंख्यकों के हित की रक्षा करने में असमर्थ है।
ब्रेकिंग न्यूज़ चल रही थी, शहर का वातावरण तनावपूर्ण होने लगा था।

अपने हिस्से की ख़ुशी--

" हेलो, हेलो ", उधर से कोई आवाज़ नहीं आ रही थी। उसने थोड़ी देर तक फोन हाथ में पकडे रखा और रख दिया। वापस जा कर सोफे पर बैठ गयी और उसकी आँख से कुछ बूँद टपक गए। शर्माजी ने अंदर घुसते ही समझ लिया था कि आज फिर उसकी बात नहीं हो पायी है। उन्होंने उसके कंधे को धीरे से दबाया और उसकी तरफ़ देख कर धीरे से मुस्कुरा दिए।
" चलो आज पार्क में घूम आते हैं, कितना प्यारा मौसम है", कहते हुए उन्होंने जूते पहनने शुरू कर दिए। वो अभी भी शून्य में देखती चुपचाप बैठी थी जैसे कुछ सुना ही न हो।
" अरे चलो भी, घूमने के बाद बाहर ही कुछ खा के लौटेंगे", कहते हुए शर्माजी ने उसको उठाना चाहा।
" आखिर मेरा कुसूर क्या है, क्यों नहीं मुझसे बात करता वो"।
" होता है ऐसा, बच्चे बड़े हो जाते हैं तो उनको थोड़ी आज़ादी चाहिए होती है। और शादी के बाद तो और जरुरी होता है उनको उनका स्पेस देना, इसीलिए हमेशा समझाता था तुमको कि बहू के सामने ज्यादा बेटे की दिनचर्या में दख़ल मत दो। खैर छोड़ो इसको और चलो घूम आते हैं"।
" मुझे अब कुछ अच्छा नहीं लगता है, अकेले समय बिताना तो जैसे सजा हो गयी है। क्या गलती की थी मैंने की अब मुझसे बात भी नहीं करता वो"।
" आज एक महीना होने को आ गया और तुम अभी भी उबर नहीं पा रही हो। दुःख मुझे भी होता है लेकिन जीना तो पड़ता ही है ना"।
" मुझे नहीं जाना बाहर, मुझे सच में कुछ अच्छा नहीं लगता अब", कहते हुए वो एक बार फिर सुबकने लगी।
थोड़ी देर तक तो चुप्पी छायी रही और दोनों खामोश थे। फिर शर्माजी ने उसका सर उठाया और पूछा " अच्छा ये बताओ कि अब मेरी गलती क्या है"।
उसने शर्माजी के चेहरे को अब गौर से देखा, शायद उम्र के बीसेक वर्ष ज्यादा दिख रहे थे उसपर। उसे एक झटका सा लगा, वो तो आँसू बहा के दिल हल्का कर लेती है लेकिन शर्माजी तो वो भी नहीं कर पाते। अब उसके मन का दुःख पछतावे में बदलने लगा, आखिर शर्माजी का ध्यान तो उसे ही रखना है। वो धीरे से उठी और कपड़े बदलने कमरे में चली गयी। आज उसे शर्माजी की पसन्द की पीली साड़ी पहननी थी, बाहर जो घूमने जाना था।
    

Wednesday, February 3, 2016

ख़याली आज़ादी

"हद है ये तो, दुकान खोल ली है, तमाम ग्राहकों से बात करना है पर शरीर पर बुर्का पड़ा हुआ है| पता नहीं कब मिलेगी इनको आज़ादी इन सब से", बोलते हुए वो बिल का भुगतान करने के लिए काउंटर पर खड़ी महिला के पास जाने लगा| साथ चल रही पत्नी, जो किसी कार्यालय में काम करती थी, की निगाह अचानक एक अच्छे ड्रेस पर गयी और वो लपक कर उसे उठा लायी|
"ये क्या उठा लायी, कुछ भी पूछने की जरुरत नहीं, बस ले लिया जो मन आया| रखो इसको वहीँ पर, जहाँ से लायी थी", बोलते हुए वो सामान काउंटर पर रख कर बिल का इंतज़ार करने लगा|
पत्नी के चेहरे पर कई रंग आये और गए| उसने ड्रेस को वापस रखकर लौटते हुए एक बुर्का उठा लिया, अपने अदृश्य बुर्क़े से तो वो बेहतर लग रहा था उसको|

Monday, February 1, 2016

जीवन--

एक और धमाका कर चुका था वो और फिर से अपने खोल में छुप जाने के लिए निकल गया। इस बार भी कई जाने गयी थीं और काफी तबाही भी हुई थी, और उसे अगले आदेश तक छुप कर रहना था। क्यूँ कर रहा था वो ऐसा, किसलिए बेगुनाह इन्सानों का क़त्ल कर रहा था, उसे याद नहीं था। बस इतना पता था कि अपने धर्म के लिए उसे ये सब करना है।
उसका भी एक गाँव था, थोड़े खेत थे और वो अपने पिता के साथ संतुष्ट जीवन बिता रहा था। फिर माहौल बिगड़ने लगा और एक दिन उसके पिता की मौत की खबर उसे मिली। कुछ लोग घर आये और उसको बताया कि आतंकवादी होने के संदेह में उसके पिता को मार दिया गया है। फिर उन लोगों की आवाजाही बढ़ गयी और उसे पता भी नहीं चला कब वो उनके साथ इन वारदातों में शामिल हो गया।
अचानक उसकी नज़र दो बच्चों पर पड़ी जो बरसात में भी पेड़ों को पानी दे रहे थे। वो एकदम से ठिठक कर रुक गया, ये क्या कर रहा है वो। एकतरफ ये बच्चे हैं जो पेड़ों को भी जीवन दे रहे हैं, और दूसरी तरफ वो ?
अब वो भी बच्चों की तरफ बढ़ा और पानी देने मे हाथ बटाने लगा।

Friday, January 29, 2016

माँ--

ख्वाबों में भी रात को, जब मैं सिहर जाता हूँ
दिल की हर धड़कन से ,माँ तुझे ही बुलाता हूँ

जब भी गुजर जाती है , नर्म हवा सर से मेरे
महसूस करता हूँ , तेरा हाथ सर पे पाता हूँ

जब भी छाती हैं घटाएँ, दिखता है इंद्रधनुष
लगता है तेरा आँचल , छू के खिलखिलाता हूँ

जब भी चाहूँ दुनियाँ जहान की खुशियाँ पाना
तेरी हथेलियों की रेखाओं से, गुजर जाता हूँ

कोशिशें लाख कर लूँ बेहिसाब खुश दिखने की
कैसे जान लेती है दर्द मेरा, नहीं समझ पाता हूँ

यक़ीनन बड़ा क़द है मेरा, लोगों की निगाहों में
पर तेरी निगाहों में माँ ,बच्चा ही नज़र आता हूँ !!