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Sunday, February 7, 2016

अपने हिस्से की ख़ुशी--

" हेलो, हेलो ", उधर से कोई आवाज़ नहीं आ रही थी। उसने थोड़ी देर तक फोन हाथ में पकडे रखा और रख दिया। वापस जा कर सोफे पर बैठ गयी और उसकी आँख से कुछ बूँद टपक गए। शर्माजी ने अंदर घुसते ही समझ लिया था कि आज फिर उसकी बात नहीं हो पायी है। उन्होंने उसके कंधे को धीरे से दबाया और उसकी तरफ़ देख कर धीरे से मुस्कुरा दिए।
" चलो आज पार्क में घूम आते हैं, कितना प्यारा मौसम है", कहते हुए उन्होंने जूते पहनने शुरू कर दिए। वो अभी भी शून्य में देखती चुपचाप बैठी थी जैसे कुछ सुना ही न हो।
" अरे चलो भी, घूमने के बाद बाहर ही कुछ खा के लौटेंगे", कहते हुए शर्माजी ने उसको उठाना चाहा।
" आखिर मेरा कुसूर क्या है, क्यों नहीं मुझसे बात करता वो"।
" होता है ऐसा, बच्चे बड़े हो जाते हैं तो उनको थोड़ी आज़ादी चाहिए होती है। और शादी के बाद तो और जरुरी होता है उनको उनका स्पेस देना, इसीलिए हमेशा समझाता था तुमको कि बहू के सामने ज्यादा बेटे की दिनचर्या में दख़ल मत दो। खैर छोड़ो इसको और चलो घूम आते हैं"।
" मुझे अब कुछ अच्छा नहीं लगता है, अकेले समय बिताना तो जैसे सजा हो गयी है। क्या गलती की थी मैंने की अब मुझसे बात भी नहीं करता वो"।
" आज एक महीना होने को आ गया और तुम अभी भी उबर नहीं पा रही हो। दुःख मुझे भी होता है लेकिन जीना तो पड़ता ही है ना"।
" मुझे नहीं जाना बाहर, मुझे सच में कुछ अच्छा नहीं लगता अब", कहते हुए वो एक बार फिर सुबकने लगी।
थोड़ी देर तक तो चुप्पी छायी रही और दोनों खामोश थे। फिर शर्माजी ने उसका सर उठाया और पूछा " अच्छा ये बताओ कि अब मेरी गलती क्या है"।
उसने शर्माजी के चेहरे को अब गौर से देखा, शायद उम्र के बीसेक वर्ष ज्यादा दिख रहे थे उसपर। उसे एक झटका सा लगा, वो तो आँसू बहा के दिल हल्का कर लेती है लेकिन शर्माजी तो वो भी नहीं कर पाते। अब उसके मन का दुःख पछतावे में बदलने लगा, आखिर शर्माजी का ध्यान तो उसे ही रखना है। वो धीरे से उठी और कपड़े बदलने कमरे में चली गयी। आज उसे शर्माजी की पसन्द की पीली साड़ी पहननी थी, बाहर जो घूमने जाना था।
    

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