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Monday, February 8, 2016

मन का रोग--

आखिर ये बात उनके दिमाग में आ क्यूँ रही है, हमेशा तो उन्होंने इन चीजों का विरोध ही किया है| अपने कार्यालय में कितना कुछ किया है उन्होंने इस भेदभाव को मिटाने के लिए और अब तो लगभग हर कर्मचारी एक साथ ही बैठकर लंच करता है| किसी के भी जाति और मजहब से उनको तो कोई भी फ़र्क़ नहीं पड़ता था तो फिर आज ये उलझन क्यूँ?
दोपहर में लंच के बाद जब ऑफिस का जमादार उनके पास आया और उनसे एक प्रार्थना की तो उनको थोड़ा अजीब लगा| हामी तो तुरंत भर दी उन्होंने लेकिन उसके जाने के बाद सोच में पड़ गए| इस बारे में तो कभी सोचा ही नहीं था उन्होंने कि कभी अपने कार्यालय के जमादार के यहाँ भी खाना खाने जाना पड़ेगा| शायद उसको तो उन्होंने मनुष्य की गिनती में ही नहीं रखा था, या ये उनके पालन पोषण का असर था| बचपन से ही जो संस्कार डाले गए थे वो कहीं न कहीं अचेतन में अब भी पड़े हुए थे और आज अपना रंग दिखा रहे थे|
घर पर सोफे पर लेटे हुए ये सब उनके दिमाग में चल रहा था कि उनकी नज़र सामने चल रहे टी वी कार्यक्रम पर पड़ी| कुष्ठ रोगियों के बारे में कार्यक्रम था उसमे और एक डॉक्टर का ये कहना कि ये रोग शरीर से ज्यादा आत्मा को गला देता है, उनके मस्तिष्क को झिंझोड़ गया| उन्होंने भी तो अपना शरीर इस भेदभाव से मुक्त कर लिया है लेकिन आत्मा शायद आज भी इस रोग से गल रही है|
उन्होंने अपनी आत्मा को भी इस रोग से मुक्त करने का निर्णय ले लिया और जमादार के घर की ओर चल पड़े|

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