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Friday, January 29, 2016

माँ--

ख्वाबों में भी रात को, जब मैं सिहर जाता हूँ
दिल की हर धड़कन से ,माँ तुझे ही बुलाता हूँ

जब भी गुजर जाती है , नर्म हवा सर से मेरे
महसूस करता हूँ , तेरा हाथ सर पे पाता हूँ

जब भी छाती हैं घटाएँ, दिखता है इंद्रधनुष
लगता है तेरा आँचल , छू के खिलखिलाता हूँ

जब भी चाहूँ दुनियाँ जहान की खुशियाँ पाना
तेरी हथेलियों की रेखाओं से, गुजर जाता हूँ

कोशिशें लाख कर लूँ बेहिसाब खुश दिखने की
कैसे जान लेती है दर्द मेरा, नहीं समझ पाता हूँ

यक़ीनन बड़ा क़द है मेरा, लोगों की निगाहों में
पर तेरी निगाहों में माँ ,बच्चा ही नज़र आता हूँ !!

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