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Thursday, September 22, 2016

असली श्रद्धा--लघुकथा

पिछले एक हफ्ते से सामने वाले मुन्नू के घर में खूब गहमा गहमी थी, रग्घू को पता था कि शहर में रहने वाले उसके दोनों भाई भी परिवार सहित आ गए हैं| अक्सर शांत रहने वाले घर में रौशनी खूब जगमगा रही थी| कभी कभी वो चला जाता था वहां और मुन्नू से होने वाले भोज के बारे में सुनता और वापस आ जाता| लेकिन पता नहीं क्यों उसके बाबू कभी भी मुन्नू के घर जाने का नाम नहीं लेते थे|
आज तो भोज का दिन था और सुबह से ही हलवाई तमाम तरह के पकवान बनाने में व्यस्त थे| रग्घू ने एक बार दरवाजे पर पड़ी खटिया पर लेटे बाबू को कहा कि वो जाकर मुन्नू के घर बैठ जाएँ, शायद उनकी कुछ मदद ही हो जाए, लेकिन बाबू टस से मस नहीं हुए| गाय को चारा देकर जब वो आया तो बाबू को वहीँ बैठे देखकर उसे थोड़ा गुस्सा आ गया|
उसने उनके पास जाकर झुंझलाते हुए कहा "पूरे गाँव में कहीं भी कुछ होता है तो आप मना करने के बाद भी पूरा पूरा दिन वहां लगे रहते हैं| और आज सामने है तो जाने का नाम ही नहीं लेते, आखिर बात क्या है", उसे लगा कि शायद मुन्नू से कभी कुछ कहासुनी हो गयी होगी|
"अरे बोला ना कि नहीं जाऊंगा वहां, तो तू समझता क्यों नहीं है", बाबू ने करवट बदल लिया|
"लेकिन बात क्या है, क्या मुन्नू से कुछ खट पट हो गयी आपकी| ठीक है अगर आप नहीं ही जाना चाहते हैं तो मैं चला जाता हूँ, आपका भी खाना लेते आऊंगा", रग्घू घर में जाते हुए कहा|
"मेरे लिए मत लाना खाना वहां से, मैं नहीं खा पाउँगा| तुम वजह जानना चाहते हो ना, तो बताता हूँ| अपने पिताजी के श्राद्ध के लिए ही ये सारा ताम झाम कर रहे हैं वो लोग, पर मुझे आज भी उनका खाट पर पड़े पड़े चिल्लाना याद आता है| उसके भाई तो शहर से कभी आये नहीं देखने और न उनको लेकर ही गए, लेकिन मुन्नू भी तो उनको हमेशा जानवरों की तरह ही रखता था| कितनी बार ही मैंने उनका कपडा बदला, उनको पानी पिलाया और दवा वगैरह दी| और जब मैंने मुन्नू से उनका ध्यान रखने के लिए कहा तो मेरे ऊपर ही भड़क गया कि अपने काम से काम रखें और उसके घर के मसले में दखल ना दें| मुझसे आज उनके मौत के उत्सव का भोज नहीं खाया जायेगा", बाबू ने अपनी आंख गमछे से पोंछ ली|
रग्घू ने आकर उनके कंधे पर हाथ रखा और उनको आस्वस्त करते हुए बोला "कोई बात नहीं, आप का खाना घर ही बनवा देता हूँ| लेकिन आपको अगर कभी भी लगे कि मैं आपका ध्यान रखने में कोई भी लापरवाही कर रहा हूँ तो मुझे कस के डांट देना"|
रग्घू घर में बाबू के खाने के लिए बोलने चला गया, बाबू ने एक बार आसमान की और देखा और मुन्नू के पिताजी से छमा मांग ली|

शहादत-- लघुकथा

"जल्दी खोलो टेलीविजन, कुछ बड़ा हादसा हुआ है, शायद अपने कुछ जवानों के मारे जाने की खबर है", उसने बैठक में घुसते हुए कहा| उसके सेक्रेटरी ने जल्दी से टी वी खोला और उस समय फ़्लैश हो रही ब्रेकिंग न्यूज़ में बस कैम्प पर हुए हमले की ही खबर आ रही थी| उसने जल्दी जल्दी कई चैनल बदले, सब जगह बस यही खबर चल रही थी| 
वहां बैठे सभी लोगों के चेहरे पर जैसे दर्द बरस रहा था, धीरे धीरे हमले में हताहत जवानों के नाम भी आने लगे थे| जैसे जैसे नाम आते जा रहे थे, सबकी ऑंखें भीग रही थीं| अब उन जवानों के बारे में भी खबर आने लगी थी कि कौन किस जिले या गाँव का है और कौन किस जाति या संप्रदाय का|
लगभग एक घंटे बीत गए, अब सभी हताहत जवानों के नाम पूरे हो चुके थे| हर व्यक्ति गुस्से और दुःख से एकदम भरा हुआ था और उन आततायियों को कोस रहा था जिन्होंने ये कायराना हमला किया था| इतने वो सोफे से उठा और रिमोट पटककर बाहर निकल गया, सेक्रेटरी भी पीछे पीछे बाहर आया| अभी सेक्रेटरी उससे कुछ कहता कि उसकी आवाज़ सुनाई दी "इतने जवानों में कोई भी अपने जिले का नहीं है| काश होता तो थोड़े से प्रयास और झूठी हमदर्दी से कितने वोट पक्के हो गए होते आने वाले चुनाव में"|

Tuesday, September 13, 2016

भागीदारी--लघुकथा

"देखिये बाबूजी, मैं फिर से कह रहा हूँ कि राजनीति में नहीं उतरूँगा| आखिर इतने बड़े कॉलेज में दाखिला इसके लिए तो नहीं लिया है मैंने, मैं भी कहीं बाहर जॉब करना चाहता हूँ", कॉलेज के लिए निकलते समय टोक दिए जाने से वो विचलित हो गया|
"आखिर क्यों बाहर जाना चाहता है, अपने देश में क्या कमी है", बाबूजी ने बिस्तर पर लेटे लेटे ही बोला|
"कमी, अरे कमी छोड़िये, कोई एक अच्छाई तो बताईये इस देश में| हर जगह बस भ्रष्टाचार, भाई भतीजावाद और गुंडागर्दी", उसने पलट के बोला|
"वो तो ठीक है, लेकिन कभी इसकी वजह भी टटोलने की कोशिश की है तुमने", बाबूजी ने समझाया|
"वजह तो ये आज के नेता और नौकरशाह ही हैं, आप भी तो राजनीति में थे, क्या मिला आपको", उसने उसी तरह तैश में बोला|
"हाँ, मैं भी राजनीति में था और मैंने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी| बस अपने लिए कभी कुछ नहीं किया क्योंकि मेरे लिए समाज सबसे पहले था| और अगर आज के नेता ऐसे हैं तो क्या इसमें तुम्हारा दोष नहीं है, क्यों नहीं तुम उनसे अलग होने की आकांक्षा रखते और जो चीजें तुम्हें तकलीफ दे रही हैं, उसके इलाज़ में भागीदारी करते", भावावेश में बाबूजी हांफने लगे|
उसके कदम रुक गए, उसने आगे बढ़कर बाबूजी को सहारा दिया और पानी का गिलास पकड़ा दिया|
"इस सहारे की मुझसे ज्यादा इस समाज को जरुरत है" बोलते हुए बाबूजी वापस लेट गए| उनकी बंद आँखों में अपने अधूरे सपने आज भी तैर रहे थे| 

Monday, September 12, 2016

इंसानी फितरत--लघुकथा

"क्या बात है, बहुत उदास हो, ये तो हमारे उदास होने का समय है", मुन्नू ने पुचकारते हुए भोली से पूछा|
"अरे तुम्हारे और हमारे में बहुत फ़र्क़ है, कम से कम तुम तो सबके लिए बराबर तो हो", भोली ने अनमने ढंग से जवाब दिया|
"हाँ, सही कहा, हम सबके लिए बराबर हैं, सब उतने ही बेरहमी से हमें काटते हैं| लेकिन तुम तो अधिकांश जगह पूजी जाती हो, फिर क्यों उदासी", मुन्नू ने थोड़े अचरज से कहा|
"पूज्यनीय, बस तभी तक, जब तक दूध है| उसके बाद तो हम तुमसे भी बुरी हालात में हो जाते हैं", भोली की आँखों में खौफ उतर आया|
"अच्छा तो क्या तुम भी, मुझे तो लगा सिर्फ हम ही कटते हैं", मुन्नू को आश्चर्य हो रहा था|
"तुम क्या जानो उस दर्द को जब हम उन्हीं घरों से खदेड़ दिए जाते हैं, जिनको हमने अपने दूध से सींचा होता है", भोली के आँखों से बूंदें छलक आयीं|
"वो दर्द तो हम भी झेलते हैं, कुछ घरों में तो हमारे दूध से भी बच्चे पलते हैं| वैसे इंसान तो अपने माँ बाप को भी ऐसी हालत में दूर फेंक देता है", मुन्नू ने एक आह भरी|
"एक और दंश हम झेलते हैं, हमारे चक्कर में कुछ लोग बेमौत भी मारे जाते हैं| लेकिन हमारी दशा वैसे ही रहती है, कम से कम तुम तो ऐसा दंश नहीं झेलते", भोली ने गहरी सांस लेते हुए कहा|
"हाँ, ये तो है, हम तो हर मज़हब के लोगों को एक समान स्वीकार्य हैं| कभी हमारे लिए जान नहीं जाती, बस हमारी जान जाती है" मुन्नू ने हामी में सर हिलाया|
"खैर, तुम तो अपने मालिक द्वारा उपयोगी समझ के बेचे जाते हो लेकिन हम तो बेकार समझ के| इसका दर्द बेहद सालता है" भोली अब एकदम उदास हो गयी थी|
"सही कहा, ये इंसानी फितरत है, बस अपना फायदा देखता है", मुन्नू ने दिलासा देते हुए कहा|
इतने में उसके रस्सी को पकड़कर मालिक खींचता हुआ चल पड़ा, भोली ने सर हिला कर उसे अलविदा कहा और फिर से उदास हो गयी|    

विसर्जन-- कहानी

"गणपति बप्पा मोरिया" की आवाज़ अबीर गुलाल और कानफाड़ू संगीत के बरसात के बीच गूंज रही थी, सड़क को निकलने वाले जुलुस ने पूरी तरह से जाम कर दिया था। किसी तरह बचते बचाते वो निकल रही थी कि एक गेंदे का फूल आकर छाती पर लगा और नज़र अनायास उस ट्रक की ओर चली गयी। भक्तों की भीड़ में दिख ही गया लखना, अपने साथियों के साथ बज रहे संगीत पर झूम रहा था, या नशे में, समझना मुश्किल था। घृणा से एक जलती निगाह उसने उसकी ओर फेंकी और जल्दी जल्दी आगे बढ़ने लगी। पता नहीं मेडिकल स्टोर भी खुला होगा या नहीं इसी चिंता में वो परेशान थी कि ये लखना भी मिल गया।
पूरी रात में बिना रुके बजने वाले संगीत ने उसके पिता के मर्ज को बढ़ा दिया था। घर पर दवा ख़त्म हो गयी थी और अब किसी तरह दवा लाकर उनको दे सके तो राहत मिले इसीलिए इस माहौल में भी वो घर से निकल पड़ी। पिछले कुछ सालों से उसके घर से सटे हुए प्लाट में ही सभी धार्मिक कार्यक्रम होने लगे थे। दरअसल वो प्लाट जिसका था वो विदेश में रहता था और उसने इन्वेस्टमेंट के हिसाब से उसे खरीद लिया था। लेकिन जब कई सालों तक उसने प्लाट पर कुछ नहीं बनवाया तो कुछ लोगों को वहां कुछ और सूझ गया और रातों रात वहां एक छोटा सा शिवलिंग निकल गया। फिर एक छोटा सा मंदिर और एक पीपल का पेड़ भी वहां खड़ा हो गया और धर्म की दुकान सज गयी| सालों तक शांत रहने वाला उसका इलाका अब ऐसे तत्वों से गुलज़ार रहने लगा जो दिन में तो धर्म के झंडाबरदार दीखते लेकिन शाम होते ही उनका धर्म बदल जाता| फिर गांजा, शराब और अन्य सभी नशे का सामान वहां इकट्ठा होते और देर रात तक यही दौर चलता रहता| शुरू में उसके पिता ने ऐतराज किया लेकिन उन लोगों ने कोई ध्यान नहीं दिया और बाद में धमकी देना आरम्भ हो गया| अब वो जगह एक तरह से उसके मालिक के हाथ निकल गयी और एक मुकदमा अपनी मौत मरने के लिए कचहरी में दाखिल हो गया था।
अब चाहे गणेश पूजा हो, दुर्गा पूजा हो या कुछ और, सारे पंडाल वहीं बनते थे। और लखना और उसकी टीम के लोग चंदा मांगने तो ऐसे आते थे जैसे कि उसने ही कुछ उधार लिया हो पूजा कमिटी से। एक बार तो जब उसके पिता ने मना किया तो इसी लखना ने एक आंख दबाते हुए कहा था कि जाने दो, अपने होने वाले रिश्तेदार से चंदा नहीं लेते हैं। और फिर उसने पिता को साफ़ शब्दों में बोल दिया था कि बिना किसी हुज्जत इनको चंदा दे दिया करें। पंडाल बनने में कई दिन लगते थे और लखना किसी न किसी बहाने उसके घर आ ही जाता था और फिर उसकी गन्दी नज़र। पता नहीं कितनी बार उसने पंडाल में प्रार्थना की होगी कि इस लखना की ऑंखें न रहें लेकिन उस जैसे की प्रार्थना तो मानव भी नहीं सुनते तो कोई और क्या सुने! अक्सर शाम को निकलते समय लखना नशे में धुत्त उसी पंडाल के आस पास मिल जाता और फिर वो कई मौत मरती हुई जाती आती।
मोहल्ले में बहुत से लोग समझते भी थे लेकिन एक तो धर्म की बात और दूसरे उन लफंगों के मुह कौन लगे, आखिर अधिकांश लोग लड़कियों के बाप थे। ऐसे में उनको बर्दास्त कर लेने के सिवा कोई चारा नहीं सूझता था। पिता से तो वो भूल कर भी कुछ नहीं कहती थी, उनका ब्लड प्रेसर वैसे ही हाई रहता था, अगर कुछ हो गया तो। इसी तरह सभी त्यौहार बीत रहे थे, रात रात भर बजते बेहद तेज संगीत और शोर उसके पिता को और बीमार बना देते थे। कई बार उसने सोचा कि पुलिस के पास जाए लेकिन पुलिस के बारे में उसने जो सुन रखा था, उसके चलते हिम्मत नहीं जुटा पायी| एकाध बार तो उसने शाम को पुलिस वालों को भी वहां धुआं उड़ाते देखा था| खुद लड़ने की हिम्मत वो जुटाना चाहती थी लेकिन कर नहीं पाती थी|
इन्हीं ख्यालों में डूबी हुई वो लगभग भागते हुए दुकान पहुंची जो भाग्य से खुली हुई थी। पिता की दवा लेकर जैसे ही वो मुड़ने को हुई, उसकी नज़र शेल्फ में रखे डिस्पोसेबल सिरिंज पर पड़ी। अक्सर उसे वो सिरिंज दिखती थी लेकिन कुछ सूझता नहीं था| आज मन में एक विचार कौंधा और उसकी ऑंखें चमक उठीं| उसने कांपते हाथों से एक सिरिंज उठाया और उसे लेकर जल्दी जल्दी वापस चल दी। जैसे जैसे वो आगे बढ़ रही थी, सिरिंज होने के बाद भी डर से उसका बदन काँप रहा था| फिर भी आज पहली बार वो उस जुलूस का हिस्सा बनना चाहती थी| जैसे ही उसकी नज़र उस ट्रक पर पड़ी जिसमें लखना सवार था, एक बार फिर उसका बदन सिहर उठा| लेकिन अंदर से हिम्मत जुटाते हुए उसने लखना को देखा और एक फीकी मुस्कान उसके चहरे पर आ गयी| लखना को जैसे लगा कि उसको उतर आने का इशारा मिला हो और वो नाचते हुए ट्रक से उतर गया। दोनों मुट्ठी में गुलाल लेकर झूमते हुए वो जैसे ही उसकी तरफ बढ़ा, उसने भी अपनी मुट्ठी मजबूत कर ली।
नशे में झूमता हुआ लखना उसके पास पहुंचा और उसने दोनों हाथों में लिया गुलाल उसकी ओर उड़ा दिया। अभी वो सोच ही रही थी कि अपने मुट्ठी में लिया सिरिंज वो उसकी आँखों में चुभो दे, तब तक लखना के साथियों ने भी उसको घेर लिया| चारो तरफ बज रहे शोर और उड़ते हुए गुलाल में उसकी मुट्ठी खुल ही नहीं पायी और उस भीड़ में वो फंस गयी। फिर अगले कुछ मिनट में तमाम हाथ उसके गाल और अन्य अंगों पर रेंग रहे थे| उसके मुट्ठी से सिरिंज पता नहीं कब छूट के गिर गयी और बस दवा की थैली उसके हाथ में बची थी|
ट्रक आगे बढ़ गया और वो सदमे के हालात में खड़ी थी| फिर हिम्मत जुटाकर वो जल्दी जल्दी घर की तरफ भागी, पिता को दवा देनी थी। चारो तरफ गणपति बप्पा की जय जयकार हो रही थी, लोग नाच गा रहे थे और लखना एक बार फिर जय जयकार करता हुआ ट्रक पर सवार हो गया| उसके कानों में गूंजता हुआ जयकारा उसके ह्रदय को बेध रहा था और उसके मुह से निकल गया "अगले बरस तू मत ही आ"। 

Saturday, September 10, 2016

विसर्जन--लघुकथा

"गणपति बप्पा मोरिया" की आवाज़ अबीर गुलाल और कानफाड़ू संगीत के बरसात के बीच गूंज रही थी, सड़क को निकलने वाले जुलुस ने पूरी तरह से जाम कर दिया था। किसी तरह बचते बचाते वो निकल रही थी कि एक गेंदे का फूल आकर छाती पर लगा और नज़र अनायास उस ट्रक की ओर चली गयी। भक्तों की भीड़ में दिख ही गया लखना, बज रहे संगीत पर झूम रहा था, या नशे में, समझना मुश्किल था। घृणा से एक जलती निगाह उसने उसकी ओर फेंकी और जल्दी जल्दी आगे बढ़ने लगी। पता नहीं मेडिकल स्टोर भी खुला होगा या नहीं इसी चिंता में वो परेशान थी कि लखना भी मिल गया।
पूरी रात में बिना रुके बजने वाले संगीत ने उसके पिता के मर्ज को बढ़ा दिया था। अब किसी तरह दवा लाकर उनको दे सके तो राहत मिले इसीलिए इस माहौल में भी वो घर से निकल पड़ी। पिछले कुछ सालों से उसके घर से सटे हुए प्लाट में ही सभी धार्मिक कार्यक्रम होने लगे थे। दरअसल वो प्लाट जिसका था वो विदेश में रहता था और उसने इन्वेस्टमेंट के हिसाब से उसे खरीद लिया था। लेकिन जब कई सालों तक उसने प्लाट पर कुछ नहीं बनवाया तो कुछ लोगों को वहां कुछ और सूझ गया और रातों रात वहां एक छोटा सा शिवलिंग निकल गया। अब वो जगह एक तरह से उसके मालिक के हाथ निकल गयी और एक मुकदमा अपनी मौत मरने के लिए कचहरी में दाखिल हो गया था।
अब चाहे गणेश पूजा हो, दुर्गा पूजा हो या कुछ और, सारे पंडाल वहीं बनते थे। और लखना और उसकी टीम के लोग चंदा मांगने तो ऐसे आते थे जैसे कि उसने ही कुछ उधार लिया हो पूजा कमिटी से। एक बार तो जब उसके पिता ने ऐतराज किया तो इसी लखना ने एक आंख दबाते हुए कहा थे कि जाने दो, अपने होने वाले रिश्तेदार से चंदा नहीं लेते हैं। और फिर उसने पिता को साफ़ शब्दों में बोल दिया था कि बिना हुज्जत इनको चंदा दे दिया करें। पंडाल बनने में कई दिन लगते थे और लखना किसी न किसी बहाने उसके घर आ ही जाता था और फिर उसकी गन्दी नज़र। पता नहीं कितनी बार उसने पंडाल में प्रार्थना की होगी कि इस लखना की ऑंखें न रहें लेकिन उस जैसे की प्रार्थना तो मानव भी नहीं सुनते तो कोई और क्या सुने! अक्सर शाम को निकलते समय लखना नशे में धुत्त उसी पंडाल के आस पास मिल जाता और फिर वो कई मौत मरती हुई जाती आती।
मोहल्ले में बहुत से लोग समझते भी थे लेकिन एक तो धर्म की बात और दूसरे उन लफंगों के मुह कौन लगे, आखिर सब लड़कियों के बाप थे। अब ऐसे में उनको बर्दास्त कर लेने के सिवा कोई चारा भी नहीं था। पिता से तो भूल कर भी कुछ नहीं कहती थी, उनका ब्लड प्रेसर वैसे ही हाई रहता था, अगर कुछ हो गया तो। इसी तरह सभी त्यौहार बीत रहे थे, रात रात भर बजते बेहद तेज संगीत और शोर उसके पिता को और बीमार बना देते थे।
लगभग भागते हुए वो दुकान पहुंची और भाग्य से खुली हुई थी। पिता की दवा लेकर जैसे ही वो मुड़ने को हुई, उसकी नज़र शेल्फ में रखे डिस्पोसेबल सिरिंज पर पड़ी। उसने एक सिरिंज भी लिया और जल्दी जल्दी वापस चल दी। आज पहली बार वो उस जुलूस का हिस्सा बनना चाहती थी और जैसे ही उसकी नज़र उस ट्रक पर पड़ी जिसमें लखना सवार था, उसने लखना को उतर आने का इशारा किया। लखना उतरा और दोनों मुट्ठी में गुलाल लेकर उसकी तरफ बढ़ा, उसने भी अपनी मुट्ठी मजबूत कर ली। नशे में झूमता हुआ लखना उसके पास पहुंचा और उसने दोनों हाथों में लिया गुलाल उसकी ओर उड़ा दिया। चारो तरफ बज रहे शोर और उड़ते हुए गुलाल में भी उसका निशाना सही बैठा और लखना अपनी आंख पर हाथ रखकर भागा। वो भी जल्दी जल्दी घर की तरफ भागी, पिता को जल्दी से दवा देनी थी। चारो तरफ गणपति बप्पा की जय जयकार हो रही थी, लोग नाच गा रहे थे और लखना अपनी आँखों से बहते खून को रोकने की कोशिश करता हुआ गिरा पड़ा था। आज पहली बार उसे गूंजता हुआ जयकारा बेहद अच्छा लग रहा था और उसने भी ऊँची आवाज़ में कहा "अगली बरस तू जल्दी आ"। 

Tuesday, September 6, 2016

बराबरी--लघुकथा

"मैं संजू से शादी कर रही हूँ और हम लोग चेन्नई शिफ्ट कर रहे हैं", घर में घुसते ही उसने माँ से कह दिया| बैग को टेबल पर रखकर उसने फ्रिज से पानी की बोतल निकाली और पीने लगी, माँ उसे देखे जा रही थी|
"लेकिन चेन्नई शिफ्ट करने की क्या जरुरत है, मुझे तो कोई ऐतराज नहीं है तुम लोगों की शादी से", माँ ने पूछा|
"दर असल उसको एक बढ़िया जॉब मिल गयी है चेन्नई में और मैंने भी अपने ट्रांसफर की अर्जी लगा दी है", उसने सोफे पर बैठते हुए कहा|
"तो अब तुम उसके हिसाब से चलोगी, ख़त्म हो गयी सब बराबरी की बातें", माँ के लहजे में व्यंग ज्यादा था|
"बराबरी आज भी है माँ, अभी उसको एक बढ़िया जॉब मिली है और मेरा भी ट्रांसफर हो सकता है तो फिर क्यों नहीं जाऊँ", उसने माँ को समझाते हुए कहा|
"मैंने अपने उसूलों से समझौता नहीं किया और अकेले तुम्हारी परवरिश की मैंने| और तुम मुझे ही समझा रही हो कि बराबरी क्या होती है", माँ की आवाज़ में निराशा साफ़ झलक रही थी|
"माँ, तुम मान क्यों नहीं लेती कि तुम्हारा फैसला गलत था| आखिर पापा को इतनी बढ़िया जॉब मिली थी तो तुम्हें अपना ट्रांसफर करा लेने में क्या दिक्कत थी| कल को अगर मुझे कोई बढ़िया जॉब मिलती है और संजू का ट्रांसफर हो सकता है तो वो जरूर आएगा मेरे साथ| बराबरी का अर्थ एक दूसरे को समझना भी तो होता है, न कि अपना ईगो ऊपर रखना"|
उसने अपना बैग उठाया और कमरे में चली गयी, पापा की कमी आज भी उसको खलती थी|