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Tuesday, September 13, 2016

भागीदारी--लघुकथा

"देखिये बाबूजी, मैं फिर से कह रहा हूँ कि राजनीति में नहीं उतरूँगा| आखिर इतने बड़े कॉलेज में दाखिला इसके लिए तो नहीं लिया है मैंने, मैं भी कहीं बाहर जॉब करना चाहता हूँ", कॉलेज के लिए निकलते समय टोक दिए जाने से वो विचलित हो गया|
"आखिर क्यों बाहर जाना चाहता है, अपने देश में क्या कमी है", बाबूजी ने बिस्तर पर लेटे लेटे ही बोला|
"कमी, अरे कमी छोड़िये, कोई एक अच्छाई तो बताईये इस देश में| हर जगह बस भ्रष्टाचार, भाई भतीजावाद और गुंडागर्दी", उसने पलट के बोला|
"वो तो ठीक है, लेकिन कभी इसकी वजह भी टटोलने की कोशिश की है तुमने", बाबूजी ने समझाया|
"वजह तो ये आज के नेता और नौकरशाह ही हैं, आप भी तो राजनीति में थे, क्या मिला आपको", उसने उसी तरह तैश में बोला|
"हाँ, मैं भी राजनीति में था और मैंने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी| बस अपने लिए कभी कुछ नहीं किया क्योंकि मेरे लिए समाज सबसे पहले था| और अगर आज के नेता ऐसे हैं तो क्या इसमें तुम्हारा दोष नहीं है, क्यों नहीं तुम उनसे अलग होने की आकांक्षा रखते और जो चीजें तुम्हें तकलीफ दे रही हैं, उसके इलाज़ में भागीदारी करते", भावावेश में बाबूजी हांफने लगे|
उसके कदम रुक गए, उसने आगे बढ़कर बाबूजी को सहारा दिया और पानी का गिलास पकड़ा दिया|
"इस सहारे की मुझसे ज्यादा इस समाज को जरुरत है" बोलते हुए बाबूजी वापस लेट गए| उनकी बंद आँखों में अपने अधूरे सपने आज भी तैर रहे थे| 

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