"क्या बात है, बहुत उदास हो, ये तो हमारे उदास होने का समय है", मुन्नू ने पुचकारते हुए भोली से पूछा|
"अरे तुम्हारे और हमारे में बहुत फ़र्क़ है, कम से कम तुम तो सबके लिए बराबर तो हो", भोली ने अनमने ढंग से जवाब दिया|
"हाँ, सही कहा, हम सबके लिए बराबर हैं, सब उतने ही बेरहमी से हमें काटते हैं| लेकिन तुम तो अधिकांश जगह पूजी जाती हो, फिर क्यों उदासी", मुन्नू ने थोड़े अचरज से कहा|
"पूज्यनीय, बस तभी तक, जब तक दूध है| उसके बाद तो हम तुमसे भी बुरी हालात में हो जाते हैं", भोली की आँखों में खौफ उतर आया|
"अच्छा तो क्या तुम भी, मुझे तो लगा सिर्फ हम ही कटते हैं", मुन्नू को आश्चर्य हो रहा था|
"तुम क्या जानो उस दर्द को जब हम उन्हीं घरों से खदेड़ दिए जाते हैं, जिनको हमने अपने दूध से सींचा होता है", भोली के आँखों से बूंदें छलक आयीं|
"वो दर्द तो हम भी झेलते हैं, कुछ घरों में तो हमारे दूध से भी बच्चे पलते हैं| वैसे इंसान तो अपने माँ बाप को भी ऐसी हालत में दूर फेंक देता है", मुन्नू ने एक आह भरी|
"एक और दंश हम झेलते हैं, हमारे चक्कर में कुछ लोग बेमौत भी मारे जाते हैं| लेकिन हमारी दशा वैसे ही रहती है, कम से कम तुम तो ऐसा दंश नहीं झेलते", भोली ने गहरी सांस लेते हुए कहा|
"हाँ, ये तो है, हम तो हर मज़हब के लोगों को एक समान स्वीकार्य हैं| कभी हमारे लिए जान नहीं जाती, बस हमारी जान जाती है" मुन्नू ने हामी में सर हिलाया|
"खैर, तुम तो अपने मालिक द्वारा उपयोगी समझ के बेचे जाते हो लेकिन हम तो बेकार समझ के| इसका दर्द बेहद सालता है" भोली अब एकदम उदास हो गयी थी|
"सही कहा, ये इंसानी फितरत है, बस अपना फायदा देखता है", मुन्नू ने दिलासा देते हुए कहा|
इतने में उसके रस्सी को पकड़कर मालिक खींचता हुआ चल पड़ा, भोली ने सर हिला कर उसे अलविदा कहा और फिर से उदास हो गयी|
"अरे तुम्हारे और हमारे में बहुत फ़र्क़ है, कम से कम तुम तो सबके लिए बराबर तो हो", भोली ने अनमने ढंग से जवाब दिया|
"हाँ, सही कहा, हम सबके लिए बराबर हैं, सब उतने ही बेरहमी से हमें काटते हैं| लेकिन तुम तो अधिकांश जगह पूजी जाती हो, फिर क्यों उदासी", मुन्नू ने थोड़े अचरज से कहा|
"पूज्यनीय, बस तभी तक, जब तक दूध है| उसके बाद तो हम तुमसे भी बुरी हालात में हो जाते हैं", भोली की आँखों में खौफ उतर आया|
"अच्छा तो क्या तुम भी, मुझे तो लगा सिर्फ हम ही कटते हैं", मुन्नू को आश्चर्य हो रहा था|
"तुम क्या जानो उस दर्द को जब हम उन्हीं घरों से खदेड़ दिए जाते हैं, जिनको हमने अपने दूध से सींचा होता है", भोली के आँखों से बूंदें छलक आयीं|
"वो दर्द तो हम भी झेलते हैं, कुछ घरों में तो हमारे दूध से भी बच्चे पलते हैं| वैसे इंसान तो अपने माँ बाप को भी ऐसी हालत में दूर फेंक देता है", मुन्नू ने एक आह भरी|
"एक और दंश हम झेलते हैं, हमारे चक्कर में कुछ लोग बेमौत भी मारे जाते हैं| लेकिन हमारी दशा वैसे ही रहती है, कम से कम तुम तो ऐसा दंश नहीं झेलते", भोली ने गहरी सांस लेते हुए कहा|
"हाँ, ये तो है, हम तो हर मज़हब के लोगों को एक समान स्वीकार्य हैं| कभी हमारे लिए जान नहीं जाती, बस हमारी जान जाती है" मुन्नू ने हामी में सर हिलाया|
"खैर, तुम तो अपने मालिक द्वारा उपयोगी समझ के बेचे जाते हो लेकिन हम तो बेकार समझ के| इसका दर्द बेहद सालता है" भोली अब एकदम उदास हो गयी थी|
"सही कहा, ये इंसानी फितरत है, बस अपना फायदा देखता है", मुन्नू ने दिलासा देते हुए कहा|
इतने में उसके रस्सी को पकड़कर मालिक खींचता हुआ चल पड़ा, भोली ने सर हिला कर उसे अलविदा कहा और फिर से उदास हो गयी|
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