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Tuesday, September 6, 2016

बराबरी--लघुकथा

"मैं संजू से शादी कर रही हूँ और हम लोग चेन्नई शिफ्ट कर रहे हैं", घर में घुसते ही उसने माँ से कह दिया| बैग को टेबल पर रखकर उसने फ्रिज से पानी की बोतल निकाली और पीने लगी, माँ उसे देखे जा रही थी|
"लेकिन चेन्नई शिफ्ट करने की क्या जरुरत है, मुझे तो कोई ऐतराज नहीं है तुम लोगों की शादी से", माँ ने पूछा|
"दर असल उसको एक बढ़िया जॉब मिल गयी है चेन्नई में और मैंने भी अपने ट्रांसफर की अर्जी लगा दी है", उसने सोफे पर बैठते हुए कहा|
"तो अब तुम उसके हिसाब से चलोगी, ख़त्म हो गयी सब बराबरी की बातें", माँ के लहजे में व्यंग ज्यादा था|
"बराबरी आज भी है माँ, अभी उसको एक बढ़िया जॉब मिली है और मेरा भी ट्रांसफर हो सकता है तो फिर क्यों नहीं जाऊँ", उसने माँ को समझाते हुए कहा|
"मैंने अपने उसूलों से समझौता नहीं किया और अकेले तुम्हारी परवरिश की मैंने| और तुम मुझे ही समझा रही हो कि बराबरी क्या होती है", माँ की आवाज़ में निराशा साफ़ झलक रही थी|
"माँ, तुम मान क्यों नहीं लेती कि तुम्हारा फैसला गलत था| आखिर पापा को इतनी बढ़िया जॉब मिली थी तो तुम्हें अपना ट्रांसफर करा लेने में क्या दिक्कत थी| कल को अगर मुझे कोई बढ़िया जॉब मिलती है और संजू का ट्रांसफर हो सकता है तो वो जरूर आएगा मेरे साथ| बराबरी का अर्थ एक दूसरे को समझना भी तो होता है, न कि अपना ईगो ऊपर रखना"|
उसने अपना बैग उठाया और कमरे में चली गयी, पापा की कमी आज भी उसको खलती थी| 

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