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Thursday, September 22, 2016

असली श्रद्धा--लघुकथा

पिछले एक हफ्ते से सामने वाले मुन्नू के घर में खूब गहमा गहमी थी, रग्घू को पता था कि शहर में रहने वाले उसके दोनों भाई भी परिवार सहित आ गए हैं| अक्सर शांत रहने वाले घर में रौशनी खूब जगमगा रही थी| कभी कभी वो चला जाता था वहां और मुन्नू से होने वाले भोज के बारे में सुनता और वापस आ जाता| लेकिन पता नहीं क्यों उसके बाबू कभी भी मुन्नू के घर जाने का नाम नहीं लेते थे|
आज तो भोज का दिन था और सुबह से ही हलवाई तमाम तरह के पकवान बनाने में व्यस्त थे| रग्घू ने एक बार दरवाजे पर पड़ी खटिया पर लेटे बाबू को कहा कि वो जाकर मुन्नू के घर बैठ जाएँ, शायद उनकी कुछ मदद ही हो जाए, लेकिन बाबू टस से मस नहीं हुए| गाय को चारा देकर जब वो आया तो बाबू को वहीँ बैठे देखकर उसे थोड़ा गुस्सा आ गया|
उसने उनके पास जाकर झुंझलाते हुए कहा "पूरे गाँव में कहीं भी कुछ होता है तो आप मना करने के बाद भी पूरा पूरा दिन वहां लगे रहते हैं| और आज सामने है तो जाने का नाम ही नहीं लेते, आखिर बात क्या है", उसे लगा कि शायद मुन्नू से कभी कुछ कहासुनी हो गयी होगी|
"अरे बोला ना कि नहीं जाऊंगा वहां, तो तू समझता क्यों नहीं है", बाबू ने करवट बदल लिया|
"लेकिन बात क्या है, क्या मुन्नू से कुछ खट पट हो गयी आपकी| ठीक है अगर आप नहीं ही जाना चाहते हैं तो मैं चला जाता हूँ, आपका भी खाना लेते आऊंगा", रग्घू घर में जाते हुए कहा|
"मेरे लिए मत लाना खाना वहां से, मैं नहीं खा पाउँगा| तुम वजह जानना चाहते हो ना, तो बताता हूँ| अपने पिताजी के श्राद्ध के लिए ही ये सारा ताम झाम कर रहे हैं वो लोग, पर मुझे आज भी उनका खाट पर पड़े पड़े चिल्लाना याद आता है| उसके भाई तो शहर से कभी आये नहीं देखने और न उनको लेकर ही गए, लेकिन मुन्नू भी तो उनको हमेशा जानवरों की तरह ही रखता था| कितनी बार ही मैंने उनका कपडा बदला, उनको पानी पिलाया और दवा वगैरह दी| और जब मैंने मुन्नू से उनका ध्यान रखने के लिए कहा तो मेरे ऊपर ही भड़क गया कि अपने काम से काम रखें और उसके घर के मसले में दखल ना दें| मुझसे आज उनके मौत के उत्सव का भोज नहीं खाया जायेगा", बाबू ने अपनी आंख गमछे से पोंछ ली|
रग्घू ने आकर उनके कंधे पर हाथ रखा और उनको आस्वस्त करते हुए बोला "कोई बात नहीं, आप का खाना घर ही बनवा देता हूँ| लेकिन आपको अगर कभी भी लगे कि मैं आपका ध्यान रखने में कोई भी लापरवाही कर रहा हूँ तो मुझे कस के डांट देना"|
रग्घू घर में बाबू के खाने के लिए बोलने चला गया, बाबू ने एक बार आसमान की और देखा और मुन्नू के पिताजी से छमा मांग ली|

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