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Friday, May 2, 2014

पुनरावृत्ति

साँसों की आवाज साफ़ साफ़ सुनाई दे रही थी , लेकिन बार बार पूछने के बाद भी उधर से कोई जवाब नहीं दे रहा था | आज बहुत सालों बाद ऐसा फिर से हो रहा था | उसे अपने कॉलेज के दिन याद आ गए |
बहुत मजा आता था किसी भी अनजान या कभी कभी जाने पहचाने नंबर पर देर रात को ब्लेंक काल करने में | इसी तरह एक बार एक अनजाने नंबर पर काल करने पर उधर से आई आवाज ने तो होश ही उड़ा दिए थे | फिर तो एक सिलसिला ही चल निकला बात करने का | धीरे धीरे उस नंबर से बात करना जिंदगी का एक अहम हिस्सा बन गया | एक दिन इसी तरह बात करते हुए उसने मिलने की इच्छा जताई तो सामने से मना कर दिया गया | दुबारा अगले दिन फिर जब उसने मिलने के लिए कहा तो फोन कट गया | अगले कई दिनों तक बात नहीं हो पायी लेकिन एक दिन जब उसने काल किया तो पता चला कि उसकी शादी की बात चल रही है और उसने एक बार मिलने की इच्छा जताई | अगले दिन पास के एक पार्क में मिलना तंय हुआ |
शाम को वो पार्क पहुंचा , लेकिन उसे अपनी आँखों पर भरोसा ही नहीं हो रहा था | गजब की खूबसूरत थी वो और कहाँ उसका चेचक के दाग से भरा चेहरा | हिम्मत ने साथ छोड़ दिया और पीछे से बिना मिले ही उलटे पाँव लौट पड़ा | अगले कई हफ़्तों तक उसका अपना फोन उसे डराता रहा |
आज २० साल बाद उसे लगा कि वक्त का पहिया उल्टा चल पड़ा है और शायद अब उसी की पुनरावृत्ति हो रही है |

Thursday, May 1, 2014

फ़र्क़--

" आज कल की लड़कियों को तो सलीका ही नहीं रह गया, कैसे कैसे कपडे पहन लेती हैं, न बदन ढँकता है और न ही चेहरा| शर्म लिहाज तो बची ही नहीं इनके पास", चाचा घर के बरांडे में बैठे बड़बड़ा रहे थे|
" लेकिन चाचा, गर्मी भी तो बहुत पड़ रही है न, पास बैठे व्यक्ति ने कहा| अब ऐसी गर्मी में अगर पूरा शरीर ढँका रहे तो वो गर्मी से बेहाल न हो जाएँ"|
" तुम तो कहोगे ही बरखुरदार, तुम भी तो आखिर इसी पीढ़ी के हो न, अरे थोड़ी गर्मी नहीं बर्दास्त कर सकतीं| हमारे ज़माने में तो मजाल थी कि घर से बाहर निकलें और किसी का चेहरा भी दिख जाये"|
अचानक सामने पोते को देख कर चाचा बोले " अरे बेटा, बनियान निकाल कर हवा में बैठ जाओ, पसीना तो सूख जाने दो"|
खुद सिर्फ लुंगी लपेटे और पसीना पोंछते चाचा पोते को समझा रहे थे और वो गर्मी के फ़र्क़ को समझने की कोशिश कर रहा था|

जन्मदिन

आईये आईये वर्माजी , धन्यभाग्य हमारे | कम से कम आपने समय तो निकाला यहाँ पधारने का | हमारा जन्मदिन खास हो गया आज | मेजबान दोहरे हुए जा रहे थे स्वागत में | वर्माजी के पीछे पीछे एक आदमी बड़ा सा गिफ्ट का डिब्बा लेकर आया और रख कर चला गया |
किनारे खड़े उनके पुराने मित्र सोच में पड़ गए कि हम जब आये थे तब स्वागत फीका सा था , लेकिन अब तो बात ही कुछ और है | उनकी परेशानी देखकर दूसरे सज्जन ने समझाया " अमाँ , नाहक परेशान क्यों होते हो | ये स्वागत वर्माजी का नहीं था बल्कि उस बड़े डब्बे का था जो उनके साथ आया था "| अब अंतर समझ में आ गया था और वो नास्ते की तरफ बढ़ गए |

Saturday, April 26, 2014

कल

कल 
जिंदगी के कई रंग हैं अनदेखे से ,
आज में जीते हुए मैंने महसूस किये ,
धुआं , नमी , आँसू और उड़े हुए रंग चेहरों के ,
ग़म हैं , खुशियाँ हैं और जीने की अदम्य चाहत ,
ये सब है आज में , लेकिन फिर भी कुछ कमी सी है ,
शायद वो कल में है , कल जो आना अभी बाक़ी है |

गाँव

गाँव
मेरे अज़ीज़ गाँव 
तुम्हे आज तक समझ पाना ,
मेरे लिए एक पहेली ही है ,
एक तरफ आपसी सद्भाव ,
दूसरी तरफ जबरदस्त भेदभाव ,
एक तरफ सभी एक परिवार ,
दूसरी तरफ राजनीति अपरम्पार ,
कहाँ गया वो सामाजिक सामंजस्य .
अब तो सब तरफ दिखता वैमनस्य ,
कहाँ गयी वो शाम की चौपाल ,
अब तो हर घर में फैला टेलीविज़न का जाल ,
लेकिन फिर भी न जाने क्यूँ , प्यार है तुमसे मेरे प्यारे गाँव ,
क्योंकि यहीं मिलती है अपनों की शीतल छाँव.

लाइसेंस

रुकिए , रुकिए , पुलिसवाले की आवाज सुनते ही गाड़ी को एक किनारे रोक दिया मैंने | शाम अब रात में बदल रही थी और वहां अँधेरा भी था | खैर मैंने अपनी खिड़की का शीशा नीचे किया और पुलिसमैन को हेलो किया | उसने भी जवाब में पूछा कि मैं कैसा हूँ , फिर आगे जाके विंडस्क्रीन पर लगे डिस्क को चेक किया कि गाड़ी के टैक्स का पेमेंट अपटूडेट है कि नहीं | उसे देखने के बाद वापस मेरे पास आया और बोला "अपना लाइसेंस दिखाईये "| 
कार से सम्बंधित सभी कागजात अंदर ही रखे हुए थे , लेकिन ऐसे मौके पर कई बार खोजने पर ही मिलते हैं | किसी तरह से खोज कर निकाला और उसे दिखाया | उसमे यहाँ के भारतीय दूतावास के द्वारा दिया गया एक सर्टिफिकेट था जिसमे लिखा था कि मेरे पास भारत का वैलिड लाइसेंस है जिससे मैं यहाँ पर कार चला सकता हूँ | उसने देखने के बाद कहा कि ओरिजिनल लाइसेंस कहाँ है , उसे दिखाईये | मेरे पास तो वो था नहीं , इसलिए मैंने कहा कि मैं यही सर्टिफिकेट ही रखता हूँ अपने पास | लेकिन वो जिद पर अड़ गया कि या तो ओरिजिनल लाइसेंस दिखाओ या फिर वो फाइन करेगा | फिर मैंने कहा कि ठीक है , मैं घर से , जो कि नजदीक ही था , लाइसेंस ला के दिखा देता हूँ | लेकिन वो बोला कि अभी तो आपके पास नहीं है इसलिए बिना लाइसेंस के गाड़ी चलाने का फाइन होगा | हार कर मैंने भी कह दिया कि जो आपको ठीक लगे , कर दीजिये | फिर पता नहीं , उसने जो भी सोचा , मुझे दुबारा लाइसेंस लेकर कार चलाने की सलाह दी और जाने के लिये बोला | लेकिन इस सारे वाकये में न तो उसने पैसे मांगे , न मैंने देने की बात की , और जब मैंने पैदल घर जाके लाइसेंस लाने के लिए कहा तो उसने ये कहकर मना कर दिया कि वो मेरी जिंदगी को खतरे में नहीं डाल सकता |

गलती

कभी कभी समय हमें अपनी गलती सुधारने का मौका दे देता है और हम खुद की नजरों में अपनी इज़्ज़त बचा लेते हैं | कल ही कि बात है ,मैं ऑफिस के लिए लेट हो रहा था , इसलिए जल्दी में था | जैसे ही चौराहे पर पहुंचा , एक परेशान से दिखने वाले व्यक्ति ने मुझे रोक कर कुछ पूछना चाहा | मैं देख रहा था की वो कई लोगों से कुछ पूछ रहा है लेकिन हर आदमी बिना बताये आगे बढ़ जा रहा था | वो शायद कोई पता पूछ रहा था , लेकिन मैंने भी अपनी जल्दी के चलते उसको अनसुना किया और आगे बढ़ गया |
शाम को लौटते वक्त मैंने देखा कि चौराहे पर भीड़ लगी हुई है | जानने की उत्सुकता हुई कि माजरा क्या है , और मैं भी भीड़ में शामिल हो गया | एक आदमी सड़क पर घायल पड़ा हुआ था | किसी वाहन ने उसको टक्कर मार दिया था और सारे लोग तमाशबीन बने खड़े थे | शायद हर आदमी इस इंतजार में था कि कोई और इसे अस्पताल ले जाये | एक बार तो मैंने भी सोचा कि चलते हैं , जब कोई आगे नहीं आ रहा तो मैं क्यों पचड़े में पडूँ | लेकिन फिर सुबह की घटना दिमाग में आ गयी तो लगा जैसे इसकी मदद करके मैं सुबह की गलती को सुधार सकता हूँ | और मैंने घायल को अस्पताल लेजाने का निर्णय कर लिया |