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Saturday, April 26, 2014

गाँव

गाँव
मेरे अज़ीज़ गाँव 
तुम्हे आज तक समझ पाना ,
मेरे लिए एक पहेली ही है ,
एक तरफ आपसी सद्भाव ,
दूसरी तरफ जबरदस्त भेदभाव ,
एक तरफ सभी एक परिवार ,
दूसरी तरफ राजनीति अपरम्पार ,
कहाँ गया वो सामाजिक सामंजस्य .
अब तो सब तरफ दिखता वैमनस्य ,
कहाँ गयी वो शाम की चौपाल ,
अब तो हर घर में फैला टेलीविज़न का जाल ,
लेकिन फिर भी न जाने क्यूँ , प्यार है तुमसे मेरे प्यारे गाँव ,
क्योंकि यहीं मिलती है अपनों की शीतल छाँव.

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