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Sunday, March 29, 2015

परिवर्तन--

" क्या बात है ठाकुर साहब , आज आप हमारी बस्ती में ? 
सवाल सुनकर तो एक बार अचकचाए लेकिन संभलते हुए बोले " दुनियाँ कहाँ से कहाँ पहुँच गयी , अब ये ऊँच नीच की दीवार हमें गिरानी होगी भाई "| वहां मौजूद सभी खामोश हो गए , कुछ तो वाह वाह कर बैठे | 
उनके चेहरे पर मुस्कान फ़ैल गयी , लेकिन हरिया मन ही मन किसी हादसे की आशंका से काँप गया | अब उसकी बेटी भी जवान हो रही थी |

Thursday, March 26, 2015

अक्स--

थके क़दमों से वो ओल्ड ऐज होम के कमरे में आईने के सामने खड़ा हुआ | आज पहला दिन था उसका यहाँ और मन में जैसे दुखों का सैलाब भरा हुआ था | बेटे की तीखी आवाज़ उसके कानों में अभी भी गूंज रही थीं |
अचानक उसने देखा , आईने में उसके तीस साल पुराने चेहरे का अक्स नज़र आ रहा था |  

Sunday, March 22, 2015

औलाद--

भूख से बिलबिलाते अपने बच्चों का चेहरा बार बार उसके सामने आ जाता था | आज उसने सोच लिया था कि चाहे कुछ भी करना पड़ जाए , वो उनके खाने का इंतज़ाम करके ही लौटेगा | लेकिन जहाँ भी काम के लिए उसने हाँथ फैलाया , उसे दुत्कार ही मिला |
रात हो गयी थी और वो थके क़दमों से वापस लौट रहा था | अचानक उसकी नज़र पड़ी सड़क के किनारे झगड़ते कुत्तों पर | बगल में कोई पार्टी चल रही थी और बचा हुआ जूठा भोजन बाहर फेंका जा रहा था |
उसके बच्चे आज भरपेट भोजन पा गए , लेकिन वो इंसान से कुत्ता बन गया था | 

रिहाई--

जेल से रिहा होकर बहुत प्रसन्न था वो , कदम उसके उत्साह का साथ नहीं दे पा रहे थे | बस मन में एक ही इच्छा , कितनी जल्दी पहुंचे अपने घर , अपनों के बीच | भागते हुए अपने मोहल्ले में घुसा , नुक्कड़ की दुकान वाले चाचा ने जैसे अनदेखा कर दिया | उसे थोड़ा अजीब तो लगा लेकिन जल्दी जल्दी कदम बढ़ाते हुए वो घर की ओर लपका | अचानक उसके कान में आवाज़ आई " किसने सोचा था कि ये भी इसमें शामिल हो सकता है , कितना मासूम चेहरा और ऐसी नापाक हरक़त "|
शक के बिना पर उसकी गिरफ्तारी हुई थी , वज़ह थी उसके कुछ दोस्त जो सामाजिक और धार्मिक भेदभाव के विरोध में आवाज़ उठाते थे और कभी कभी देर रात तक उनकी बैठक चलती थी उसके घर | अदालत ने तो बरी कर दिया लेकिन समाज़ की सवालिया नज़रें उसका पीछा नहीं छोड़ रही थीं | जहाँ जाता , लोग पीठ पीछे कुछ न कुछ कह देते |
माँ उसके मन में चल रहे विचारों के झंझावात को समझ गयी | उसने प्यार से उसको समझाया " बाहरी जख्म तो भर जाते हैं लेकिन अंदरुनी जख्मों को भरने में समय लगता है | थोड़ा समय लगेगा और समाज़ भी तुम्हे रिहाई दे देगा "| उसने माँ की गोद में सर रखा और उसके मन की पीड़ा बह निकली |

बेगुनाही--

जेल से रिहा होकर बहुत प्रसन्न था वो , कदम उसके उत्साह का साथ नहीं दे पा रहे थे | बस मन में एक ही इच्छा , कितनी जल्दी पहुंचे अपने घर , अपनों के बीच | लगभग भागते हुए अपने मोहल्ले में घुसा , नुक्कड़ की दुकान वाले चाचा ने जैसे अनदेखा कर दिया | उसे थोड़ा अजीब तो लगा लेकिन जल्दी जल्दी कदम बढ़ाते हुए वो घर की ओर लपका | अचानक उसके कान में आवाज़ आई " किसने सोचा था कि ये भी ये कर सकता है , कितना मासूम चेहरा और ऐसी घिनौनी हरक़त "|
मोहल्ले में जो भी उसे देखता , मुंह घुमा लेता था | घर के दरवाज़े पर पहुँच कर उसने सांकल बजाई और दरवाज़ा खुलते ही अंदर घुस गया | माँ की रुलाई फुट पड़ी थी और वो भी उसके साथ रो पड़ा | कुर्सी पर बैठे बैठे उसके दिमाग में पुरानी घटनाएँ घूमने लगीं | माँ का एकलौता पुत्र था वो और पिता जी बचपन में ही गुज़र गए थे | चाचा का भरा पूरा परिवार था और उनके चारो बच्चों को भी जायदाद में आधा हिस्सा ही मिलना था | जैसे जैसे वो बड़ा होता गया , चाचा की नफरत भी बढ़ती गयी | लेकिन उसे ये सब समझ नहीं आता था उस समय और वो अपने भाईयों के कमरे में बेधड़क घुस जाता था |
और एक दिन उसकी भाभी ने उसपर वो इलज़ाम लगा दिया जिसके बारे में वो सोच भी नहीं सकता था | घर में जम कर पीटा उसके भाईयों ने और फिर पुलिस केस | अगले तीन साल तक केस चलता रहा , जमानत भी नहीं मिली उसे | लेकिन आखिरकार उसे रिहाई मिल गयी क्योंकि उसका जुर्म साबित नहीं हो पाया | इस बीच बंटवारा हो गया , सब अच्छी जमीनें चाचा ने हथिया ली | घर भी अलग कर लिया और उसकी माँ को अकेले दिन बिताने के लिए छोड़ दिया | खेती बाड़ी सब उजड़ गयी और केस के चक्कर में आधी ज़मीने भी बिक गयीं जिसमें से कुछ तो चाचा ने ही खरीद लीं |
कब रात हो गयी और किसी तरह कुछ खा कर माँ बेटे सो गए | अगली सुबह वो घर से बाहर निकला , कोई उससे बात भी करने को तैयार नहीं था | हर निगाह जैसे उससे उसकी बेगुनाही का सबूत मांग रही थी | अदालत ने तो बरी कर दिया था लेकिन समाज ने अभी भी उसे बेगुनाह नहीं माना था |    

Friday, March 20, 2015

रामलीला--

" बेटा , एक बार इच्छा है रामलीला देखने की , हो सके तो ." , माँ की बात पूरी भी नहीं हुई थी तभी उसने टोक दिया " क्या माँ , क्या रखा है इस घिसी पिटी रामलीला में , कितनी बार तो देख चुकी हो | मेरे पास टाइम नहीं है इन चीजों के लिए " कहते हुए वो घर से जल्दी में निकल गया |
शाम को बेटी ने बताया कि कल मूवी देखने चलना है , उसने टिकट बुक कर दिया है | उसने मुस्कुराते हुए हामी भर दी |
अगली शाम घर से निकलते समय उसने देखा कि माँ भी चल रही है | उसने आश्चर्य से बेटी की ओर देखा , बेटी के चेहरे पर संतुष्टि की मुस्कान झलक रही थी | जब बेटी ने कार रोकी तो उसने देखा सामने रामलीला का स्थान था | अब उसे बेटी के मुस्कान का अर्थ समझ में आया |
" अब सोइ जतन करहु तुम्ह ताता। देखौं नयन स्याम मृदु गाता | तब हनुमान राम पहिं जाई। जनकसुता कै कुसल सुनाई " , मंच पर से इस चौपाई की आवाज़ आ रही थी | रामलीला में डूबी हुई माँ की आँखों से ख़ुशी के आंसू गिर रहे थे और वो भी अपने मन में एक अजीब सा सुकून महसूस कर रहा था |  

Wednesday, March 18, 2015

रिश्ता--

" बापू , हम लोग इन मकानों में क्यों नहीं रहते जिन्हें हम बनाते हैं ", उसके पुत्र ने पूछा |
" बेटा , हम इन्हें बनाते ही दूसरों के लिए हैं | इनसे हमारा रिश्ता सिर्फ इनके पूर्ण होने तक ही रहता है "|
पुत्र को ये रिश्ता समझ में नहीं आ रहा था पर पिता को भी श्रम और धन का रिश्ता कहाँ समझ आया था आज तक |