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Tuesday, November 29, 2016

परवरिश--लघुकथा

सुरजू बुरी तरह निराश हो गए थे, उनको लगा जैसे उनके जीवन भर की कमाई जैसे एक पल में लुट गयी हो| अपने खानदान के सबसे बड़े होने के चलते उन्होंने कभी ये नहीं सोचा कि उनकी अपनी पत्नी या अपने बच्चे कौन हैं, सबको एक बराबर देखते रहे| बल्कि हमेशा भाईयों के बच्चों को ही ज्यादा लाड़ किया और कभी परवाह नहीं की कि उनके अपने बच्चे बुरा मान सकते हैं| कई बार उन्होंने अपनी पत्नी को भी डांट दिया था कि यह पूरा परिवार ही उन सबका है|
आज उनका बड़ा भतीजा अपनी नौकरी से लौट कर आया तो सबसे ज्यादा ख़ुशी उनको ही थी| जब तक वह घर नहीं आया था, सुरजू बार बार समय देख रहे थे कि अब तक आया क्यों नहीं| गांव में कुछ ही बसें चलती थीं और एक बस निकल गयी तो दूसरी के लिए घंटों इंतज़ार करना पड़ता था| भतीजे ने जैसे ही घर में कदम रखा, उन्होंने लपक कर उसको गले लगा लिया और उससे सवाल करना शुरू कर दिया| लेकिन उसने उनकी एकाध बात का जवाब दिया और जल्दी से अपनी माँ के कमरे में घुस गया| थोड़ा अजीब तो लगा सुरजू को, लेकिन फिर उन्होंने भतीजे का माँ के लिए प्रेम समझ कर ध्यान नहीं दिया|
कुछ ही देर में भाई भी आ गया और उसके आते ही भतीजा लपक कर उसके पास आया और एक बढ़िया सा कुर्ता निकाल कर देते हुए बोला "पापा, मेरी पहली तनख्वाह में से ये आपके लिए लाया हूँ| पहन कर देखिये जरा"| भाई ने एक बार कुर्ते को देखा और फिर उसका ध्यान सुरजू की तरफ गया| तब तक भतीजे को भी समझ में आ गया कि उसने गलती कर दी| हड़बड़ाहट में उसने कहा "आपके लिए भी लाया हूँ बड़े पापा", और कमरे की तरफ भागा| सुरजू ने मुस्कुराने की कोशिश की और बाहर निकल गए|
कहाँ गलती कर दी उन्होंने, इसी उधेड़बुन में डूबे सुरजू दालान में बैठे हुए थे कि सामने कुछ आहट हुई| उन्होंने देखा कि भाई, भतीजा और उसकी माँ सब खड़े हैं और उनके पीछे उनकी पत्नी भी हैं| भाई ने कुर्ता उनके ऊपर रखा और भतीजा उनके पैर के पास बैठ गया| किसी ने कुछ भी नहीं कहा लेकिन उनको अपनी परवरिश पर नाज हो आया|

Wednesday, November 23, 2016

चाँद का मिलना--व्यंग्य

ठहाकों की आवाज़ से कमरा गूंज रहा था, आज बहुत सालों बाद रीमा का सहपाठी रोहन उससे मिलने आया था| पिछले दो घंटे से पिछले १५ सालों की बातें दोनों एक दूसरे को बता रहे थे और साथ पढ़े बाकी दोस्तों के बारे में भी एक दूसरे को बताते जा रहे थे| रीमा ने रमेश को भी बता दिया था कि ऑफिस से जल्दी आ जाना और उसने हामी भर दी थी|
अचानक बात का सिलसिला कॉलेज के जमाने के शौक के बारे में चल निकला| रोहन ने एक गहरी सांस ली और अपने सर पर हाथ फेरते हुए बोला "यार, तुम्हारी एक आदत मुझे अब भी नहीं भूलती| कितना चिढ़ती थी तुम उस लड़के से जिसके सर पर बाल बहुत कम थे और उसको टकलू बोलने का कोई मौका नहीं छोड़ती थी| उस समय मैं तो बच जाता था क्योंकि मेरे सर पर बालों की बढ़िया फसल लहलहाती थी| लेकिन अब तो स्थिति तुम देख ही रही हो कि काफी ख़राब हो गयी है"|
रीमा ने अब ध्यान दिया, वाकई उसके सर के बाल काफी झड़ गए थे| उसके चेहरे पर एक मुस्कराहट आ गयी लेकिन उसने बात बदलने के लिए कहा "खैर ये बताओ, अपने परिवार से कब मिलवाओगे"|
"बहुत जल्द मिलवाऊंगा, अगली बार साथ ही लेकर आऊंगा| लेकिन तुम एक बात का ध्यान रखना, उसके सामने मुझे टकला मत बुलाना वर्ना वो बहुत बुरा मान जाएगी", रोहन ने कस कर ठहाका लगाया|
रीमा ने भी भरसक उसके ठहाके में उसका साथ देने की कोशिश की लेकिन कामयाब नहीं हो पायी| तब तक रोहन ने एक बार फिर उससे कहा "अच्छा ये बता, अगर तेरी शादी किसी टकले से तंय हुई होती तो तुम तो मंडप से ही उठ कर भाग गयी होती| खैर जरा अपने महाशय की एक फोटो तो दिखा मुझको, देखूं तो सही कितने बाल हैं सर पर"|
"मैं चाय लेकर आती हूँ", कहकर रीमा उठी और किचन में घुस गयी| रोहन भी वहीँ पड़ी मैगज़ीन लेकर पलटने लगा तभी दरवाजे की घंटी बजी और थोड़ी देर में रमेश ने आकर रोहन से हाथ मिलाया और दोनों आमने सामने बैठ गए|
रीमा जैसे ही चाय लेकर अंदर आयी, उसी समय रोहन की नज़र रमेश के सर पर पड़ी| एकदम सफाचट सर चाँद की तरह चमक रहा था और रीमा की नज़र जैसे ही रोहन से मिली, वह झेंप गयी|
"अरे आप भी मेरी तरह टकले हो गए", कहकर रोहन ने एक जोर का ठहाका लगाया और रमेश भी उसमें शामिल हो गया| झेंप मिटाकर रीमा भी अब मुस्कुराने लगी| 

Tuesday, November 22, 2016

नोट बंदी--अधूरी कहानी

सुखिया ने अपनी धोती को एक बार और कस के कमर में खोंसा और हंसुआ लेकर खेत की ओर चल दी| उसके साथ साथ उसके टोला की और भी कई महिलाएं खेत की तरफ जा रही थीं| धान तैयार था और कटाई जोरो से चल रही थी और रोज ही जल्दी घर से निकल कर खेतों में काम करने जाना आजकल दिनचर्या बन गयी थी| एक बार धान के रोपाई के समय इसी तरह से काम रहता था और अब धान के कटाई के समय| बुधिया ने आज अपना हंसिया तेज कर लिया था और सूरज की किरणों से वह चमक रहा था|
"आज तो बहुत जल्दी जल्दी काट लेगी बुधिया, एकदम चमचमाता हंसिया है तुम्हरा", सुखिया ने उसे छेड़ते हुए कहा|
"सो तो है लेकिन कहीं कउनो अउर भी आ गया तो उहो कट जायेगा आज", बुधिया ने भी चिकोटी ली|
जल्दी जल्दी कदम बढ़ाते हुए टोली जैसे ही गांव के बीच से निकल रही थी कि उनकी नज़र एक गाड़ी पर पड़ी| कुछ लोग जो देख कर ही शहरी लग रहे थे उस गाड़ी के अगल बगल खड़े थे और लग रहा था जैसे कोई बैठकी होने वाली हो| सुखिया के कदम उसको देखकर रुक गए, साथ साथ बाकी टोली भी ठिठक गयी| उनमें से एक आदमी के हाथ में माइक था औऱ पीछे एक कैमरा वाला भी था साथ में|
"इ सब तो टी वी में देखा है, कुछो पूछत हैं सबसे इ लोग", टोली में से किसी ने कहा|
"हाँ रे, देखा तो है इन लोगों को, लगत है आज इँहा भी कुछ पुछीहें इ लोग", अब सुखिया को भी याद आ गया| उनके टोला में भी कुछ लोगों के घर टी वी था औऱ कभी कभी उ देखने चली जाती थी|
उधर टी वी का एंकर वहां खड़े ठाकुर से कुछ पूछ रहा था औऱ कैमरा वाला सब तरफ कैमरा घुमा रहा था| टोली कौतुहल में कड़ी थी औऱ देख रही थी तभी किसी ने कहा "अरे छोड़ इ सब तमाशा, धान काटे में देर हो जाई, जल्दी चला सब लोग"|
लेकिन किसी के भी कदम आगे नहीं बढे, जीवन में पहली बार ऐसा सामने देखने को मिल रहा था| इतने में एंकर की नजर टोली पर पड़ी तो उसे लगा कि इनसे बात करने पर ज्यादा बढ़िया खबर बनेगी| उसने कैमरा वाले को इशारा किया औऱ दोनों इस टोली की तरफ बढ़े|
माइक वाले को अपनी तरफ आते देखकर टोली के लोग पीछे हटने लगे, कुछ तो खेतों की तरफ भागीं| उनको भागते देखकर एंकर ने उनको पुकारा "अरे रुकिए आप लोग, आप लोगों से भी कुछ पूछना है हमको"|
सुखिया खड़ी थी औऱ उसको देखकर बुधिया औऱ कुछ औऱ औरतें भी खड़ी हो गयीं| नजदीक पहुंचकर एंकर ने उनको समझाया कि वह कुछ सवाल उनसे पूछेगा औऱ अगर संभव हो तो जवाब दीजिये| सुखिया औऱ बुधिया ने सर हामीं में हिलाया तो एंकर उनकी तरफ बढ़ा| टोली की बाकी औरतें उनके पीछे सहमी सी खड़ी हो गयीं|
जैसे ही एंकर ने माइक बुधिया की तरफ बढ़ाया, उसने सबसे पहले अपना पल्लू ठीक किया औऱ माथे पर आये पसीने को पोंछ लिया| फिर उसे ध्यान आया कि उसका हंसिया तो हाथ में ही है तो वह उसको नीचे रखने लगी|
"अरे आप हंसिया हाथ में ही लिए रहिये, कोई दिक्कत नहीं है", एंकर के कहने पर बुधिया ने हंसिया वापस पकड़ लिया|
"खड़ी बोली में पूछे तो समझ जाएंगी ना आप| जवाब चाहे भोजपुरी में दे दीजियेगा", एंकर ने पूछा तो बुधिया ने सर हिला दिया| इतनी खड़ी बोली तो उसे समझ में आती थी, हाँ बोलने में जरूर दिक्कत थी| इस घबराहट में भी उसे एक चीज बहुत अच्छी लगी कि जिंदगी में पहली बार किसी ने उससे आप कहकर बात किया|

Monday, November 21, 2016

कुशल क्षेम--लघुकथा

आज ही वह घर आया था और उसने सोच रखा था कि इस बार पिताजी को टोक देगा कि बार बार फोन मत किया करें| अब तो साथ के बच्चे भी उसे चिढाने लगे थे कि पता नहीं वह कब बड़ा होगा| बाकी बच्चे तो अपने पिता का कई बार फोन ही उठाते ही नहीं थे और बाद में एक छोटा सा मैसेज कर देते थे कि लाइब्रेरी में था|
नहा धोकर उसने फोन उठाया और जाकर पिता के सामने बैठ गया, पिताजी उस समय अखबार देख रहे थे| उसको आता देखकर उन्होंने अखबार रखा और उसको भरपूर निगाहों से देखने लगे| उसने बात शुरू करते हुए कहा "इस बार ठण्ड कुछ जल्दी ही शुरू हो गयी पिताजी?
पिताजी ने एक बार बाहर नजर डाली और हाँ में सर हिलाते हुए पूछा "स्वेटर वगैरह तो हैं ना काम भर के तुम्हारे पास, कुछ लेना हो तो शाम को चल के ले लेना"|
"मेरे पास काफी हैं, आप चिंता मत कीजिये, वहीं ले लिये थे मैंने| आप तो अपना ध्यान रखते हैं ना?, उसने फोन को हाथ में से रख दिया|
"खाना पीना ठीक से खाया कर और किसी भी चीज की जरुरत हुआ करे तो मुझे बता दिया कर| तेरी माँ होती तो सब कुछ वही देख लेती", पिताजी ने उसको प्यार से देखते हुए कहा|
अब बोल ही देता हूँ, सोचते हुए उसने कहा "पिताजी, आप बार बार फोन मत किया कीजिये, ठीक नहीं लगता है| मुझे कोई जरुरत होगी तो मैं आपको बोल दूंगा"| लेकिन दोस्त हंसी उड़ाते हैं, ये कह नहीं पाया|
पिताजी को जैसे झटका लगा और उन्होंने उसको देखते हुए धीरे से कहा "लेकिन मुझे जो जरुरत होती है तुम्हारे कुशल क्षेम की, उसके लिए क्या करूँ?, और वहां से चल दिए|
वह उठ कर पिताजी के पीछे पीछे उनके कमरे में गया| पिताजी ने अपने छोटे से संदूक में से एक पोस्टकार्ड निकाला और उसकी तरफ बढ़ाते हुए बोले "आज सुविधा है तो मैं फोन कर लेता हूँ, पहले तो सिर्फ यही साधन था"|
उसने गौर से एक बार उस पुराने पोस्ट कार्ड को देखा और फिर पिताजी को, फिर धीरे से पिताजी का हाथ पकड़ लिया| 

Thursday, November 17, 2016

ममता की डोर--लघुकथा

"अरे जल्दी घर आओ. माँजी वापस आ गयी हैं| मैंने पूछा भी लेकिन कुछ कहा नहीं उन्होंने", पत्नी का फोन सुनते ही उसका माथा ठनका|
"ठीक है, तुम देखो, मैं जल्दी आता हूँ", कहकर उसने फोन रख दिया| उसको भी समझ में नहीं आ रहा था कि अचानक माँ घर क्यों आ गयी| अभी तीन महीने पहले ही तो उनको वृद्धाश्रम में छोड़ कर आया था|
इसी उधेड़बुन में डूबा हुआ वह जल्दी जल्दी घर पहुंचा| पत्नी भी अंदर कुछ परेशान खड़ी थी, एक तो वैसे ही नोट बंदी के चलते हालत पतली थी, उसपर माँ भी आ गयी|
"माँ, सब ठीक तो है वहाँ", और क्या पूछे, उसे समझ में नहीं आया|
माँ ने उसकी तरफ देखा और अपनी कमर में खोंसा हुआ अपना बटुआ निकाला| बटुआ उसको पकड़ाती हुई वह बोली "इसमें पचास का एक पैकेट है जो तू मुझे दे कर आया था, अभी पता चला तो मैं देने आ गयी| चल मुझे वापस छोड़ आ, वहाँ पर सब इन्तजार कर रहे होंगे"|
माँ चलने के लिए खड़ी हो गयी, वह कुर्सी से खड़ा नहीं हो पाया| 

Monday, November 14, 2016

खरा सिक्का--लघुकथा

बस में बैठे राम सरन सोच रहे थे कि कितना गलत समझ था उन्होंने रग्घू के बारे में| बगल में रग्घू की माँ भी बैठी थी, थकी हुई लेकिन संतुष्ट, लेकिन उनकी हिम्मत नहीं पड़ रही थी कि उससे आंख मिला सकें| रग्घू पानी का बोतल लेकर आया और राम सरन को पकड़ा कर बगल में बैठ गया| बस ने एक झटका लिया और चल पड़ी, राम सरन की यादों को भी झटका लगा और वह पुरानी बातों में खो गए|
रग्घू उनका छोटा बेटा था और बड़े बेटे की तरह पढ़ने में तेज नहीं था| हर बार जब दोनों बेटे परीक्षाफल लेकर आते तो उस दिन रग्घू की पिटाई निश्चित होती| माँ ने कितनी ही बार कहा कि रग्घू को समझ कम है लेकिन जरुरी तो नहीं कि हर बच्चा पढ़ने में ही आगे निकले, लेकिन उनको तो लगता था कि अगर पढ़ नहीं सकता तो किसी भी काम लायक नहीं होगा|
फिर रग्घू ने जब अपना छोटा सा कारोबार करना चाहा था तो उनको लगा था जैसे वह खानदान की इज़्ज़त डुबो देगा| कहाँ बड़ा बेटा इतने उच्च पद पर और कहाँ रग्घू, लेकिन माँ ने पहली बार खुल कर रग्घू का पक्ष लेते हुए उनसे बहस की थी|
कल जब रग्घू ने माँ से फिर पूछा था कि क्यों नहीं आ जाते हमारे घर, तो माँ के सब्र का बांध टूट गया|
"कब तक बड़े बेटे के बुलावे का इंतजार करोगे, अगर तुमको नहीं चलना है तो मैं अकेले ही चली जाउंगी रग्घू के यहाँ", माँ ने कह तो दिया था लेकिन उनको भी पता था कि इस उमर में वह उनको अकेला छोड़कर नहीं जाएगी|
"ठीक है बोल दो उसको, चलते हैं उसके यहाँ ही"|
खरे सिक्के को पहचानने में उनसे कितनी भूल हो गयी थी, सोचते हुए उन्होंने बस की सीट पर सर टिकाया और आंख मूंद लीं|

अपने हिस्से की क़ुर्बानी--लघुकथा

"अरे अम्मा, पगला गयी हो क्या, अपना काम कैसे चलेगा, पता नहीं कितना दिन ये चलेगा", छोटका ने माँ को एक बार फिर से चिल्लाकर कहा|
"अपना काम तो चल ही जायेगा, लेकिन पड़ोस के तय्यब मियां का क्या होगा| तीन दिन से दिहाड़ी नहीं किया है उन्होंने, उनके बच्चों की भूख अब नहीं देखी जाती", अम्मा ने चिंतित स्वर में कहा|
"अपने घर में ही कहाँ बहुत है और पैसे भी तो ज्यादा नहीं हैं| मैं तुमको नहीं ले जाने दूँगा", छोटका अम्मा के सामने आकर खड़ा हो गया|
"अरे बेशर्म, एक टाइम का खाना अगर छोड़ दिया भी तो मर नहीं जायेंगे हम लोग| लेकिन मेरे रहते किसी के घर में फांके पड़े, मुझसे देखा नहीं जायेगा", अम्मा ने उसका हाथ झिड़क दिया|
"आखिर एक फौजी का खून है मुझमें, और आहुति सिर्फ सीमा पर खड़े लोग ही नहीं देते| थोड़ी बहुत क़ुर्बानी तो हमको भी देनी पड़ेगी अपने मुल्क और अपने लोगों के लिए", कहते हुए अम्मा निकल गयीं|
छोटका ने एक बार घर में अपनी बीबी की तरफ देखा और उसकी नजर में भी हिकारत के भाव देखकर बाहर निकल गया|
थोड़ी देर बाद वह एक बैंक के सामने लाइन में खड़े लोगों को पानी पिला रहा था|