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Thursday, November 17, 2016

ममता की डोर--लघुकथा

"अरे जल्दी घर आओ. माँजी वापस आ गयी हैं| मैंने पूछा भी लेकिन कुछ कहा नहीं उन्होंने", पत्नी का फोन सुनते ही उसका माथा ठनका|
"ठीक है, तुम देखो, मैं जल्दी आता हूँ", कहकर उसने फोन रख दिया| उसको भी समझ में नहीं आ रहा था कि अचानक माँ घर क्यों आ गयी| अभी तीन महीने पहले ही तो उनको वृद्धाश्रम में छोड़ कर आया था|
इसी उधेड़बुन में डूबा हुआ वह जल्दी जल्दी घर पहुंचा| पत्नी भी अंदर कुछ परेशान खड़ी थी, एक तो वैसे ही नोट बंदी के चलते हालत पतली थी, उसपर माँ भी आ गयी|
"माँ, सब ठीक तो है वहाँ", और क्या पूछे, उसे समझ में नहीं आया|
माँ ने उसकी तरफ देखा और अपनी कमर में खोंसा हुआ अपना बटुआ निकाला| बटुआ उसको पकड़ाती हुई वह बोली "इसमें पचास का एक पैकेट है जो तू मुझे दे कर आया था, अभी पता चला तो मैं देने आ गयी| चल मुझे वापस छोड़ आ, वहाँ पर सब इन्तजार कर रहे होंगे"|
माँ चलने के लिए खड़ी हो गयी, वह कुर्सी से खड़ा नहीं हो पाया| 

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