बस में बैठे राम सरन सोच रहे थे कि कितना गलत समझ था उन्होंने रग्घू के बारे में| बगल में रग्घू की माँ भी बैठी थी, थकी हुई लेकिन संतुष्ट, लेकिन उनकी हिम्मत नहीं पड़ रही थी कि उससे आंख मिला सकें| रग्घू पानी का बोतल लेकर आया और राम सरन को पकड़ा कर बगल में बैठ गया| बस ने एक झटका लिया और चल पड़ी, राम सरन की यादों को भी झटका लगा और वह पुरानी बातों में खो गए|
रग्घू उनका छोटा बेटा था और बड़े बेटे की तरह पढ़ने में तेज नहीं था| हर बार जब दोनों बेटे परीक्षाफल लेकर आते तो उस दिन रग्घू की पिटाई निश्चित होती| माँ ने कितनी ही बार कहा कि रग्घू को समझ कम है लेकिन जरुरी तो नहीं कि हर बच्चा पढ़ने में ही आगे निकले, लेकिन उनको तो लगता था कि अगर पढ़ नहीं सकता तो किसी भी काम लायक नहीं होगा|
फिर रग्घू ने जब अपना छोटा सा कारोबार करना चाहा था तो उनको लगा था जैसे वह खानदान की इज़्ज़त डुबो देगा| कहाँ बड़ा बेटा इतने उच्च पद पर और कहाँ रग्घू, लेकिन माँ ने पहली बार खुल कर रग्घू का पक्ष लेते हुए उनसे बहस की थी|
कल जब रग्घू ने माँ से फिर पूछा था कि क्यों नहीं आ जाते हमारे घर, तो माँ के सब्र का बांध टूट गया|
"कब तक बड़े बेटे के बुलावे का इंतजार करोगे, अगर तुमको नहीं चलना है तो मैं अकेले ही चली जाउंगी रग्घू के यहाँ", माँ ने कह तो दिया था लेकिन उनको भी पता था कि इस उमर में वह उनको अकेला छोड़कर नहीं जाएगी|
"ठीक है बोल दो उसको, चलते हैं उसके यहाँ ही"|
खरे सिक्के को पहचानने में उनसे कितनी भूल हो गयी थी, सोचते हुए उन्होंने बस की सीट पर सर टिकाया और आंख मूंद लीं|
रग्घू उनका छोटा बेटा था और बड़े बेटे की तरह पढ़ने में तेज नहीं था| हर बार जब दोनों बेटे परीक्षाफल लेकर आते तो उस दिन रग्घू की पिटाई निश्चित होती| माँ ने कितनी ही बार कहा कि रग्घू को समझ कम है लेकिन जरुरी तो नहीं कि हर बच्चा पढ़ने में ही आगे निकले, लेकिन उनको तो लगता था कि अगर पढ़ नहीं सकता तो किसी भी काम लायक नहीं होगा|
फिर रग्घू ने जब अपना छोटा सा कारोबार करना चाहा था तो उनको लगा था जैसे वह खानदान की इज़्ज़त डुबो देगा| कहाँ बड़ा बेटा इतने उच्च पद पर और कहाँ रग्घू, लेकिन माँ ने पहली बार खुल कर रग्घू का पक्ष लेते हुए उनसे बहस की थी|
कल जब रग्घू ने माँ से फिर पूछा था कि क्यों नहीं आ जाते हमारे घर, तो माँ के सब्र का बांध टूट गया|
"कब तक बड़े बेटे के बुलावे का इंतजार करोगे, अगर तुमको नहीं चलना है तो मैं अकेले ही चली जाउंगी रग्घू के यहाँ", माँ ने कह तो दिया था लेकिन उनको भी पता था कि इस उमर में वह उनको अकेला छोड़कर नहीं जाएगी|
"ठीक है बोल दो उसको, चलते हैं उसके यहाँ ही"|
खरे सिक्के को पहचानने में उनसे कितनी भूल हो गयी थी, सोचते हुए उन्होंने बस की सीट पर सर टिकाया और आंख मूंद लीं|
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